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हैवानियत की हदें पार, हत्या के बाद लाश से दरिंदगी और जादू टोना, रूह कंपा देने वाली हकीकत

इंदौर मध्य प्रदेश:  प्रेम क्या है? प्रेम में सामने वाले के लिए क्या भाव होने चाहिए? अपने प्रेमिका की किस तरह देखभाल करनी चाहिए? किस तरह खयाल रखना चाहिए? प्रेम संबंध में किस तरह समर्पण की भावना होनी चाहिए? लगता है आज का युवा यह सब भूल चुका है और प्रेम एक पिशाच आत्मा के रूप में उसके ऊपर इस तरह सवार है कि वह हैवानियत की सारी हदें पार कर सकता है।इस तरह का ही एक मामला इंदौर से सामने आया है जिसमें एक प्रेमी ने अपने प्रेमिका को निर्दयता से मार डाला न केवल अपनी प्रेमिका की हत्या की बल्कि हैवानियत की सारी हदें पार कर दी हर एक घटना रोंगटेक खड़े कर देने वाली है। और यह सोचने पर भी मजबूर करती है कि कोई इंसान किसी दूसरे इंसान के साथ ऐसा कैसे कर सकता है और सबसे बड़ी बात है कि जिससे आप प्रेम करते हो?उस लड़की के साथ आप ऐसा कैसे कर सकते हैं?

इंदौर के द्वारकापुरी इलाके में 24 वर्षीय MBA छात्रा का शव उसके क्लासमेट और कथित प्रेमी के किराए के कमरे से मिला, जिसके बाद पूरा मामला सनसनीखेज रूप ले लिया। लड़की अपने प्रेमी के साथ इस कमरे में मिलने आया करती थी। कुछ दिन से कमरा बंद था। कमरे को पूरी तरह पैक किया गया था जिससे अंदर मृत लड़की लाश की बदबू भी बाहर न जा पाया। कुछ दिन बाद जब शक हुआ तब पड़ोसियों ने पुलिस को बुलाया और पुलिस ने जब कमरा खोला तो वहां के दृश्य देखकर पुलिस हैरान थी। एक नग्न लाश लड़की की पड़ी हुई थी और उसकी स्थिति देखकर लग रहा था कि उसके साथ हैवानियत की सारी हदें पार की गई हैं।

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इस घिनौने घटना के मुख्य आरोपी पीयूष धनोतिया को पुलिस ने मुंबई से गिरफ्तार कर लिया है और हत्या के पीछे के कारणों की जांच कर रही है। मुख्य संदिग्ध पीयूष धनोतिया घटना के बाद इंदौर से भाग गया था। तकनीकी ट्रैकिंग, कॉल डिटेल और पुलिस के संयुक्त प्रयास से उसे मुंबई के अंधेरी इलाके से हिरासत में लिया गया। पुलिस को इस हत्यारे तक पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगा क्योंकि हर एक साक्ष्य साफ इशारा कर रहे थे कि इस युवक ने इंसानियत की सारी हदें पार कर दी हैं। लेकिन शायद पुलिस को भी यकीन नहीं था कि जब युवक पकड़ा जाएगा और पूछताछ की जाएगी तो ऐसे खुलासे सामने आएँगे जो पुलिस ने भी कभी नहीं सुने होंगे। 

जांच में यह बात सामने आई है कि आरोपी ने पीड़िता को मारने से पहले उसके साथ संबंध बनाए थे। साथ ही इसके लिए उसने सेक्स पावर बढ़ाने वाली टैबलेट भी लिया था। लंबे समय से वह उस लड़की के साथ सम्बन्ध में था। उसे शक था कि लड़की किसी और के साथ भी रिलेशन में है। इस शक में उसने हैवानियत के साथ लड़की से सम्बन्ध बनाये और फिर उसकी हत्या कर दी। मारने के बाद वह बाजार से शराब ले आया। पीने के बाद फिर पीड़िता के साथ गलत किया। साथ ही कुकर्म भी किया था। और उसकी लाश के साथ हर तरह की हैवानियत की। इसके बाद मुंबई भाग गया। वहां जाकर उसकी याद आने लगी। इसके बाद पीयूष धनोतिया ने यूट्यूब पर यह सर्च किया कि आत्मा से बात कैसे करें। उसने मुंबई में टोना टोटका भी किया। मतलब साफ था कि इस लड़के के प्यार में सनक ज्यादा थी।मरने के बाद भी अपनी प्रेमिका को टोना टोटका करके पाना चाहता था। 

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पूछताछ के दौरान वहां मौजूद महिला एसआई उसकी हैवानियत सुनकर टूट गई। वह रोनी लगी। पीयूष को शक था कि प्रेमिका किसी और से भी बात करती है। साथ ही वह पीयूष पर शादी के लिए दबाव बना रही थी लेकिन आरोपी इसके  लिए तैयार नहीं था। उसके घर के लोग शादी के लिए तैयार नहीं थे। गिरफ्तार होने के बाद पीयूष धनोतिया ने कहा है कि उसे अपने पिता से नहीं मिलना है। यह पूरी घटना एक ऐसी हकीकत है जिसपे विश्वास करना मुश्किल है लेकिन जब यह लड़का खुद ही पूरी घटना अपनी जुबानी बता रहा तो यह भी नहीं कहा जा सकता कि ऐसा नहीं हुआ होगा लेकिन जिस तरह की अमानवीयता और हैमानियत इसने दिखायी न कहीं यह सवाल खड़ा कर रही है प्रेम तो सुन्दर होता है।समर्पण का भाव लिए होता है फिर इस युवक के मन में अपने प्रेमिका के प्रति ऐसी हैवानियत केवल एक मनोविकार ही माना जा सकता है। 

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विदेशी महिला से दतिया के जंगल में हुए गैंगरेप के मामले में हाईकोर्ट ने दिया बड़ा फैसला

ग्वालियर मध्य प्रदेश: ग्वालियर हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने विदेशी महिला पर्यटक से दतिया के जंगलों में गैंगरेप करने वाले आरोपियों को राहत देने से इनकार कर दिया है. गैंगरेप के आरोपी उम्र कैद की सजा काट रहे हैं.उन्होंने अपनी सजा को निरस्त करने के लिए हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।हाई कोर्ट ने कहा कि यह मामला गंभीर प्रकृति का है यह पीड़िता के शरीर पर नहीं बल्कि उसके मन मस्तिष्क और आत्मा पर गहरा आघात है. यह अपराध उस समय और भी ज्यादा घिनौना हो जाता है जब एक विदेशी महिला यहां की संस्कृति को जानने समझने के लिए भारत आई हो।

आपको बता दें कि दतिया में हुए इस घटना ने पूरे क्षेत्र को देश में शर्मसार कर दिया था। यह वही समय था जब दिल्ली में निर्म कांड जैसी घटना भी हुई थी। यदि देखा जाए तो यह घटना भी दिल्ली के निर्भया कांड से किसी भी मायने में कम गंभीर नहीं है और इस मामले में तो पीड़ित एक विदेशी महिला थी जिसके वजह से देश की छवि अंतर्राष्ट्रीय पटल पर भी धूमिल हुई जिस तरह से महिला के साथ गलत कृत्य किया गया और उसके पति के साथ भी मारपीट की गई। इस घटना ने देश की छवि को धूमिल किया था।

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मार्च 2013 में स्विस दंपति साइकिल से भारत यात्रा पर निकले थे.15 मार्च को वो दतिया पहुंचे और यहां झारिया गांव के जंगल में टेंट लगाकर रात्रि विश्राम करने लगे. इस दौरान रात में सात आठ बदमाश वहां आ धमके। उन्होंने पति को बंधक बनाकर विदेशी महिला से दुष्कर्म किया, उनका कीमती सामान भी लूट ले गए. बाद में इस सिलसिले में आधा दर्जन से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया. उनके खिलाफ गैंगरेप लूट और अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया था. अधीनस्थ न्यायालय ने छह आरोपियों रामप्रीत ऋषि भूरा बृजेश और विष्णु को उम्र कैद की सजा से दंडित किया था।

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एंटीबायोटिक के अनाधुंध प्रयोग पर लगेगी रोक, आईसीएमआर सख्त नियमों की तैयारी में

डिजिटल डेस्क नई दिल्ली: एंटीबायोटिक के अनाधुन तरीके से बढ़ते हुए उपयोग पर अब आईसीएमआर सख्त निर्णय लेने वाला है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) ने देश में एंटीबायोटिक दवाओं के अंधाधुंध इस्तेमाल पर गहरी चिंता जताई है। इस पर लगाम लगाने के लिए संस्थान सख्त दिशानिर्देश लाने जा रहा है। आइसीएमआर के महानिदेशक डा. राजीव बहल ने कोलकाता में एक कार्यक्रम में कहा कि एम्पिरिकल प्रोटोकाल (प्रयोगसिद्ध नियमावली) लागू किया जाएगा, जिसके अंतर्गत संक्रमण के प्रकार के अनुसार एंटीबायोटिक के इस्तेमाल के स्पष्ट निर्देश होंगे।

कोलकाता के बेलेघाटा स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट फार रिसर्च इन बैक्टीरियल इंफेक्शंस (एनआइआरबीआइ) में ओरल रिहाइड्रेशन थेरेपी (ओआरटी) के जनक और पद्म विभूषण से सम्मानित डा दिलीप महालनाबिस की प्रतिमा के अनावरण के मौके पर आइसीएमआर के महानिदेशक ने कहा कि इस दिशानिर्देश के अंतर्गत डाक्टरों को वैज्ञानिक मार्गदर्शन किया जाएगा। उन्हें बताया जाएगा कि किन परिस्थितियों में और कितने समय तक एंटीबायोटिक दवा दी जानी चाहिए।

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कब और किन परिस्थितियों में एंटीबायोटिक बदली जानी चाहिए। डा. बहल ने कहा कि जरूरत पडऩे पर डाक्टरों को विशेष प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। किसी भी बीमारी के परीक्षण से पहले डाक्टरों को स्वयं आकलन करना होगा कि मरीज को वास्तव में एंटीबायोटिक की आवश्यकता है या नहीं। उन्होंने कहा कि किसी भी बीमारी की टेस्ट रिपोर्ट आने से पहले मरीजों को एंटीबायोटिक देने से बचना चाहिए। आपको बता दें कि ज्यादातर मामलों में मरीज मेडिकल स्टोर से ही सीधे एंटीबायोटिक खरीद लेता है।कौन सी एंटीबायोटिक कितनी मात्रा में दी जानी चाहिए?यह जानकारी मेडिकल स्टोर वाले को नहीं होती और इस तरह से एंटीबायोटिक का गलत डोस मरीज में पहुंचता है और रजिस्टेंस पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है।

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आपको बता दें कि लंबे समय से यह देखा गया है कि कई मरीजों पर एंटीबायोटिक का असर नहीं हो रहा, जिसका मुख्य कारण इनका बेवजह सेवन है। दवा दुकानों पर बिना डाक्टर की पर्ची के एंटीबायोटिक दवा दिए जाने की प्रवृत्ति भी चिंताजनक है। आइसीएमआर के महानिदेशक ने हाल में निपाह संक्रमण की रोकथाम में बंगाल सरकार की भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार केंद्र के साथ समन्वय कर प्रभावी ढंग से काम कर रही है।

डायबिटीज जांचने वाले एचबीए1सी टेस्ट में गोलमाल, जान लीजिए क्यों नहीं है भरोसेमंद

डिजिटल डेस्क नई दिल्ली: अगर आपको डायबिटीज है और आपके डॉक्टर्स आपको नॉर्मल टेस्ट में शुगर लेवल न आने पर एचबीए1सी टेस्ट की सलाह देते हैं। तो सावधान हो जाइए क्योंकि यह टेस्ट गुमराह करने वाला है। हालिया रिपोर्ट में सामने आया है कि भारत जैसे देश में यह परीक्षण हर बार सही नतीजे ही देगा। यह बात तय नहीं है इसके सम्बन्ध में एक जर्नल द लेसनल हेल्थ साउथ ईस्ट एशिया में प्रकाशित किया गया है। इस जर्नल में भारत के डायबिटीज और इस टेस्ट की प्रामाणिकता पर बड़े सवाल खड़े किए गए हैं। जबकि भारत में ज्यादातर डॉक्टर्स इसी टेस्ट के नतीजे के आधार पर व्यक्ति को मधुमेह का मरीज मानकर उसको दवाइयां देना शुरू कर देते हैं।

इस रिसर्च जर्नल में बताया गया है कि भारत जैसे देश जहाँ खून की कमी और कुछ आनुवांशिक सख्त बीमारियाँ ज्यादा पाई जाती हैं। यह फैक्टर इस टेस्ट के रिपोर्ट में बदलाव कर सकते हैं। इसी के चलते कभी डायबिटीज का पता लगाने में 4 साल तक की देरी हो सकती है। इसका खामियाजा खासकर महिलाओं और ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले लोगों को भुगतना पड़ सकता है। भारतीयों के रक्त संबंधित यह समस्या है। इस टेस्ट के निर्णय को प्रभावित करती हैं। और इस रिपोर्ट में साफ बताया गया है के भारतीय परिस्थितियों में इस टेस्ट द्वारा दिए गए आंकड़ों को मानक नहीं माना जा सकता।

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HbA1c (ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन) टेस्ट एक रक्त परीक्षण है जो पिछले 2 से 3 महीनों के औसत ब्लड शुगर (ग्लूकोज) के स्तर को मापता है। यह टेस्ट बताता है कि लाल रक्त कोशिकाओं में हीमोग्लोबिन से कितनी शुगर जुड़ी है, जिससे डायबिटीज के निदान और नियंत्रण का सही पता चलता है। यह सामान्य ब्लड शुगर टेस्ट (जो सिर्फ उस समय की शुगर बताता है) की तुलना में अधिक सटीक जानकारी देता है।
HbA1c टेस्ट के बारे में मुख्य जानकारी:
उद्देश्य: मुख्य रूप से टाइप 2 मधुमेह के निदान, प्रीडायबिटीज (पूर्व-मधुमेह) की जांच और मधुमेह रोगियों में शुगर के स्तर पर निगरानी रखने के लिए इसका उपयोग किया जाता है।
परिणाम (प्रतिशत में):
सामान्य: 5.7% से कम।
प्रीडायबिटीज: 5.7% से 6.4%।
मधुमेह (Diabetes): 6.5% या उससे अधिक।

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इस रिसर्च जर्नल में यह सलाह दी गई है कि यदि आपको डायबिटीज के लक्षण परिलक्षित हो तो केवल इस एक टेस्ट एचबीए वन सी पर निर्भर न रहे बल्कि अन्य विकल्प के रूप में उपलब्ध टेस्ट भी करा लें। डॉक्टर्स मरीज की जरूरत के अनुसार ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट शुगर चेक होम और अन्य टेस्ट की सलाह भी दे सकते हैं। कई अस्पतालों में कंटिन्यूअस शुगर लेवल चैकिंग मॉनिटर्स भी उपलब्ध रहते हैं। ऐसे तमाम विकल्पों का उपयोग करने के बाद यदि शुगर का लेवल आता है तो फिर इस व्यक्ति को डायबिटिक माना जा सकता है। कई तरह की जांचों को मिलाकर देखने का तरीका यह सुनिश्चित करने के लिए ज्यादा भरोसेमंद है कि मरीज को डायबिटीज हैं या नहीं।

फिल्म नहीं हकीकत है पत्नी ने डेढ़ करोड़ लेकर पति उसकी प्रेमिका को सौंप दिया

भोपाल मध्य प्रदेश: फिल्मों में आपने देखा होगा कि किस तरीके से लप ट्रायंगल की कहानियों में कहीं हीरो अपने प्रेम को त्याग कर दूसरे को दे देता है तो कहीं हीरोइन अपना प्रेमी किसी दूसरे को सौंप देती है फिल्मों में ड्रामा होता है और ड्रामा जितना ज्यादा हो फिल्म चलने की संभावना उतनी अधिक होती है इसलिए फिल्मों में ऐसी काल्पनिक घटनाएँ गढ़ी जाती हैं। लेकिन यह काल्पनिक घटनाएं आज के कलियुग में हकीकत बनने लगी हैं और इसे कलियुग नहीं धनयुग कहें तो बेहतर होगा क्योंकि यहां धन के लिए सब कुछ हो सकता है।ऐसा ही एक महिला ने भोपाल में किया है जिसने अपने शादीशुदा जीवन में उसके पति के जीवन में आई प्रेमिका को ही अपने पति को सौंप दिया और उसके बदले में डेढ़ करोड़ रुपया लिया। यह सुनकर हो सकता है कि आपको कोई फिल्म की कहानी याद आ रही हो लेकिन यह फिल्म नहीं हकीकत है।

भोपाल के कुटुम्ब न्यायालय में इसी तरह का एक अजीबोगरीब मामला आया जहाँ पत्नी खुद चाहती थी के पति उसकी प्रेमिका के साथ रहे और उसने अपने पति का सौदा लगभग ₹15000000 में किया। पत्नी ने एक डुप्लेक्स मांगा ₹2700000 नकद लिए और अपने पति को प्रेमिका के साथ रहने की इजाजत दे दी। यह पूरा मामला घंटों की काउंसलिंग के बाद सुलझा और तीनों पक्ष इस बात पर राजी हुए। प्रेमिका भी खुश थी कि उसे प्रेमी मिल रहा था और पत्नी भी खुश थी कि उसे पैसा मिल रहा था लेकिन क्या वह पुरुष खुश था या नहीं। इस बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है। 

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इस कहानी के किरदार असली हैं लेकिन हम आपको उनकी पहचान नहीं बताएंगे लेकिन इस फिल्म की कहानी काफी हद तक 1997 आई राज कंवर निर्देशित फिल्म जुदाई से मिलती जुलती है। इस फिल्म में अनिल कपूर पति की भूमिका में हैं और श्रीदेवी उनकी पत्नी हैं। अनिल कपूर जिस कंस्ट्रक्शन कंपनी में काम करते हैं उसके मालिक की बेटी का दिल अनिल कपूर पर आ जाता है और वह किसी भी कीमत पर अनिल कपूर को पाने का प्रयास करती है।अनिल कपूर की पत्नी श्रीदेवी लालची होती है उसे हाईफाई लाइफ चाहिए होती है। इसलिए प्रेमिका उर्मिला पत्नी से उसके पति अनिल कपूर को खरीदने का एक सौदा करती हैं। और इसके आगे क्या कुछ हुआ?वह आप मेरी फिल्म देखी हो तो आप जानते ही हैं।

बिल्कुल इस फिल्म की तर्ज पर ही भोपाल में यह घटना घटी जहां पति एक सरकारी कार्यालय में काम करते हैं और उनका प्रेम अपने ही विभाग की एक महिला अधिकारी से हो जाता है। धीरे धीरे नजदीकियां बढ़ती हैं और घर से दूरी बढ़ती जाती है। इस हकीकत की कहानी में भी इस पुरुष के दो बेटियाँ हैं। लेकिन यहां पर कुटुंब न्यायालय में शिकायत बड़ी बेटी ने दर्ज कराई थी क्योंकि वह घर के अशांति से परेशान थी। जब कुटुंब न्यायालय ने पति पत्नी को काउंसलिंग के लिए बुलाया तो पति ने अपने सहकर्मी से संबंधों को स्वीकार किया और इच्छा जताई कि वह न तो पत्नी को तलाक देना चाहता है और न ही प्रेमिका को छोड़ना। शुरुआत में तो कुटुंब न्यायालय भी इस बात को लेकर अचंभित हुआ लेकिन काउंसलिंग के द्वारा निष्कर्ष निकालने का प्रयास किया। 

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कई बार की काउंसलिंग के बाद पत्नी ने खुद की और बेटियों की आर्थिक सुरक्षा की मांग को रखते हुए घर कैश और तमाम शर्तें रखीं और पति की प्रेमिका ने इसे स्वीकार कर लिया और प्रेमिका अधिकारी थी और वह भी चाहती थी कि पत्नी की माँग कोई गलत नहीं है इसलिए पूरे मामले का समझौता डेढ़ करोड़ में करना तय हुआ। एक तरफ तो इस तरह का लिया गया समझौता। यह सवाल खड़े करता है कि क्या सामाजिक रूप से यह सही है लेकिन दूसरी ओर यह एक ज्वलंत उदाहरण इस बात का भी है कि यदि खुशी खुशी सामंजस्य बिठाकर किसी वैवाहिक और आंतरवैवाहिक मामले का निष्कर्ष निकाला जा सकता है तो फिर इसमें गलत ही क्या है? हर व्यक्ति की राय अलग हो सकती है लेकिन यदि इस पूरे समझौते के बाद पति पत्नी और वो खुश हैं तो फिर किसी तीसरे के कोई प्रश्न उठाने का कोई मतलब ही नहीं रह जाता…

अवैध बूचड़ खाने के विरोध में गौ सेवकों की मुख्यमंत्री को चेतावनी

ग्वालियर मध्य प्रदेश; ग्वालियर में 2 दिन पहले मवेशियों की हड्डियों से भरे ट्रक और पांच आरोपियों के पकड़े जाने के बाद आज गौ सेवक पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचे। जहां उन्होंने नारेबाजी कर प्रदर्शन किया। गौ सेवकों की मांग थी कि गिरफ्तार आरोपियों के खिलाफ मकान तोड़ने की कार्रवाई की जाए। इसके साथ ही इसकी जांच SIT की टीम गठित करा कर कराई जाए। वहीं पुलिस अधिकारियों ने इस मामले को लेकर मांगो को पूरा करने और जांच का हवाला देते हुए कार्रवाई करने का आश्वासन दिया है। आपको बता दें कि भोपाल के बाद ग्वालियर में कुछ दिनों से बूचडखाने में गौ हत्या किए जाने का मामला गरमाया हुआ है।

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ग्वालियर पुलिस अधीक्षक कार्यालय में आज भारी संख्या में गौ सेवक पहुंचे। जहां उन्होंने प्रदर्शन कर नारेबाजी कर दी। नारेबाजी करने के बाद पुलिस अधिकारी को अपनी मांगों को लेकर एक ज्ञापन सौपा हैं। उनकी मांग थी कि झांसी रोड थाना क्षेत्र के चेतकपुरी रोड पर 2 दिन पहले सोमवार मंगलवार की रात 12:30 बजे गौवंश की हड्डियां होने की आशंका के चलते गौ सेवकों ने एक ट्रक को पकड़ा था। जिसमें मवेशियों के काफी सारी हड्डियां भारी हुई मिली थी और चार आरोपियों को पकड़ कर पुलिस के हवाले किया था इसके साथी बूचड़ खाना चलने वाले पांचवे आरोपी वसीम को भी पुलिस ने पकड़ लिया और उनके खिलाफ FIR की गई। लेकिन 2 दिन बीत जाने के बावजूद भी पुलिस ने उनका ना तो कोई जुलूस निकाला और ना ही कोई ठोस कार्रवाई उनके खिलाफ की गई।

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गौ सेवकों की मांग है कि पुलिस इस मामले को लेकर SIT टीम गठित करने की मांग की है इसके साथ ही जो हड्डियां पुलिस को मिली है उनको जांच के लिए हैदराबाद भेजा गया है इसके अलावा और भी जगह है जहां सैंपलिंग के लिए भेजा जाना चाहिए जिससे निष्पक्ष जांच की जा सके। यहां इसलिए क्योंकि हैदराबाद में बहुमूल्य क्या है इस बात का सबको पता है क्या वहां बिकता है क्या नहीं बिकता इसलिए वहां हैदराबाद भेजना सही नहीं था। मध्य प्रदेश में कोई लैब की कमी नहीं है वहां भी जांच के लिए भेजा जा सकता था। इसके साथ ही बुलडोजर की मांग की है आरोपियों की जो अवैध घर हैं उनको तोड़ा जाए साथ ही चेतावनी दी है कि अगर 3 दिन के अंदर कार्रवाई नहीं की जाती है तो गौवंश सेवक बूचड़ खाने खुद जाकर बंद कराएगा। वही इस मामले में एसपी सुमन गुर्जर का कहना है कि हड्डियों की जांच के लिए भेजा गया है और उसकी रिपोर्ट आने के बाद आगे की सख्त कार्रवाई की जाएगी।

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आ गया एक साल का BEd, जानिए क्या है पूरी प्रक्रिया

डिजिटल डेस्क 1 year BEd; राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (NCTE) द्वारा शैक्षणिक सत्र 2026-27 से 1 साल का बी.एड (Bachelor of Education) कोर्स शुरू किया जा रहा है। यह 12 महीने का सघन कार्यक्रम (Intensive Programme) है, जो मुख्य रूप से स्नाकोत्तर (Postgraduate) डिग्री धारकों के लिए है। इसका उद्देश्य कम समय में योग्य उम्मीदवारों को शिक्षक बनने के लिए प्रशिक्षित करना है। देश में शिक्षक बनने की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए एक बड़ी राहत की खबर सामने आई है। करीब दस साल बाद फिर से 1 वर्षीय B.Ed कोर्स को लागू करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। नई शिक्षा नीति 2020 के तहत राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दी है। पिछले वर्षों में दो साल का B.Ed अनिवार्य होने से कई छात्रों को समय और खर्च दोनों की चुनौती झेलनी पड़ी थी। अब यह नया बदलाव उन अभ्यर्थियों के लिए खास अवसर बनकर उभरा है, जो कम समय में प्रोफेशनल टीचर ट्रेनिंग लेकर शिक्षा क्षेत्र में प्रवेश करना चाहते हैं।

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1 साल का B.Ed कोर्स विशेष रूप से उन छात्रों के लिए डिजाइन किया गया है, जिन्होंने चार वर्षीय इंटीग्रेटेड ग्रेजुएशन या पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा कर लिया है। इस कोर्स में थ्योरी के साथ-साथ प्रैक्टिकल ट्रेनिंग पर अधिक फोकस रहेगा। स्कूल इंटर्नशिप, डिजिटल टीचिंग टूल्स, स्मार्ट क्लास टेक्नोलॉजी और बाल मनोविज्ञान जैसे विषयों को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। NCTE के अनुसार, जिन छात्रों की शैक्षणिक पृष्ठभूमि पहले से मजबूत है, उनके लिए एक साल की गहन ट्रेनिंग पर्याप्त मानी गई है। इससे प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता भी तेजी से बढ़ेगी।

इस फैसले का सबसे बड़ा लाभ यह है कि अब शिक्षक बनने का रास्ता छोटा और किफायती हो जाएगा। दो साल की जगह एक साल में कोर्स पूरा होने से युवाओं का समय बचेगा और वे जल्दी शिक्षक भर्ती परीक्षाओं में शामिल हो सकेंगे। कम फीस होने से मध्यमवर्गीय और ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्रों को भी अवसर मिलेगा। शिक्षा क्षेत्र में प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी दूर करने में यह कदम मददगार साबित हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर ट्रेनिंग के साथ स्कूलों में पढ़ाई का स्तर भी सुधरेगा।

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आवेदक ने चार वर्षीय इंटीग्रेटेड स्नातक डिग्री या पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा किया हो।
सामान्य वर्ग के लिए न्यूनतम 50% अंक अनिवार्य हैं।
आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को 45% अंकों की छूट मिलेगी।
अधिकतम आयु सीमा निर्धारित नहीं की गई है।
स्नातक या परास्नातक की मार्कशीट और डिग्री प्रमाणपत्र।
आधार कार्ड या अन्य वैध पहचान पत्र।
पासपोर्ट साइज फोटो और हस्ताक्षर की स्कैन कॉपी।
जाति प्रमाणपत्र (यदि लागू हो)।
यह कोर्स अवधि में छोटा जरूर है, लेकिन इसे आधुनिक जरूरतों के अनुसार तैयार किया गया है। इसमें डिजिटल शिक्षा, नई शिक्षण पद्धतियों और व्यवहारिक प्रशिक्षण को प्राथमिकता दी गई है। सरकारी कॉलेजों में संभावित फीस 20,000 से 25,000 रुपये के बीच हो सकती है, जबकि निजी संस्थानों में यह लगभग 30,000 रुपये तक रह सकती है। कुछ राज्यों में स्कॉलरशिप और इंटर्नशिप स्टाइपेंड की सुविधा भी मिल सकती है। कम समय और कम खर्च के कारण यह कोर्स युवाओं के लिए आकर्षक विकल्प बन सकता है।

सनातनी सरकार के मंत्री के विधानसभा क्षेत्र में अवैध कत्लखाना, गौमांस और हड्डियों की तस्करी?

ग्वालियर मध्य प्रदेश: अभी हाल ही में सोमवार रात झांसी रोड पुलिस ने हिंदूवादी संगठनों से मिली सूचना पर मवेशियों की हड्डियों से भरा एक ट्रक पकड़ा था।झाँसी का था। समाजसेवी एपीएस गुर्जर और पंकज ठाकुर ने पुलिस को जानकारी दी थी कि सेवा नगर और नूरगंज क्षेत्र में गऊमास और हड्डियों की तस्करी की जाती है और उन्हीं का यह ट्रक झाँसी जा रहा है। जब तमाम समाजसेवियों की उपस्थिति में ट्रक को खोला गया तो दृश्य चौंकाने वाला था। पूरा ट्रक हड्डियों से भरा हुआ था। पुलिस ने इस मामले में आसिफ खान शाहरुख खान अनवर खान अरमान खान के खिलाफ पशु क्रूरता अधिनियम का मामला दर्ज किया था। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि यदि मामला गऊमास और हड्डियों की तस्करी से जुड़ा है तो इतना बड़ा काम इतने लंबे समय से संचालित हो रहा था तो जिम्मेदारों को खबर क्यों नहीं लगी?

समाजसेवी एपीएस गुर्जर का कहना है कि सेवा नगर किले की तलहटी पर झाड़ियों से घिरी एक सुनसान जगह है जहां यह अवैध गतिविधि लंबे समय से चल रही है।उस क्षेत्र में आप मेरी सड़क से भी कभी निकलते हैं तो मांस की दुर्गंध आपको असहज कर देती है। एपीएस गुर्जर को वहां से ट्रक भर कर हड्डियां। तस्करी करने की जानकारी थी और उन्होंने पूरी जानकारी लेने के बाद ही 9 फरवरी के रात को ट्रक निकलने की सूचना मिलने पर उसे पकड़ने का प्रयास किया था। ट्रक सेवा नगर से निकल चुका था और झांसी रोड पर उसे पकड़ने में इन्हें सफलता मिली। उन्होंने दावा किया कि ट्रक में गाय के कटे हुए पैर हड्डियां और मांस बरामद हुआ है। पुलिस इस मामले में अभी जांच की बात कर रही है।

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ऐसी जानकारी मिली है कि इन हड्डियों को झांसी और कटनी भेजा जा रहा था जहां पर इनको पीसा जाता है। मुख्य सरगना वसीम खान ने भी बताया है कि हड्डियों को पिसाई के लिए वह कटनी भेजता है। इन हड्डियों का उपयोग शक्कर की सफाई दवाईयों के कैप्सूल कवर और बोन चाइना बर्तन बनाने में होता है। इसके साथ ही इसमें फास्फोरस होने के चलते इसका उपयोग खाद के रूप में भी किया जाता है। साथ ही हड्डियों के इस पाउडर से कई दवाएं और सौंदर्य प्रसाधन भी बनाए जाते हैं। आरोपी का कहना है के उसने शिवपुरी की पंचायतों से मृत पशुओं को उठाने का ठेका लिया है। तो वहीं शासन के जिम्मेदार विभाग अपनी जिम्मेदारी की फुटबॉल इधर-उधर उछाल रहे हैं। जिला प्रशासन का कहना है कि हड्डियों और मांस के कारोबार की अनुमति निगम का अधिकार क्षेत्र है तो पशुपालन विभाग का कहना है कि वह केवल जीवित मवेशियों के व्यापार की अनुमति देता है।मांस या हड्डियों के कारोबार की नहीं वहीं नगर निगम का कहना है कि वह किसी भी प्रकार के अवैध कारोबार की अनुमति नहीं देता है। फिर मृत पशुओं और गायों को उठाने और उनके शरीर को सम्मानपूर्वक अंतिम विदाई देने की क्या व्यवस्था है इस बारे में किसी प्रशासनिक अधिकारी ने कोई जानकारी नहीं दी है।

आपको बता दें कि अभी हाल ही में भोपाल में भी एक स्लॉटर हाउस से गऊमास बड़ी मात्रा में मिलने की जानकारी मिली थी। राजधानी में चलने वाले गऊ मांस के कारोबार ने प्रदेश की मोहन सरकार पर बड़े सवाल खड़े किए थे। क्योंकि भाजपा हमेशा यह दावा करती है कि वह गौ रक्षक है। भोपाल के बाद अब ग्वालियर में सेवा नगर और नूरगंज इलाके में जिस तरह से अवैध कत्ल काना संचालित होना उजागर हुआ और यह कत्लखाना भी प्रदेश की भाजपा सरकार के ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर के क्षेत्र में आता है। आप सोचिए कि इसी तरह के कत्लखा ने जहां गऊ मांस और हड्डियों की तस्करी के आरोप लगे हो यह खुलासा किसी गैर भाजपा शासित राज्य में होता या किसी ऐसे विधायक के क्षेत्र में होता या किसी ऐसे मंत्री के क्षेत्र में होता जिसका भाजपा से कोई नाता नहीं है तो क्या आज भाजपा सड़क पर उतरकर ऐसी घटनाओं का विरोध नहीं करती? और जिस तरह से भाजपा इन मामलों पर खामोश है ऐसा लगता है कि प्रदेश की भाजपा सरकार का संरक्षण भी ऐसे तस्करों को मिला हुआ है। 

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समाजसेवियों के ऐसे आरोप हैं। ये शहर के आवारा मवेशियों को चोरी छुपे पकड़कर किले की तलहटी में लाया जाता है जहां उन्हें काटकर मांस और हड्डियों को बोरियों में भर कर तस्करी की जाती है। मुख्य सरगना वसीम खान हर महीने पांच ट्रक अवैध हड्डियां और मांस झांसी और कटनी भेज रहा है। यह पूरा अवैध धंधा मृत पशुओं के शव उठाने की आड़ में खुलेआम सेवा नगर और नूरगंज में चल रहा है। यदि यह कारोबार अभेद्य नहीं है तो इसे रात के अंधेरे में ही क्यों अंजाम दिया जाता है क्योंकि क्षेत्र के लोग भी अब बता रहे हैं कि हड्डियों और मांस से भरे हुए यह ट्रक रात के अंधेरे में ही यहां से निकाले जाते हैं। सवाल प्रदेश की भाजपा सरकार के सामने अब यह है कि भोपाल स्लॉटर हाउस के बाद अब ग्वालियर सेवानगर नूरगंज का अवैध कत्लखाना और इसके आगे और कितने ऐसे कत्लखाने?

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प्रशासनिक लापरवाही का घड़ा (कलश) भरा तो भगदड़ में मौत की सच्चाई की आवाज दबाने का हुआ तमाशा

डबरा भगदड़ हादसा: ग्वालियर के डबरा क्षेत्र में नवग्रह मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के दौरान आयोजित कलश यात्रा में हुई भगदड़ में एक महिला की मौत हो जाती है और 10 महिलाएं घायल होती हैं। यह आम लोग धार्मिक आयोजन में जाते ही मरने के लिए हैं। माफ कीजिए लेकिन यह इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि धार्मिक आयोजनों में भगदड़ और मौत का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी तमाम ऐसे मामले हो चुके हैं। बात चाहे मध्यप्रदेश की हो चाहे देश के अन्य राज्यों की धार्मिक आयोजनों में भीड़ जुटाने के लिए प्रशासन अपने आकाओं को खुश करने के लिए नियम विरुद्ध सारे हथकंडे अपनाता है और गरीब मासूमों को मौत के मुंह में ढकेल देता है। लेकिन माफ कीजिए प्रशासनिक लापरवाही का घड़ा अभी भी नहीं भरा है और मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि आने वाले समय में होने वाले धार्मिक आयोजनों में भी ऐसी घटनाएं होती रहेंगी!

डबरा नवग्रह मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का आयोजन पूर्व मंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा द्वारा किया जा रहा है। वे ही प्रमुख आयोजक हैं और भाजपा सरकार में पूर्व मंत्री हैं तो पूरी भाजपा सरकार भी इस कार्यक्रम की तैयारियों में जुटी हुई है और प्रशासन को भीड़ जुटाने से लेकर सभी तामझाम के लिए लगाया हुआ है। बड़े बड़े कथित कथावाचक और संत यहां आने वाले हैं और उनकी आवभगत जनता की सुरक्षा से ज्यादा आवश्यक है। माफ कीजिए प्रशासन की जवाबदेही आम जनता के प्रति नहीं है बल्कि नौकरी को संरक्षित रखते हैं। यही कारण है कि तमाम धार्मिक आयोजनों में हुई भगदड़ की घटनाओं को जांच के नाम पर दबा दिया जाता है। आमजन की आवाज को कुचल दिया जाता है।हाल ही में सीहोर में भी प्रदीप शास्त्री के कार्यक्रम के दौरान भगदड़ हुई थी।मौत हुई थी लेकिन उसके बाद भी किसी भी प्रशासनिक अधिकारी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई थी।

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 ऐसे आयोजनों में लगे प्रशासनिक अधिकारियों को ठीक से होमवर्क करना चाहिए। उन्हें क्राउड मैनेजमेंट का पाठ पढ़ना चाहिए। कितना क्षेत्र है? उसमें कितने लोग आ सकते हैं? कितने समय में कितने लोगों को प्रवेश देना चाहिए। यदि आयोजन स्थल पर पर्याप्त स्थान नहीं है तो भीड़ को कैसे दूसरे क्षेत्रों में रोका जाना चाहिए और कहीं कोई अव्यवस्था होती है तो भीड़ के निकासी के क्या विकल्प होने चाहिए? ऐसे ही तमाम बिंदुओं पर क्या आयोजन से पूर्व मंथन होता है?यदि मंथन होता है तो क्या इनका क्रियान्वयन होता है?यदि क्रियान्वयन होता है तो फिर यह अति शिक्षित अधिकारी इस क्रियान्वयन में फैल क्यों हो जाते हैं और यदि मंथन नहीं होता है तो फिर ऐसे अयोग्य अधिकारियों को पद पर भेजा ही क्यों जाता है? 

एक और बात मै दावे के साथ कह सकता हूं कि किसी लापरवाही से हुई मौत के मामले में जांच और कार्रवाई इस बात पर निर्भर करती है कि मरा कौन है यदि कोई आम ऐसा व्यक्ति मरता है जिसकी कोई औकात नहीं है तो फिर जांच में सभी दोषी पाक साफ पाए जाते हैं। और यकीन मानिए कि यदि ऐसे किसी धार्मिक आयोजन के भगदड़ में किसी माननीय के घर से या किसी रसूखदार ब्यूरोक्रेट्स के घर से या किसी न्यायाधीश के घर से कोई अनहोनी हो तो जांच एक अलग ही दिशा में चलेगी और कार्यवाही भी एक अलग स्वरूप में आपको नजर आएगी। लेकिन गरीब इस देश में इसलिए गरीब रखा जाता है कि वह भीड़ का हिस्सा बने और यदि मौत हो भी जाए तो लाख दो लाख रुपये उसके मुंह में ठूंस कर उसकी आवाज दबा दी जाए।

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डबरा में हुए रतिबाई साहू की मौत के मामले में भी प्रशासन ने इस परिवार की आवाज को खामोश करने और जनता के आक्रोश को रोककर अपने आकाओं को खुश करने की हर संभव कोशिश की। किसी तरह से भी किसी भी जिम्मेदार निचले स्तर के अधिकारी तक को इस भगदड़ का दोषी नहीं माना जो वहां ऑन ड्यूटी थे। किसी को दोषी मानना तो छोड़िए पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने तो भगदड़ होने की बात ही नकार दी और प्रशासन ने भी पूरा के पूरा घड़ा महिलाओं के सर पर ही मड़ दिया कि वे कलश लेने के लिए इकट्ठा हो गई थी जिसके चलते हादसे का शिकार हो गई। इस तरह प्रशासन भी अपने लापरवाही के घड़े को सुरक्षित रखता नजर आया। 

अब यहां प्रशासनिक लापरवाही को इस तरह समझिए कि यदि महिलाओं को साड़ी पहले से दी गई थी तो क्या उनका लिखित में पंजीयन किया गया था उनकी सूची बनाई गई थी जितनी महिलाओं को कलश दिए जाने थे उनको सूची के आधार पर अलग अलग गेट पर क्यों नहीं बुलाया गया स्टेडियम के तमाम गेट बंद कर एक ही गेट पर भीड़ जमा क्यों की गई। और जब महिलाओं की भीड़ बढ़ रही थी तो वहां पहुंचने वाली महिलाओं को बैरिकेट्स लगाकर क्यों नहीं रोका गया? कलश कलश के खेल में अपनी लापरवाही को छुपाने का तमाम प्रयास प्रशासन कर ले। लेकिन साफ दिखाई देता है कि ऐसे बड़े आयोजनों में प्रशासन केवल वीआईपी सर्कल के आसपास ही व्यवस्थाओं को दुरुस्त रखता है और आम जन को राम भरोसे छोड़ देता है। और राम तो आजकल माननीयों के घर पर जाकर उनके भाग खोलते हैं। आमजन की तो शायद उन्हें भी चिंता नहीं।

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पूरी घटना के बाद प्रशासन और आयोजक अपने कार्यक्रम में ही लगे रहे। गरीब की मौत पर उन्हें संवेदना दिखाने का भी वक्त नहीं मिला।एक महिला की मौत हुई तमाम महिलाएं घायल अभी भी इलाज करा रही हैं। जब सोशल मीडिया पर आयोजन पर सवाल खड़ा करते हुए तमाम खबरें चलने लगी तब प्रशासन ने कार्रवाई की लीपापोती शुरू की इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती महिलाओं को देखने प्रशासन की टीम पहुंची। लेकिन इसी बीच प्रशासन ने अपना एक और कारनामा किया कि रत्ती बाई साहू के परिवार और रिश्तेदार जब इस अव्यवस्था पर आवाज उठाने की कोशिश कर रहे थे तो उनकी आवाज को दबाने का हर भरसक प्रयास किया। वे चक्का जाम करने जा रहे थे जहां उन्हें दबाव बनाकर रोका गया और इसके साथ ही ग्यारह बजे हुई रती बाई की मौत के बाद चार घंटे के भीतर ही उसका पोस्टमार्टम करके अंतिम संस्कार भी जल्दबाजी में करा दिया गया और गरीब परिवार की आवाज अंग्रेजी हुकूमत की तर्ज पर दबा दी गई। यह घटना और ऐसी ही पूर्व की घटनाएं साफ बताती हैं कि इस देश में गरीब के लिए न कोई कानून है न न्याय और गरीब की मजबूरी भी है कि चंद रुपये लेकर उसे खामोश होना पड़ता है! चलिए प्रशासन की लापरवाही का घड़ा भरने का इंतजार करते हैं…..

डिजिटल फ्रॉड पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, बैंकों के मिली भगत पर कह दी बड़ी बात

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नई दिल्ली डिजिटल डेस्क: देश में लगातार बढ़ रहे डिजिटल फ्रॉड के मामलों को लेकर एक तरफ जहां जनता परेशान है तो दूसरी ओर सरकार सोई हुई है इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने डिजिट फ्रॉड के मामलों में सख्त टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल फ़्रांस को रोकने के लिए केंद्र सरकार से स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर तैयार करने के लिए कहा है।भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा है कि डिजिटल फ्रॉड में जनता द्वारा गवाई गई रकम कई छोटे राज्यों में बजट से भी ज्यादा है। आपको बता दें कि हर साल भारत में चौवन हजार करोड़ रुपए का डिजिटल फ्रॉड होता है और इस तरह के फ्रॉड को सुप्रीम कोर्ट ने सीधी डकैती करार दिया है।

पीआईबी की ताजा रिपोर्ट्स में जो आंकड़े पेश किए गए हैं उसके अनुसार देश में डिजिटल फ्रॉड के केस दो हजार बाईस में 10.29 लाख से बढ़कर दो हजार चौबीस में 22.68 लाख हो गए हैं यह एक अप्रत्याशित वृद्धि है। इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेन्टर के अनुसार 2024 में 22.849 करोड़ का नुकसान हुआ वहीं 2025 में 19.813 करोड का नुकसान जनता को हुआ। साइबर फ्रॉड से जुड़ी इक्कीस लाख से ज्यादा शिकायतें नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पर दर्ज हुई। एक ही साल में बाईस लाख से ज्यादा शिकायतें चौंकाने वाली हैं और हो सकता है कि कई छोटे मामलों में तो शिकायतें दर्ज तक नहीं हुई हो। सबसे बड़ी हैरान करने वाली बात है कि दो साल में ही साइबर फ्रॉड की दर्ज शिकायतें दोगुनी से ज्यादा बढ़ चुकी हैं।

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चीफ जस्टिस सूर्यकान्त की अध्यक्षता वाली बैंक ने कहा है कि 54 हजार करोड का डिजिटल फ्रॉड कई छोटे राज्यों के बजट से भी ज्यादा हैं। ऐसे अपराधों में बैंक अधिकारियों की मिलीभगत या लापरवाही हो सकती है इसलिए समय पर कार्रवाई बेहद जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए गृह मंत्रालय को निर्देश दिए हैं कि आरबीआई दूरसंचार विभाग और अन्य स्टेकहोल्डर्स की एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर को देखते हुए चार हफ्ते में ड्राफ्ट तैयार किया जाए। कोर्ट ने कहा कि आरबीआई ने एक एसओपी बनाई है। इसके तहत साइबर फ्रॉड रोकने के लिए बैंकों के पास डेबिट कार्ड को अस्थायी रूप से होल्ड करने का प्रावधान है। 

बैंकों के मिलीभगत और लापरवाही को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि हमने देखा है कि डिजिटल गिरफ्तारी मामलों में बैंक अफसर आरोपियों के साथ पूरी तरह हाथ में हाथ डाले हुए हैं। ये बैंक बोझ बनते जा रहे हैं। इन्हें समझना चाहिए कि वे जनता के पैसों के संरक्षक हैं उस भरोसे को नहीं तोड़ना चाहिए। समस्या यह भी है कि बैंक धोखेबाजों को कर्ज देते हैं और फिर एनसीएलटी जैसे मंच सामने आते हैं। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह से डिजिटल फ्रॉड के मामले में बैंकों को कटघरे में खड़ा किया है उससे उम्मीद जताई जा सकती है कि आने वाले समय में बैंक अपनी कार्यशैली में बदलाव लाएंगे और ग्राहकों के हित में डिजिटल फ्रॉड के मामलों को रोकने के लिए मजबूत नीति बनाएंगे। 

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