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खबर ये नहीं कि एंबुलेंस के लिए ग्रीन कॉरिडोर बनाया। खबर यह है कि प्रदेश सरकार की एयर एंबुलेंस योजना खोखली साबित हुई

एयर एंबुलेंस सेवा में शुरुआत से जनवरी 2026 तक विमान कंपनियों से 1,200 घंटे उड़ान का अनुबंध था लेकिन 204 यानी 17 प्रतिशत घंटे का ही उपयोग हुआ। इन्हीं सब कारणों के चलते एयर एंबुलेंस सेवा की प्रभावशीलता पर कई बार सवाल उठे हैं। और यही सवाल आज ग्वालियर में एमबीबीएस इंटर्न को एयर एंबुलेंस न मिलने पर उठना वाजिब है

ग्वालियर मध्य प्रदेश: ग्वालियर के गजराज मेडिकल कालेज में एमबीबीएस के बाद इंटरन करने आए छात्र की हालत अचानक बिगड़ी उसको सीवियर हार्ट अटैक आया। हालत इतनी खराब हुई कि उसे तुरंत वेंटिलेटर का सपोर्ट देना पड़ा और ग्वालियर के प्रतिष्ठित कार्डियोलॉजिस्ट डॉक्टर पुलिस रस्तोगी अपनी टीम के साथ उसकी निगरानी में लगे रहे। यहां उसकी हालत नहीं सुधर रही थी इसलिए निर्णय लिया गया कि उसे एयर एंबुलेंस से तुरंत दिल्ली ले जाने का निर्णय हुआ लेकिन जब एयर एंबुलेंस बुलाई गई तो शासन के सारे दावों की पोल खुल गई। एंबुलेंस घंटों इंतजार के बाद भी आई नहीं। तब रात दस बजे ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया और छात्र को दिल्ली तक सड़क मार्ग से एंबुलेंस से ले जाने का निर्णय लिया गया।

आज तमाम खबरों को देखा तो उसमें ग्रीन कॉरिडोर बनाने की वाहवाही तो प्रमुखता से छपी है लेकिन शासन की एयर एंबुलेंस योजना किस तरह खोखली है और जरूरत पड़ने पर उपलब्ध नहीं होती है उसकी हकीकत एक बार फिर सामने आ चुकी है। एयर एंबुलेंस की सेवा तत्काल उपलब्ध होने की बजाय यदि घंटों इंतजार करना पड़े तो कोई एयर एंबुलेंस की सुविधा लेगा ही क्यों और इस मामले में एयर एंबुलेंस का इंतजार करने में ही काफी घंटे बर्बाद हो गए ओकी। एयर एंबुलेंस का इंतजार करते करते सुबह से शाम हो गई। खबरों में छपा है कि रात तक एयर एंबुलेंस नहीं आ सकी। मैं एयर एंबुलेंस लैंड नहीं हो सकी और तब जाकर आपात स्थिति में रात को दस बजे क्रीम कॉरिडोर बनाया गया और जेएएस से पुरानी छावनी तक की दूरी बीस मिनट में तय की गई।

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छात्र की हालत बिगड़ रही थी इसलिए एयर एंबुलेंस से उसे दिल्ली ले जाना था। एयर एंबुलेंस की उपलब्ध न होने पर रात को 9:30 बजे ट्रैफिक पुलिस को सूचना दी गई और महज 1/2 घंटे में ही सारे इंतजाम कर लिए गए और तुरंत ही जय आरोग्य अस्पताल से  एंबुलेंस को निकालकर पुरानी छावनी हाईवे तक बिना ट्रैफिक रुकावट के बीस मिनट में पहुंचा दिया गया।उसके बाद एंबुलेंस दिल्ली के लिए रवाना हो गई। निस्संदेह प्रशासन और ट्रैफिक पुलिस द्वारा बरती गई तत्परता से ग्रीन कॉरिडोर बनाने में मदद मिली और बहुत कम समय में यह एंबुलेंस पुरानी छावनी पहुंच गई। अन्यथा यह सफर तय करने में हमारे प्रदेश की घटिया एंबुलेंस को एक घंटे से अधिक समय लगता है। यह मेरा स्वयं का अनुभव है।

इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह आई के हार्ट अटैक के मरीज एमबीबीएस इंटर शैलेंद्र के माता पिता को न तो मध्यप्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं पर भरोसा था और न मध्य प्रदेश की एंबुलेंस पर जानकारी यह मिली है कि शैलेन्द्र का इलाज ग्वालियर के कार्डियोलॉजी विभाग में भली भांति चल रहा था लेकिन जब उनके माता पिता दिल्ली से आए तो उन्होंने यहां की सुविधाओं पर भरोसा न जताते हुए अपने बेटे को दिल्ली ले जाने का निर्णय लिया। उन्होंने दिल्ली अपोलो में पहले से ही बात कर रखी थी।उन्होंने अपने बेटे को दिल्ली ले जाने के लिए यहां की एंबुलेंस तक पर भरोसा नहीं किया। इसलिए पहले से ही अपोलो में बात करने के चलते अपोलो से ही वेल इक्युप्ड और विशेषज्ञ डॉक्टर्स की टीम के साथ एंबुलेंस ग्वालियर आई थी। और इसी एंबुलेंस के लिए ग्वालियर में ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया। 

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अब मध्यप्रदेश में एयर एंबुलेंस की हकीकत जान लीजिए। मध्य प्रदेश के पांच जिलों में ही जरूरतमंदों को एयर एंबुलेंस सेवा का लाभ मिला। पीएम श्री एयर एंबुलेंस सेवा के तहत प्रदेश में कुल 127 रोगियों को लाभान्वित किया गया, इनमें से सर्वाधिक 44 रोगी उप मुख्यमंत्री व स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल के गृह जिले रीवा के हैं। इसी तरह जबलपुर 21, भोपाल 14, छतरपुर 11 और ग्वालियर के पांच रोगी लाभान्वित हुए हैं। वहीं, 32 जिलों में इस सुविधा का उपयोग ही नहीं किया गया। यह आंकड़े साफ बता रहे हैं कि जिस उद्देश्य से जिंदाों के साथ एयर एंबुलेंस शुरू की गई थी वह अब तक दूर की कोड़ी साबित हुए हैं। 

राज्य सरकार ने गंभीर मरीजों को आपात चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से जून 2024 में पीएम श्री हवाई एंबुलेंस सेवा शुरू की थी। लेकिन जमीनी स्तर पर यह सेवा अपेक्षित लाभ नहीं दे पा रही। कुछ मरीजों को तीन से चार दिन तक एयर एंबुलेंस का इंतजार करना पड़ा। जबकि, अनुबंध के अनुसार निर्धारित हेलीकाप्टर और फिक्स्ड-विंग फ्लाइंग आइसीयू को प्रदेश में ही 24 घंटे, सातों दिन उपलब्ध रहना था। राज्य सरकार ने इस सेवा के लिए विमानन कंपनी फ्लाय ओला से अनुबंध किया है, जिसे प्रति मरीज औसतन 40 लाख रुपये का भुगतान किया जाता है।

अनुबंध के अनुसार विगत वर्ष में फिक्स्ड विंग एयर एम्बुलेंस कुल 720 घंटे में से 25 प्रतिशत घंटे का ही उपयोग किया। सरकार का दावा है कि योजना के व्यापक प्रचार-प्रसार से यह उपयोगिता इस वर्ष बढ़कर 57 प्रतिशत हुई है। इसी तरह हेली एंबुलेंस के कुल 480 घंटे में से केवल सात प्रतिशत घंटे ही उपयोग हो पाए। इस वर्ष उपयोगिता बढ़कर 22 प्रतिशत हुई है। योजना की शुरुआत से जनवरी 2026 तक विमान कंपनियों से 1,200 घंटे उड़ान का अनुबंध था लेकिन 204 यानी 17 प्रतिशत घंटे का ही उपयोग हुआ। इन्हीं सब कारणों के चलते एयर एंबुलेंस सेवा की प्रभावशीलता पर कई बार सवाल उठे हैं। और यही सवाल आज ग्वालियर में एमबीबीएस इंटर्न को एयर एंबुलेंस न मिलने पर उठना वाजिब है।

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Gajendra Ingle
Gajendra Inglehttp://theinglespost.com
The author is founder Editor of this news portal. He has long experience of journalism. He has deep expertise on political and social issues.
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