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मौत का हाईवे, चार साल से चार लेन के इंतजार में चार हिस्सेदारों का खेल और अनगिनत मौत

ग्वालियर भिंड मध्य प्रदेश: ऐसे हाईवे की हकीकत जहां पर अक्सर मौत की खबरें आती हैं और खबरों के बाद 4 दिन तक घमासान होता है। हम बात कर रहे हैं ग्वालियर भिंड राष्ट्रीय राजमार्ग 719 की। शनिवार सुबह लगभग चार बजे इसी हाईवे पर एक भीषण हादसा छीमक गाँव के पास होता है जिसमें एक बस और यात्रियों से भरी बैन आमने सामने से टकरा जाती हैं। टक्कर इतनी भीषण होती है की वैन के परखच्चे उड़ जाते हैं। इस भीषण हादसे में पांच लोगों की मौत होती है और छह लोग घायल हो जाते हैं। इन हादसों के पीछे का एक बड़ा कारण यह है कि यह हाईवे अब तक चार लेन नहीं हो सका है जबकि चार साल से इस हाइवे के चार लेन होने की फाइल कहीं धूल खा रही है और इस चार पाँच छह के खेल में अनगिनत लोग अपनी जान गंवा रहे हैं।

यह देश के उन कुछ मौत के हाइवे में से एक है जहां मौत के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग 719 पर पिछले 50 दिनों में 25 लोगों की जान जा चुकी है और कई लोग घायल हो चुके हैं। अभी हाल ही में इकतीस जनवरी को भी इस हाईवे पर एक भीषण हादसा हुआ था जिसमें चार लोगों की मौत हो गई थी। यह मौत का हाईवे है। यहाँ कभी भी आप मौत का सामना कर सकते हैं और इसका कारण यह है कि इस हाईवे पर ट्रैफिक लोड ज्यादा है और हाईवे बहुत सकरा है। हाइवे को फोरलेन में परिवर्तित किए जाने की मांग लंबे समय से उठ रही है और जब भी मांग उठती है तो कुछ दिनों के लिए इसकी फाइल इधर से उधर घूमा दी जाती है और जनप्रतिनिधि बड़े वादे करके आश्वासन दे के जनता के आक्रोश को शांत कर देते हैं। चार साल से चार लेन के लिए अटकी यह मांग चार दिन तक आक्रोश में बदलने के बाद किसी चारदीवारी में कैद कर दी जाती है।

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शनिवार को भीषण हादसा हुआ। पांच लोगों की मौत हुई। और एक बार फिर इस रोड के चौड़ीकरण की मांग उठने लगी। इस रोड के चौड़ीकरण को लेकर भिंड और ग्वालियर के आम नागरिकों के साथ-साथ संत समाज भी उग्र आंदोलन कर चुका है। संत समाज के कालिदास महाराज ने एक बार फिर चेतावनी दी है कि यदि चौड़ीकरण का कार्य जल्द शुरू नहीं हुआ तो फिर से आंदोलन किया जाएगा। विरोध और आक्रोश कितना भी हो लेकिन हमारी चुनी गई सरकार इतनी निरंकुश हो चुकी है कि उसे कोई फर्क पड़ता नहीं है। आए दिन इस हाईवे पर एक्सीडेंट होते हैं। छोटे मोटे एक्सीडेंट की तो अब यहां बात ही नहीं होती केवल वह एक्सीडेंट जो भीषण हो जिसमें कुछ लोगों की मौत हो वही खबरों में आता है उसी की चर्चा होती है। 

मौत के इस हाईवे के पीछे की लापरवाही और यहां होने वाली मौत का दोषी हर वह व्यक्ति है जो इस हाइवे के चौड़ीकरण के काम में रोड़ा अटका रहा है चाहे वह कोई जिम्मेदार अधिकारी हो चाहे कहीं वो जनप्रतिनिधि हो। और सबसे बड़ा दोषी है नितिन गडकरी जो कई बार हाई वे निर्माण के लिए बड़ी बड़ी बातें करते नज़र आते हैं। हजार दो हजार दस हजार करोड़ की बात ऐसे करते हैं जैसे पैसा अपनी जेब से दे रहे हो। उनकी बड़ी बड़ी घोषणाओं और उनकी दूरदर्शिता की जद में अभी तक ग्वालियर भिंड हाइवे क्यों नहीं आ पाया? या आने के बाद भी वह यहां काम क्यों नहीं शुरू करा पाए यह प्रश्न कहीं न कहीं अपना जवाब ढूंढ रहा है। 

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शनिवार को पांच मौतें एक बार फिर हो चुकी हैं और कुछ नहीं कहा जा सकता कि कुछ दिन बीते और फिर से एक भीषण हादसे की खबर आ जाए। 4 साल से इस हाईवे को फोरलेन करने की मांग उठ रही है। कई आंदोलन हो चुके हैं लेकिन फाइल कहीं न कहीं फंसी हुई है। अब यह फाइल जिसकी वजह से भी फंसी है और जिस वजह से भी यह भीषण हादसे हो रहे हैं उन सबके पीछे उन लोगों को दोषी माना जाना चाहिए जिनकी वजह से इस हाइवे के फोर लेन होने में देरी हो रही है जिन्होंने अपने हिस्सेदारी के चक्कर में इस फाइल को कहीं अटका रखा है। 

खबर ये नहीं कि एंबुलेंस के लिए ग्रीन कॉरिडोर बनाया। खबर यह है कि प्रदेश सरकार की एयर एंबुलेंस योजना खोखली साबित हुई

ग्वालियर मध्य प्रदेश: ग्वालियर के गजराज मेडिकल कालेज में एमबीबीएस के बाद इंटरन करने आए छात्र की हालत अचानक बिगड़ी उसको सीवियर हार्ट अटैक आया। हालत इतनी खराब हुई कि उसे तुरंत वेंटिलेटर का सपोर्ट देना पड़ा और ग्वालियर के प्रतिष्ठित कार्डियोलॉजिस्ट डॉक्टर पुलिस रस्तोगी अपनी टीम के साथ उसकी निगरानी में लगे रहे। यहां उसकी हालत नहीं सुधर रही थी इसलिए निर्णय लिया गया कि उसे एयर एंबुलेंस से तुरंत दिल्ली ले जाने का निर्णय हुआ लेकिन जब एयर एंबुलेंस बुलाई गई तो शासन के सारे दावों की पोल खुल गई। एंबुलेंस घंटों इंतजार के बाद भी आई नहीं। तब रात दस बजे ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया और छात्र को दिल्ली तक सड़क मार्ग से एंबुलेंस से ले जाने का निर्णय लिया गया।

आज तमाम खबरों को देखा तो उसमें ग्रीन कॉरिडोर बनाने की वाहवाही तो प्रमुखता से छपी है लेकिन शासन की एयर एंबुलेंस योजना किस तरह खोखली है और जरूरत पड़ने पर उपलब्ध नहीं होती है उसकी हकीकत एक बार फिर सामने आ चुकी है। एयर एंबुलेंस की सेवा तत्काल उपलब्ध होने की बजाय यदि घंटों इंतजार करना पड़े तो कोई एयर एंबुलेंस की सुविधा लेगा ही क्यों और इस मामले में एयर एंबुलेंस का इंतजार करने में ही काफी घंटे बर्बाद हो गए ओकी। एयर एंबुलेंस का इंतजार करते करते सुबह से शाम हो गई। खबरों में छपा है कि रात तक एयर एंबुलेंस नहीं आ सकी। मैं एयर एंबुलेंस लैंड नहीं हो सकी और तब जाकर आपात स्थिति में रात को दस बजे क्रीम कॉरिडोर बनाया गया और जेएएस से पुरानी छावनी तक की दूरी बीस मिनट में तय की गई।

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छात्र की हालत बिगड़ रही थी इसलिए एयर एंबुलेंस से उसे दिल्ली ले जाना था। एयर एंबुलेंस की उपलब्ध न होने पर रात को 9:30 बजे ट्रैफिक पुलिस को सूचना दी गई और महज 1/2 घंटे में ही सारे इंतजाम कर लिए गए और तुरंत ही जय आरोग्य अस्पताल से  एंबुलेंस को निकालकर पुरानी छावनी हाईवे तक बिना ट्रैफिक रुकावट के बीस मिनट में पहुंचा दिया गया।उसके बाद एंबुलेंस दिल्ली के लिए रवाना हो गई। निस्संदेह प्रशासन और ट्रैफिक पुलिस द्वारा बरती गई तत्परता से ग्रीन कॉरिडोर बनाने में मदद मिली और बहुत कम समय में यह एंबुलेंस पुरानी छावनी पहुंच गई। अन्यथा यह सफर तय करने में हमारे प्रदेश की घटिया एंबुलेंस को एक घंटे से अधिक समय लगता है। यह मेरा स्वयं का अनुभव है।

इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह आई के हार्ट अटैक के मरीज एमबीबीएस इंटर शैलेंद्र के माता पिता को न तो मध्यप्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं पर भरोसा था और न मध्य प्रदेश की एंबुलेंस पर जानकारी यह मिली है कि शैलेन्द्र का इलाज ग्वालियर के कार्डियोलॉजी विभाग में भली भांति चल रहा था लेकिन जब उनके माता पिता दिल्ली से आए तो उन्होंने यहां की सुविधाओं पर भरोसा न जताते हुए अपने बेटे को दिल्ली ले जाने का निर्णय लिया। उन्होंने दिल्ली अपोलो में पहले से ही बात कर रखी थी।उन्होंने अपने बेटे को दिल्ली ले जाने के लिए यहां की एंबुलेंस तक पर भरोसा नहीं किया। इसलिए पहले से ही अपोलो में बात करने के चलते अपोलो से ही वेल इक्युप्ड और विशेषज्ञ डॉक्टर्स की टीम के साथ एंबुलेंस ग्वालियर आई थी। और इसी एंबुलेंस के लिए ग्वालियर में ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया। 

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अब मध्यप्रदेश में एयर एंबुलेंस की हकीकत जान लीजिए। मध्य प्रदेश के पांच जिलों में ही जरूरतमंदों को एयर एंबुलेंस सेवा का लाभ मिला। पीएम श्री एयर एंबुलेंस सेवा के तहत प्रदेश में कुल 127 रोगियों को लाभान्वित किया गया, इनमें से सर्वाधिक 44 रोगी उप मुख्यमंत्री व स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल के गृह जिले रीवा के हैं। इसी तरह जबलपुर 21, भोपाल 14, छतरपुर 11 और ग्वालियर के पांच रोगी लाभान्वित हुए हैं। वहीं, 32 जिलों में इस सुविधा का उपयोग ही नहीं किया गया। यह आंकड़े साफ बता रहे हैं कि जिस उद्देश्य से जिंदाों के साथ एयर एंबुलेंस शुरू की गई थी वह अब तक दूर की कोड़ी साबित हुए हैं। 

राज्य सरकार ने गंभीर मरीजों को आपात चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से जून 2024 में पीएम श्री हवाई एंबुलेंस सेवा शुरू की थी। लेकिन जमीनी स्तर पर यह सेवा अपेक्षित लाभ नहीं दे पा रही। कुछ मरीजों को तीन से चार दिन तक एयर एंबुलेंस का इंतजार करना पड़ा। जबकि, अनुबंध के अनुसार निर्धारित हेलीकाप्टर और फिक्स्ड-विंग फ्लाइंग आइसीयू को प्रदेश में ही 24 घंटे, सातों दिन उपलब्ध रहना था। राज्य सरकार ने इस सेवा के लिए विमानन कंपनी फ्लाय ओला से अनुबंध किया है, जिसे प्रति मरीज औसतन 40 लाख रुपये का भुगतान किया जाता है।

अनुबंध के अनुसार विगत वर्ष में फिक्स्ड विंग एयर एम्बुलेंस कुल 720 घंटे में से 25 प्रतिशत घंटे का ही उपयोग किया। सरकार का दावा है कि योजना के व्यापक प्रचार-प्रसार से यह उपयोगिता इस वर्ष बढ़कर 57 प्रतिशत हुई है। इसी तरह हेली एंबुलेंस के कुल 480 घंटे में से केवल सात प्रतिशत घंटे ही उपयोग हो पाए। इस वर्ष उपयोगिता बढ़कर 22 प्रतिशत हुई है। योजना की शुरुआत से जनवरी 2026 तक विमान कंपनियों से 1,200 घंटे उड़ान का अनुबंध था लेकिन 204 यानी 17 प्रतिशत घंटे का ही उपयोग हुआ। इन्हीं सब कारणों के चलते एयर एंबुलेंस सेवा की प्रभावशीलता पर कई बार सवाल उठे हैं। और यही सवाल आज ग्वालियर में एमबीबीएस इंटर्न को एयर एंबुलेंस न मिलने पर उठना वाजिब है।

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ग्वालियर मध्य प्रदेश: ग्वालियर के शासकीय गजरा राजा मेडिकल कालेज में इंटर्नशिप कर रहे एक पच्चीस वर्षीय छात्र को शुक्रवार देर रात सीवियर हार्ट अटैक आ गया। समय रहते डॉक्टर्स ने उनका इलाज शुरू कर दिया है लेकिन अभी वह वेंडीलेटर सपोर्ट पर हैं और उनकी हालत नाजुक बनी हुई है। हालत में सुधार के बारे में अभी डॉक्टर्स ने कोई जानकारी नहीं दी है। इतनी कम उम्र में सीवियर हार्ट अटैक की वजह क्या रही इस बारे में भी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है। छात्र दिल्ली का रहने वाला है और एमबीबीएस करने के बाद इंटर्नशिप के लिए जीआरएमसी ग्वालियर में है।

छात्र शैलेन्द्र को शुक्रवार रात 1130 बजे अचानक कंधे के ऊपर दर्द हुआ और सीने में मदद हुआ। शुरुआत में लापरवाही बरतते हुए उसने इसे सामान्य दर्द समझा लेकिन जब दर्द बढ़ा तो वह खुद ही न्यूरो सर्जरी विभाग पहुँच गया। वहां पहुंचते ही बेहोश हो गया। डॉक्टर्स ने जांच के बाद पाया कि इस छात्र को सीवियर हार्ट अटैक आया है और तुरंत उसे इलाज दिया गया हालत गंभीर होने के चलते छात्र को वेंटिलेटर पर रखा गया। गलजा राजा मेडिकल कालेज के कार्डियोलॉजी विभाग के डॉ पुनीत रस्तोगी जूनियर डॉक्टर्स के साथ छात्र शैलेंद्र का इलाज कर रहे हैं।छात्र की स्थिति पर पूरी तरह निगरानी रखी हुई है।

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मेडिकल कालेज से मिली जानकारी के अनुसार वैसे तो छात्र पूरी तरह स्वस्थ हैं। लेकिन कुछ समय पूर्व दिल्ली में हुए एक हादसे में छात्र की माँ की मौत हो गई थी। इसके बाद से ही वह तनाव की स्थिति में था। यह तनाव की स्थिति भी छात्र के सीवियर हार्ट अटैक की वजह हो सकती है लेकिन अभी तक इस हार्ट अटैक की प्रमाणिक वजह डॉक्टर्स ने नहीं बताई है। छात्र अभी वेंटिलेटर पर हैं। छात्र की स्थिति नाजुक बनी हुई है। छात्र की स्वास्थ्य स्थिति पर सभी डॉक्टर्स निगरानी रखे हुए हैं। घटना की जानकारी छात्र के परिजनों को दे दी गई है।

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10 साल से दबा एआरटीओ भर्ती घोटाला एक बार फिर सवालों के घेरे में

ग्वालियर मध्य प्रदेश: अपनी गर्व झाले और नियमबद्ध कारनामों के लिए पहचान रखने वाले मध्यप्रदेश परिवहन विभाग का एक कारनामा एक बार फिर सुर्खियों में हालांकि मामला दस साल पुराना है और काफी लंबे समय से दबाए रखा गया था लेकिन अब कैग ने अपनी रिपोर्ट में इस अनियमितता पर सवाल उठाए हैं। मामला दो हजार चौदह में एआरटीओ की तेरह पदों पर भर्ती से जुड़ा हुआ है। जब इन तेरह पदों पर एक बार की जगह दो बार भर्ती कर दी गई और कुल छब्बीस अभ्यर्थियों को सेलेक्ट किया गया लेकिन जब दूसरी बार भर्ती किए गए तेरह एआरटीओ को पोस्टिंग नहीं मिली और वह कोर्ट पहुंचे तब मामले का खुलासा हुआ।

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक कैग की रिपोर्ट में परिवहन विभाग की एआरटीओ भर्ती प्रक्रिया के मामले में गंभीर अनियमितताएं उजागर हुई हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि ए आरटीओ के 13 पदों के लिए भेजी गई मांग को विभाग ने गलती से दूसरी बार भेज दिया था और इस गलती के बाद इसे सुधारने की बजाय भुला दिया गया। विभाग ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। इस वजह से तेरह पदों के लिए कुल छब्बीस अभ्यर्थियों का चयन हो गया और बाद में चयनित तेरह अभ्यर्थियों को पोस्टिंग नहीं मिल पाई।

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कैग की रिपोर्ट में बताया गया है की दो हजार चौदह में तेरह पदों के लिए मांग भेजी थी जिस पर परीक्षा कराकर अगस्त दो हजार सोलह में तेरह अभ्यर्थियों के भर्ती की अनुशंसा की गई और दिसंबर दो हजार सोलह में उन्हें नियुक्तियां दे दी गई लेकिन दो हजार चौदह सितंबर में इन्हीं पदों के लिए फिर से मांग भेजी थी जिस पर फिर से परीक्षा दिसंबर दो हजार चौदह में आयोजित हुई और तेरह अभ्यर्थियों के भर्ती की अनुशंसा फिर से कर दी गई। इस गड़बड़ का पता चलने के बाद विभाग ने दस साल तक मामला दबाए रखा। जब दूसरे सूची के अभ्यर्थियों को नियुक्ति नहीं मिली तो मामला न्यायालय पहुंचा और शासन ने पदोन्नति के उन्नीस पदों में से समायोजन कर इन तेरह अभ्यर्थियों में से नौ अभ्यर्थियों को नियुक्ति दे दी।

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केग की रिपोर्ट में बताया गया है यह एक गंभीर चूक है। यह आंतरिक नियंत्रण की विफलता है और इसमें जिम्मेदारी तय करने की जरूरत है। यह मामला परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है जहां एक ही पदों पर दो बार भर्ती प्रक्रिया कर दी गई। साथ ही परिवहन विभाग के अधिकारियों ने इस गड़बड़ को सुधारने की बजाय दस साल तक दबाकर रखा। हालांकि इस मामले में अभी तक किसी दोषी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है जबकि शासन को पूरी तरह से इस मामले की जानकारी है।अब देखना होगा कि कैग रिपोर्ट के बाद इस मामले में दोषियों पर क्या कार्रवाई होती है?

जयप्रकाश राजोरिया मुश्किल में, भ्रष्टाचार के मामले में लोकायुक्त में हुई शिकायत

ग्वालियर मध्य प्रदेश: ग्वालियर के जीवाजी विश्वविद्यालय और भारतीय यात्रा प्रबंधन संस्थान में सिक्योरिटी गार्ड उपलब्ध कराने वाली संस्था सर्विस सिक्योरिटी एजेंसी द्वारा वित्तीय अनियमितता किए जाने और नियम विरुद्ध दस साल से टेंडर लेने के मामले में जीवाजी विश्वविद्यालय भारतीय यात्रा प्रबंधन संस्थान शर्मा सर्विस सिक्योरिटी एजेंसी के संचालक जयप्रकाश साजोरिया लक्ष्मी शर्मा व अन्य के खिलाफ लोकायुक्त में शिकायत दर्ज की गई है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि दस साल से नियमों को ताक में रखते हुए शर्मा सर्विस सिक्योरिटी एजेंसी को गलत तरीके से लाभ दिया गया है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि 2015 से 2025 तक उक्त संस्थानों में सुरक्षा का ठेका एक ही एजेंसी शर्मा सर्विस सिक्योरिटी एजेंसी को दिया गया है। इस मामले में जीवाजी विश्वविद्यालय के जिम्मेदारों की बड़ी लापरवाही वह अनियमितता भी नजर आ रही है।

छह पन्नों की लिखित शिकायत में शिकायतकर्ता का आरोप है कि 2015 से 2025 तक जीवाजी विश्वविद्यालय के विभिन्न कुलपति और कुलसचिव और भारतीय यात्रा प्रबंधन संस्थान के कुलपति ने शर्मा सर्विस सिक्योरिटी एजेंसी बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार किया गया है। जीवाजी विश्वविद्यालय में पिछले कई सालों से मैनपावर और सिक्योरिटी व्यवस्था सवालों के घेरे में रहती है। इसमें नियमों का और सुरक्षा अधिनियम एक्ट 2005 का कोई पालन नहीं किया गया है। मनमाने तरीके से राजनीतिक दबाव के चलते जीवाजी विश्वविद्यालय के कुलपति कुलसचिव द्वारा 2015 से 2025 तक उक्त शर्मा एजेंसी को सुरक्षा कार्य दिया गया है। हर वर्ष टेंडर प्रक्रिया होनी चाहिए लेकिन इस मामले में टेंडर प्रक्रिया नहीं निकाली गई और शर्मा सर्विस को लाभ दिया गया। 

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आपको बता दें कि शर्मा सर्विस सिक्योरिटी एजेंसी लंबे समय से सुरक्षा गार्ड और मैन पावर देने का काम कर रही है। जिसका कार्यालय मोहनपुर थाटीपुर क्षेत्र में है और इसके संचालक वर्तमान ग्वालियर जिला भाजपा अध्यक्ष जयप्रकाश राजौरिया लक्ष्मी शर्मा एवं अन्य हैं। पिछले दस साल से इसी एजेंसी को किस तरह से जीवाजी विश्वविद्यालय और भारतीय यात्रा प्रबंधन संस्थान में कार्य मिल रहा है और लोकायुक्त में की गई शिकायत के संबंध में जानकारी लेने के लिए जयप्रकाश राजोरिया का पक्ष जानने के लिए उनके मोबाइल नंबर पर संपर्क किया गया। उन्होंने फोन उठाकर किसी कार्यक्रम में व्यस्त होने की बात कहकर फोन काट दिया। इस मामले में शिकायतकर्ता जयप्रकाश मौर्य से बात की तो उनका साफ कहना है की बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ है और यदि लोकायुक्त इसकी सही तरीके से जांच करता है तो काफी बड़े मात्रा में भ्रष्टाचार उजागर होगा।

आपको बता दें कि समय समय पर समाचार पत्रों में भी जीवाजी विश्वविद्यालय में एक ही एजेंसी को सुरक्षा ठेका दिए जाने पर खबरें छपती हैं और सवाल खड़े होते हैं। लेकिन इसके बाद भी कोई बदलाव नहीं होता है। शिकायतकर्ता जयप्रकाश मौर्य ने भी तमाम खबरों को साक्ष्य के रूप में लोकायुक्त में की गई शिकायत के साथ प्रस्तुत किया है। साथ ही अन्य दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं। शिकायतकर्ता ने शर्मा सर्विस सिक्योरिटी एजेंसी को बार बार एक्सटेंशन दिए जाने को गंभीर मामला बताया। शिकायतकर्ता का कहना है कि सुरक्षा का ठेका टेंडर प्रक्रिया के द्वारा दिया जाता है और इसमें कई अन्य एजेंसियां भी रुचि दिखाती हैं। किंतु विश्वविद्यालय द्वारा पिछले कई सालों से कोई टेंडर प्रक्रिया या टेंडर संबंधित विज्ञप्ति प्रकाशित नहीं कराई गई है। शर्मा सर्विस सिक्योरिटी एजेंसी को नियम विरुद्ध ठेका दिए जाने से साथ ही शासन को आर्थिक हानि हुई है। 

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शिकायतकर्ता ने अपने आवेदन पत्र में कई गंभीर आरोप शर्मा सर्विस सिक्योरिटी एजेंसी और इनके संचालक वर्तमान भाजपा ग्वालियर जिला अध्यक्ष जयप्रकाश राजौरिया पर लगाए हैं। कई तरह की अनियमितताओं की बात की है। शिकायतकर्ता जयप्रकाश मौर्य शर्मा सुरक्षा एजेंसी के इस मामले को करोड़ों रुपए का घोटाला बता रहे हैं। उनका साफ कहना है कि जिस तरह से दस वर्षों से शर्मा सर्विस सिक्योरिटी। एजेंसी को ही मैनपावर और सिक्योरिटी का काम दिया गया है उसमें कहीं न कहीं राजनीतिक दबाव है। साथ ही शिकायत करने के बाद उनके पास भी कई तरह के फोन आ रहे हैं यह आरोप भी उन्होंने लगाया है। हालांकि जीवाजी विश्वविद्यालय में लगाई गई मैनपावर और सिक्योरिटी एजेंसी की तमाम खबरें लंबे समय से प्रकाशित होती हैं जो कई तरह की अनियमितताओं की ओर इशारा करती हैं लेकिन इसके बावजूद अभी तक न तो जीवाजी विश्वविद्यालय ने और न ही राज्य शासन ने इस मामले में कोई कदम उठाया है। अब देखना होगा कि शिकायतकर्ता की शिकायत को लोकायत कितनी गंभीरता से लेता है। 

माँ से प्रेम या पागलपन; माँ की लाश के साथ बेटा बेटी ने बिताए 5 दिन, रुला देने वाली हकीकत

ग्वालियर मध्य प्रदेश: ग्वालियर से एक ऐसी खबर निकलकर आ रही है जो न केवल आपको हैरान कर देगी लेकिन यह सोचने पर भी मजबूर कर देगी कि इसे माँ के प्रति बच्चों का प्रेम कहें या पागलपन। टोपी बाजार क्षेत्र में रहने वाले एक भदौरिया परिवार में माँ उर्मिला भदौरिया जो शिक्षा विभाग से रिटायर्ड क्लर्क है उसकी मौत हो जाती है।उसके एक बेटा है अखंड भदौरिया और बेटी है।ऋतु भदौरिया मां की मौत के बाद बेटा बेटी किसी को नहीं बताते कि उनकी मां मर गई है और न खुद यह मानने को तैयार होते कि उनकी माँ मर चुकी है।वह मां के शव के साथ ही रहते हैं उससे बात करते हैं उसे खाना खिलाने की कोशिश करते हैं। लेकिन पांच दिन बीत जाने पर जब पूरे क्षेत्र में बदबू फैलती है और लोग पुलिस को शिकायत करते हैं तब जाकर इस मामले का खुलासा होता है।

एक मां के अपने बच्चों के प्रति प्रेम की यह एक ऐसी हकीकत है जो कहीं न कहीं हर उस व्यक्ति की आंखें नम कर गई जो वहां उपस्थित था। और हो सकता है कि हर उस व्यक्ति की आंखें भी नम कर जाए जो इस हकीकत को सुने या देखें। कुछ लोग कह रहे हैं कि बेटा अखंड और बेटी रितु मानसिक रूप से विक्षिप्त हैं जबकि जानकारी मिली है कि बेटा बी.टेक. और बेटी बीएससी कर चुके हैं। हालांकि रिश्तेदार दोनों को मानसिक कमजोर मानकर उनका मजाक उड़ाते थे और माँ को अपने बच्चों का यह मजाक पसंद नहीं था इसलिए माँ ने पूरे रिश्तेदारों और समाज से दूरी बना ली थी। उनका वह मकान ही उनकी दुनिया थी उसी में मार रहती और अपने पेंशन से आए पैसों से अपने बच्चों का पालन पोषण कर रही थी। मां को अपने बच्चों से इतना प्रेम था कि वह अपने बच्चों की देखभाल को ही बस अपनी दुनिया मानती थी।

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इस पूरी घटना में यह परिवार समाज से पूरी तरह कट चुका था।मोहल्ले में ज्यादा किसी के यहां आना जाना नहीं था।रिश्तेदारी में बातचीत नहीं थी बस यही कारण बने कि यह परिवार एकांकी हो गया।मां के लिए बच्चे सब कुछ थे तो बच्चों के लिए मां सब कुछ थी और जब मां की मौत हुई तो शायद बच्चे इसे स्वीकार नहीं कर सके और मां के साथ भी वहीं पर सो जाते लेकिन कहीं ना कहीं बच्चों के मन में मां के प्रति अता प्रेम साफ परिलक्षित होता है क्योंकि इतनी बदबू की सौ दो सौ मीटर दूरी तक लोग सहन नहीं कर पा रहे थे उस बदबू में मां के शव के साथ दोनों बच्चे रह रहे थे।शव में कीड़े पड़ चुके थे लेकिन न जाने क्यों दोनों बच्चे यह बात किसी से नहीं कह रहे थे।

ग्वालियर की टोपी बाज़ार के जालम सिंह के बाड़े में रहने वाली माँ उर्मिला भदौरिया। अपने पति को पहले ही खो चुकी थी पूरी जिंदगी नौकरी करके उन्होंने बच्चों को पाला बच्चों को पढ़ाया लिखा। बच्चों की मानसिक कमजोरी को हराया समाज के सामने डटकर खड़ी रही और अपने बच्चों की हिम्मत बनी रही लेकिन जब उनकी सांसे थमी तो एक भयावह मौत उनको देखने को मिली कि उनके शव का विधिवत अंतिम संस्कार नहीं हुआ। कुछ लोग इसे दोनों बच्चों का मां के प्रति प्रेम कह रहे हैं।तो कुछ लापरवाही कह रहे हैं तो कुछ अभी भी इसे दोनों के पागलपन की इंतहा बता रहे हैं। पुलिस का कहना है कि कार्रवाई के समय 50 m दूर ही भयंकर बदबू थी। सभी पुलिसकर्मी मास्क लगाकर घर में घुसे और कमरे का दश देखकर हर किसी की आंखें नम हो गई।

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यह घटना एक और तो एक माँ और उसके दो बच्चों की कहानी है लेकिन दूसरी ओर यह हमारे उस समाज की भी कहानी है जो तकनीक की दौड़ में सामाजिक समरसता के मामले में कंगाल हो चुका है। एक परिवार सबसे अलग थलग होकर एकांकी जीवन कई सालों से बिता रहा था लेकिन

कथित समाज जो आस पड़ोस रिश्तेदारों और पहचान वालों से मिलकर बनता है वह संवेदनशील हो चुका था उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि एकांकी जीवन जी रहा। यह परिवार अवसाद में चला जाएगा। इनकी मानसिक हालत और खराब हो जाएगी क्योंकि यदि कोई व्यक्ति मानसिक रूप से कमजोर है तो उसका साथ देकर उसके साथ घुल मिलकर उसको मजबूती प्रदान की जा सकती है।लेकिन इस पूरे मामले में यह हकीकत भी सामने आ रही है कि हमारा सामाजिक ढांचा पूरी तरह बिखर चुका है। क्योंकि रोज यदि अड़ोस पड़ोस का आना जाना इनके घर होता तो इस मां की मौत के बाद इसका अंत इतना दर्दनाक न होता?????

खबर का अगला भाग कुछ ही घंटों में…

उपनेता प्रतिपक्ष हेमंत कटारे ने दिया इस्तीफा, अचानक इस्तीफे से हर कोई हैरान

भोपाल मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश की सियासी गलियारों से एक बड़ी हलचल पैदा करने वाली खबर सामने आ रही है। विधानसभा में उप नेता प्रतिपक्ष पद से कांग्रेस विधायक हेमंत कटारे ने इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने पत्र में लिखा है कि वह परिवार और क्षेत्र की जनता को पर्याप्त समय नहीं दे पा रहे थे। जिसके कारण पद का त्याग किया है। जिसके बाद कांग्रेस पार्टी में खलबली में मच गई। हालांकि, हेमंत कटारे की ओर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। 

सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को अटेर विधायक हेमंत कटारे ने पत्र लिखा है। जिसमें उन्होंने कहा है कि संगठन इस पद की जिम्मेदारी किसी और दे, वह पूरा सहयोग प्रदान करेंगे। इस पद के लिए मुझे योग्य समझा गया। इसके लिए मैं हमेशा पार्टी का आभारी रहूंगा। आज अटेर विधायक हेमंत कटारे की वैवाहिक वर्षगांठ है। वह विधानसभा में करीब 4 बजे के आसपास मौजूद थे। इसके बाद वह अचानक बाहर आ गए। कटारे के इस फैसले के बाद प्रदेश की सियासत में हलचल तेज हो गई है। सूत्रों के मुताबिक, आने वाले समय में पार्टी संगठन में बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

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आपको बता दें कि इस समय मध्य प्रदेश विधानसभा का बजट सत्र चल रहा है और बजट सत्र के दौरान ही अभी कल ही कैलाश विजयवर्गीय संसदीय कार्यमंत्री द्वारा नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के लिए अपशब्द कहे गए थे औकात में रहने की बात तक कही गई थी जिसके बाद आज पूरे प्रदेश में कांग्रेस ने कैलाश विजयवर्गीय के पुतले जलाते हुए उग्र प्रदर्शन किया था। जब विधानसभा में सत्र चल रहा हो उस बीच अचानक से उपनेता प्रतिपक्ष हेमंत कटारे का यह इस्तीफा कई सवाल खड़े कर रहा है। और इस्तीफे को लेकर मध्य प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर चल पड़ा है। 

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टाइगर की मौत का मामला गर्माया, डीएफओ की बढी मुश्किलें

भोपाल मध्य प्रदेश: नौरादेही टाइगर रिजर्व में कान्हा से लाए गए बाघ की मौत के मामले ने अब तूल पकड़ लिया है। मामले में लापरवाही के आरोपों के बाद प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख ने टाइगर रिजर्व के डीएफओ रजनीश कुमार सिंह को नोटिस जारी कर तीन दिन के भीतर जवाब मांगा है। वहीं वन विभाग ने बाघ की मौत की प्रारंभिक वजह टेरिटोरियल फाइट (क्षेत्रीय संघर्ष) बताई है। जानकारी के अनुसार 15 फरवरी की शाम को नौरादेही टाइगर रिजर्व में एक बाघ मृत अवस्था में मिला था। यह बाघ करीब एक माह पहले कान्हा टाइगर रिजर्व से यहां लाया गया था। 18-19 जनवरी की दरमियानी रात बाघ को रेडियो कॉलर लगाकर वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व में छोड़ा गया था। तब से उसकी नियमित मॉनीटरिंग की जा रही थी।

बताया गया कि बाघ की लोकेशन लगातार दो दिनों तक एक ही स्थान पर स्थिर बनी रही। रेडियो कॉलर से मिलने वाले स्टैटिक अलर्ट के आधार पर वन अमले ने मौके पर पहुंचकर जांच की, जहां बाघ मृत पाया गया। इसके बाद पोस्टमार्टम कराया गया। प्रारंभिक रिपोर्ट में बाघ की मौत का कारण टेरिटोरियल फाइट बताया गया है, यानी क्षेत्र में वर्चस्व की लड़ाई के दौरान दूसरे बाघ से संघर्ष में उसकी जान गई।

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हालांकि इस पूरे घटनाक्रम पर वाइल्डलाइफ एक्टिविस्ट अजय दुबे ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने शिकायत में कहा कि रेडियो कॉलर लगे बाघ का मृत पाया जाना और विभागीय प्रेस नोट कई संदेह पैदा करता है। दुबे के अनुसार रेडियो कॉलर हर आठ घंटे में स्टैटिक अलर्ट भेजता है, जो यह संकेत देता है कि बाघ की गतिविधि रुक गई है। ऐसे में दो दिनों तक एक ही जगह लोकेशन मिलने के बावजूद तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि क्षेत्रीय संघर्ष हुआ था तो उसकी आवाज या हलचल निगरानी टीम को क्यों सुनाई नहीं दी? क्या मॉनीटरिंग व्यवस्था में चूक हुई? संघर्ष में शामिल दूसरा बाघ वर्तमान में कहां है और क्या वह अन्य बाघों के लिए खतरा बन सकता है? दुबे ने यह आशंका भी जताई कि यदि निगरानी में लापरवाही हुई है तो क्षेत्र में मौजूद अन्य 3-4 रेडियो कॉलर लगे बाघों की सुरक्षा भी जोखिम में हो सकती है।

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मामले की गंभीरता को देखते हुए उच्च स्तर पर संज्ञान लिया गया है और डीएफओ से तीन दिन में विस्तृत जवाब मांगा गया है। अब सबकी नजर विभागीय जांच पर टिकी है कि क्या यह वास्तव में प्राकृतिक टेरिटोरियल फाइट का मामला है या मॉनीटरिंग में हुई किसी चूक का परिणाम। वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से यह मामला महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि रेडियो कॉलर से लैस बाघों की निगरानी में किसी भी प्रकार की ढिलाई भविष्य में बड़े खतरे का कारण बन सकती है। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही पूरे मामले की तस्वीर साफ हो पाएगी।

गलगोटिया यूनिवर्सिटी की मान्यता होगी रद्द! यूपी विधानसभा में उठी मांग

डिजिटल डेस्क नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र के दौरान गलगोटिया यूनिवर्सिटी का मामला भी गरमाया। सपा विधायक सचिन यादव ने अभी हाल ही में हुए एआई सबमिट में गलगोटिया यूनिवर्सिटी प्रकरण पर चर्चा करते हुए यूनिवर्सिटी के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की मांग की है। उनका कहना है की यूनिवर्सिटी ने देश की छवि धूमिल की है। चीन के प्रोडक्ट को अपना बताकर देश के आत्मनिर्भर भारत के सपने को चकनाचूर किया है। विधानसभा में सत्र के दौरान उन्होंने गलगुटिया यूनिवर्सिटी पर तमाम गंभीर आरोप लगाए हैं और साथ ही सख्त कार्रवाई की मांग की है। 

विधायक सचिन यादव का कहना था कि भारत के संविधान के अनुच्छेद इक्यावन ए में कहा गया है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सत्यनिष्ठा राष्ट्रीय कर्तव्य है। लेकिन हमारी विधानसभा में लगातार प्राइवेट यूनिवर्सिटीज के बिल आते हैं और उन्हें मान्यता देकर उन्हें बढ़ाने का काम किया जाता है। यह कोई पॉलिटिकल मुद्दा नहीं है यह यह सदन के सम्मान का प्रदेश की निष्ठा का सवाल है। इस तरह की यूनिवर्सिटी बन जाती हैं तो विश्व के मंच पर देश के मंच पर हमारे प्रदेश का नाम बदनाम करती हैं ऐसी यूनिवर्सिटी की जांच होनी चाहिए। और उन पर कार्यवाही भी होनी चाहिए।हमने इसी देश में इसी प्रदेश में आत्मनिर्भर होने का सपना देखा है। उस पर इस सदन में चर्चा हुई।मेक इन इंडिया का सपना देखा।उस पर इस सदन में चर्चा हुई।स्टार्टअप का सपना देखा उस पर इस सदन में चर्चा हुई। गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने एक चीन के प्रोडक्ट को अपना बताकर इन सब सपनों का चकनाचोर किया है और नौजवानों के टैलेंट से खिलवाड़ किया है।

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विधायक सचिन यादव यहीं नहीं रुके।उन्होंने उपमुख्यमंत्री को नसीहत देते हुए कहा कि जब मैंने कहा था कि यूनिवर्सिटी में रिसर्च होनी चाहिए तो उन्होंने कहा था कि रिसर्च की जरूरत नहीं है और अब जब किस तरह की यूनिवर्सिटी बनेंगी जहां रिसर्च नहीं होगी। और यूनिवर्सिटी बाहर के प्रोडक्ट को अपना बताएंगे तो हमारा प्रदेश कैसे आगे बढ़ेगा। बिना वेरिफिकेशन के एक चीन का प्रोडक्ट एआई सबमिट में कैसे पहुंचा यह सरकार की भी जिम्मेदारी है। तंज करते हुए उन्होंने कहा कि फोटो शूट कराने की बजाय उन्हें वेरिफिकेशन करना चाहिए था की एआई सबमिट में जो प्रोडक्ट पहुंच रहे हैं यह जो यूनिवर्सिटी पहुंच रही हैं।क्या वास्तव में वह रिसर्च करके अपने प्रोडक्ट बना रही हैं? और इसकी जिम्मेदारी तय करनी चाहिए। मै सरकार से अनुरोध करता हूं कि इस विषय की जांच हो और यूनिवर्सिटी पर सख्त कार्रवाई हो ताकि आगे कोई यूनिवर्सिटी ऐसा नहीं कर पाए। 

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विधायक पंकज ने कहा कि यह यूनिवर्सिटी उत्तर प्रदेश में स्थित है।इसलिए इस पर निगरानी की जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश सरकार की है। यह विषय केवल विश्वविद्यालय से नहीं बल्कि देश की गरिमा वैज्ञानिक क्षमताओं से जुड़ा हुआ है। एक यूनिवर्सिटी जो पैसे कमाने का अड्डा है वह हमारे बच्चों के भविष्य पर प्रश्नचिह्न नहीं लगा सकती। संविधान का अनुच्छेद इक्कीस ए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने का दायित्व राज्य पर डालता है। सरकार यह चाहती है कि हमारे बच्चे तकनीकी शिक्षा अर्जित करके विश्व में हमारे देश का नाम रोशन करें। देश की प्रतिष्ठा को धूमिल करने इस मामले में विधायकों ने यूनिवर्सिटी की मान्यता रद्द करने तक की मांग रख दी।

आपको बता दें कि हाल ही में दिल्ली में आयोजित यही सबमिट में तमाम यूनिवर्सिटी ने अपने रिसर्च एंड डेवलपमेंट में बने प्रोडक्ट्स का प्रदर्शन किया था और गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने एक रोबोट डॉग का प्रदर्शन किया था जिसे वहां की प्रोफेसर नेहा सिंह ने गलगोटिया का प्रोडक्ट बता दिया था लेकिन इसके बाद चीन की मीडिया ने इस बात की आलोचना की थी कि चीन में बने रॉबर्ट डॉग को भारत की यूनिवर्सिटी ने अपना बताया है और मामला जब तूल पकड़ा तो यूनिवर्सिटी ने अपनी गलती बताने की बजाय तरह तरह के कुत्तर खुद को सही साबित करने की कोशिश की लेकिन मामला इतना बढ़ गया कि यूनिवर्सिटी के साथ साथ केंद्र सरकार और एआई सबमिट की छवि पर सवाल उठने लगे। तब आयोजकों ने केंद्र सरकार के निर्देश पर गलगोटिया यूनिवर्सिटी को एआई समिट से बाहर का रास्ता दिखा दिया। वेलकोटिया यूनिवर्सिटीज की जब से सोशल मीडिया पर जमकर किरकिरी हो रही है। लेकिन अभी तक गलगोटिया यूनिवर्सिटी के तरफ से खुद की गलती मानने वाला कोई बयान नहीं आया है।

अब विधानसभा में गलगुटिया यूनिवर्सिटी पर सख्त कार्रवाई की मांग उठी है लेकिन सरकार इस मामले को कितनी गंभीरता से लेती है? अगलगोटिया यूनिवर्सिटी पर क्या कार्रवाई करती है इस बात को लेकर अभी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। 

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मोटा माल देकर कुर्सी पर बैठे मोटे साहब का मोटा खेल

ग्वालियर मध्य प्रदेश: इस तरह की चर्चाएं आजकल जोरों पर हैं कि कई अधिकारी ऊपर स्तर पर सेटिंग करके कुर्सियां हथिया रहे हैं। यह बात उस समय सही लगती है जब वरिष्ठता क्रम को दरकिनार करते हुए कई जगह पर कनिष्ठ को अयोग्य को और पुराने विवादित अधिकारी को भी किसी विभाग का मुखिया बना दिया जाए। लेकिन आजकल यह प्रक्रिया सामान्य हो चुकी है और पूरे मध्यप्रदेश में कई जगह पर कई विभागों में यह देखा जाता है। ग्वालियर में भी हालात कुछ ऐसे ही हैं। अब हम न तो साहब बताएंगे और न विभाग। लेकिन आप सब समझ जाएंगे। क्योंकि समझने वाले समझ गए हो जो ना समझे वो????

एक मोटे साहब को अपने विभाग का मुखिया बनने का इतना शौक कि वह अपने से संबंधित हर व्यक्ति से कहा कर देते कि कैसे भी में मुखिया बन जाऊं कहीं कितना भी पैसा देना पड़े और आप यकीन मानिए कि इस बात के साक्ष्य भी रिकॉर्डिंग के रूप में उपलब्ध हैं। मोटे साहब जानते हैं कि उनके इस विभाग के मुखिया का पद मोटी कमाई का पद है और यदि वह ऊपर तक सेटिंग करके कुछ माल खर्च कर भी लेंगे तो उतना माल तो वो कुछ ही दिनों में कमा ही लेंगे और बाकी शायद उनकी कमाई के टारगेट इतने हैं कि सात पीढ़ियों के लिए जोड लेने की कहावत शायद उन पर चरितार्थ होती है क्योंकि उनके विभाग के अंदर के ही लोग और उनके विभाग से संबंधित कार्य वाले लोग अब यह कहने लगे हैं कि साहब बहुत लूट रहे हैं हर बात में मोटी रकम मांग रहे हैं। 

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विभाग ऐसा है कि सीधे जनता की सुविधाओं से जुड़ा हुआ है लेकिन जनता को कुछ मिले या न मिले। मोटे साहब का साफ कहना है कि उनको एक मोटा हिस्सा चाहिए। बाकी कुछ भी करें। और यहां सबसे बड़ी बात यह है कि मोटे साहब अपनी छवि को सुधारने के लिए तमाम कार्रवाइयाँ करते नजर आते हैं।लेकिन उनके कार्यवाही के पीछे भी यही बात निकल कर सामने आ रही है कि जहां से हिस्सेदारी नहीं आ रही वहां मोट साहब डंडा चला देते हैं और उनके डंडे। का आतंक इस तरह व्याप्त हो जाता है कि जिन पर कार्रवाई नहीं हुई है वे भी शरणागत हो जाते हैं। 

विभाग के कई वरिष्ठ अधिकारी इस मामले में आपत्ति जता चुके हैं कि उनको छोड़ नियम। विरुद्ध मोटे साहब को मुखिया बना दिया गया है लेकिन यहां मोटा माल चलता है। वहां योग्यता वरिष्ठता और अनुभव कहीं मायने नहीं रखता। और हां यदि किसी जांच एजेंसी में जांच हो भी रही हो तो भी संबंधित मंत्रालय और भोपाल में बैठे आला ऑफिसर खामोश रहते हैं क्योंकि जो मोटा माल विभाग के मुखिया बनने के बाद मोटे साहब के द्वारा वहां तक पहुंच रहा है। वह मुंह में जमे उस दही के समान हैं जो उन्हें खामोश रहने पर मजबूर कर रहा है। लेकिन फिर भी विभाग में परेशान कुछ लोग यह आस लगाए बैठे हैं के देश के कानून के घर में देर है लेकिन अंधेर नहीं और एक न एक दिन तो मोटे साहब के छोटे मोटे सारी कारनामे खुलेंगे। लेकिन वो दिन कब आएगा? यह किसी को नहीं पता…

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