ग्वालियर मध्यप्रदेश: सीएम हैल्पलाइन पोर्टल पर दर्ज शिकायतें अटेंड न करना 14 अधिकारियों को भारी पड़ने जा रहा है, कलेक्टर रुचिका चौहान ने इन सभी अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए हैं। इनमें 13 अधिकारी एल-1 स्तर के व एक अधिकारी एल-2 स्तर का शामिल है। नोटिस का जबाव सभी को कलेक्टर के समक्ष प्रस्तुत करना होगा। इन अधिकारियों द्वारा शिकायतों के निराकरण के लिये समय-सीमा में कार्रवाई नहीं की। इस कारण शिकायतें बिना किसी कार्रवाई के उच्च स्तर पर प्रेषित हो गई हैं। इससे शिकायतों के निराकरण में अनावश्यक देरी हुई है।
कलेक्टर रुचिका चौहान ने जिन अधिकारियों को सीएम हैल्पलाइन में दर्ज शिकायतों का निराकरण न करने के कारण जिन एल-1 स्तर के अधिकारियों को नोटिस जारी किए हैं, उनमें विद्युत वितरण कंपनी के उप प्रबंधक उटीला प्रिंस कुमार वैश्य, सहायक यंत्री सुनील कुमार गुप्ता, प्रभारी वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी मुरार रविन्द्र सिंह कुशवाह, सहायक आपूर्ति अधिकारी सौरभ जैन, सहायक संपत्ति अधिकारी ग्रामीण शैलेन्द्र चौहान, सहायक संपत्ति अधिकारी जोन-17 देवेन्द्र बुधौलिया, प्रभारी नायब तहसीलदार सांखनी शिवदयाल शर्मा, सहायक प्राध्यापक राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय डॉ. श्याम सस्तोगी, सहायक आयुक्त वाणिज्यकर अभिषेक खरे, रीजनल मैनेजर कोटक महिन्द्रा बैंक आफाक मंसूरी, रीजनल मैनेजर देवेन्द्र पाल सिंह, रीजनल मैनेजर इंडियन ओवरसीज बैंक शंकरानंद झा व भवन निरीक्षक बृजेश राजपूत शामिल हैं।
इसी तरह एल-2 स्तर के अधिकारी कार्यपालन यंत्री पेयजल नगर निगम संजीव गुप्ता को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। रुचिका चौहान ने इन सभी को स्पष्ट रूप से आगाह किया है कि भविष्य में सीएम हैल्पलाइन से संबंधित शिकायतों के निराकरण में पूरी सतर्कता बरतें व उत्तरदायित्व का निर्वहन करें। साथ ही शासन के द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों का अक्षरश: पालन करते हुए निराकरण सुनिश्चित करें।
ग्वालियर मध्य प्रदेश: ग्वालियर कलेक्टर रुचिका चौहान के निर्देश पर जिला शिक्षा अधिकारी ने 25 अप्रैल को आदेश जारी किया था कि जिले के समस्त स्कूलों की आठवीं तक की कक्षाएं तीस अप्रैल तक संचालित नहीं होंगी। इस आदेश के अंतर्गत सभी तरह के स्कूल शामिल हैं। चाहे वे अशासकीय हों या शासकीय। एमपी बोर्ड, सीबीएसई बोर्ड, आईसीएसई सेंट्रल स्कूल और शासन द्वारा मान्यता प्राप्त सभी स्कूल इस आदेश के अंतर्गत आते हैं। इस आदेश के अनुसार, केवल नौवीं से बारह वीं तक की कक्षाएं ही सुबह 7:30 से दोपहर 12 बजे तक संचालित किए जाने की अनुमति थी। इस आदेश में यह नियम सत्ताईस अप्रैल से आगामी आदेश तक प्रभावी बताया गया। इस आदेश का मतलब साफ है कि किसी भी परिस्थिति में किसी भी तरह से किसी भी स्कूल में कोई भी कक्षाएं संचालित नहीं हो सकती। लेकिन यदि शिक्षा विभाग के बीआरसी का संरक्षण हो तो किस तरह खेला होता है, अब वह भी देखिए….
ग्वालियर के आनंदनगर में स्थित श्री चेतन्या टेक्नो स्कूल किस तरह खुद को प्रशासनिक आदेशों से ऊपर समझता है और किस तरह इस स्कूल की शिक्षा विभाग के साथ साठगांठ है, उसका अब हैरतेज कारनामा सुनिए। प्रशासनिक आदेश के बावजूद श्री चेतन्या टेक्नो स्कूल ने 27 अप्रैल को छोटी कक्षाओं के छोटे छोटे मासूम बच्चों को जबरदस्ती स्कूल बुलाया। लगभग ग्यारह बजे के आसपास, स्कूल से कई बच्चे स्कूल, यूनिफार्म, और बैग में स्कूल परिसर से बाहर निकलते दिखाई दिए। जब बाहर निकल रहे छोटे छोटे बच्चों के अभिभावकों से बातचीत की, तो उन्होंने बताया कि स्कूल संचालित हैं और बच्चों को पढ़ने के लिए बुलाया गया है। अभिभावकों कि कथन और बाहर निकलते बच्चों की पूरी वीडियोग्राफी हमारे पास उपलब्ध है।
इस पूरे मामले में जब ग्वालियर जिला शिक्षा अधिकारी हरिओम चतुर्वेदी से फ़ोन पर बात कर उन्हें इस बात की जानकारी दी गई कि किस तरह श्री चेतन्या टेक्नो स्कूल ने प्रशासनिक आदेश की धज्जियां उड़ाते हुए कक्षाएं संचालित की हैं, तो उन्होंने हाईकोर्ट में अर्जेंट हियरिंग में व्यस्त होने की बात कह कर बाद में इस मामले में कार्रवाई की बात की। इसके बाद जब इस पूरे घटनाक्रम के बारे में और श्री चैतन्या टेक्नो स्कूल आदेश के बावजूद खुले होने की जानकारी ग्वालियर।कलेक्टर रुचिका चौहान को दी गई तो उन्होंने इस पर कार्रवाई की बात कही। लेकिन जिस तरह शिक्षा विभाग स्कूल को समर्थन कर रहा था और धुलमुल रवैया अपना रहा था, उससे साफ नजर आ रहा था कि कहीं न कहीं शिक्षा विभाग और स्कूल के बीच में गहरी सांटगांठ है। हालांकि बाद में स्वयं फोन करके जिला शिक्षा अधिकारी हरिओम चतुर्वेदी ने जानकारी दी कि स्कूल में जांच के लिए एपीसी और बीआरसी को भेजा है। लेकिन इस जांच के बाद ही स्कूल और शिक्षा विभाग की साठगांठ पर मुहर लग गई। एक ओर जहां हमारे पास स्कूल संचालित होने की स्कूल से बाहर निकलते बच्चों की और छात्रों के अभिभावकों के कथन की वीडियोग्राफी थी, इसके बावजूद एपीसी और बीआरसी ने स्कूल के पक्ष में गोलमोल जांच रिपोर्ट पेश कर दी। रिपोर्ट हमारे पास उपलब्ध नहीं है, लेकिन जिला शिक्षा अधिकारी हरिओम चतुर्वेदी ने बताया कि जांच रिपोर्ट में स्कूल ने बताया है कि कुछ बच्चे लॉकर में रखा सामान लेने आए थे, स्कूल संचालित नहीं था। शिक्षा विभाग के एपीसी और बीआरसी की यह रिपोर्ट उन तथ्यों से बिल्कुल अलग थी जो हमारे पास उपलब्ध हैं। और यह गोलमोल रिपोर्ट साफ बताती है कि शिक्षा विभाग के इन अधिकारियों का स्कूल से किसी विशेष प्रकार का गठबंधन है। और प्रशासनिक कार्रवाई से बचाने के लिए, इन अधिकारियों ने स्कूल के पक्ष में गलत रिपोर्ट प्रस्तुत की है। अब इससे भी बड़ा चौंकाने वाला खुलासा आपके सामने आने वाला है।
इस मामले में 28 अप्रैल को जब श्री चैतन्य टेक्नो स्कूल के संचालक कीर्ति रेजा से बातचीत की गई तो उन्होंने अंग्रेजी झाड़ते हुए अपने आपको सब नियमों से ऊपर बताया। और स्कूल के संचालन की बात को पूरी तरह नकार दिया और शिक्षा विभाग के अधिकारियों के संरक्षण में दंभ भरते हुए इस मामले में बात करने से इनकार करते हुए हमें ही हड़का दिया। उनकी भाषा शाह बता रही थी कि उनका रसूख़ जबरदस्त है और शिक्षा विभाग के अधिकारियों का उन पर संरक्षण है। और जो गोलमोल रिपोर्ट उन्होंने किसी प्रभाव दबाव, मैं शिक्षा विभाग के एपीसी और बीआरसी से बनवा दी है।वह उन्हें बचा लेगी, इस बात का भी उन्हें जबरदस्त गुरूर है। लेकिन अब इससे भी बड़ा चौंकाने वाला खुलासा सुनिए.. श्री चैतन्य स्कूल के संचालक से बातचीत के बाद जब जिला शिक्षा अधिकारी हरिओम चतुर्वेदी से फोन पर चर्चा की गई, तो उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि एपीसी और बीआरसी ने गलत रिपोर्ट बनाई है और उन्होंने अधिकारियों को फिर से स्कूल भेजकर गहन जांच के लिए निर्देशित किया है और साथ ही कहा है कि छात्रों और अभिभावकों के कथन के साथ पूरी रिपोर्ट पुनः बनाएं और पेश करें। साथ ही उन्होंने हमें आश्वस्त किया कि आज की रिपोर्ट आने पर स्कूल की मान्यता ही रद्द कर देते हैं। हरिओम चतुर्वेदी सख्त लहजे में नजर आए और उन्होंने यह भी कहा कि मैं स्वयं सक्षम हूं।स्कूल पर कार्रवाई के लिए और ज्यादा आवश्यक हुआ तो माननीय कलेक्टर महोदय से कार्रवाई करवा देंगे। साथ ही उन्होंने स्वीकार किया कि उनके अधिकारियों द्वारा बनाई गई पहली रिपोर्ट गलत है और स्कूल नियम विरुद्ध संचालित था।
यह पूरा मामला शिक्षा विभाग के उन जमीनी अधिकारियों के कार्यशैली पर सवालिया निशान खड़ा करता है, जो प्रशासन के आदेश के बाद आपदा में अवसर का मौका ढूंढते हैं और इस तरह संचालित स्कूलों की शिकायत आने पर वहां पर जाकर सांठगांठ कर लेते हैं। शहर में संचालित न जाने कितने स्कूलों के साथ यही हुआ होगा कि स्कूल संचालित होंगे और प्रशासनिक आदेश का दबाव में न जाने किस तरह की साठ गांठ हुई होगी, लेकिन श्री चैतन्य टेक्नो स्कूल के मामले में जानकारी जिला पंचायत सीईओ सोजान सिंह रावत, जिला कलेक्टर रुचिका चौहान तक मीडिया के माध्यम से पहुंचने के कारण अब शिक्षा विभाग पशोपेश में है कि करें तो क्या करें। लेकिन जिला प्रशासन के निर्देश पर जारी स्कूल बंद रहने के आदेश की किस तरह धज्जियां उड़ाई गईं और शिकायत के बाद शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने किस तरह मामले की लीपापोती की यह साफ बताता है कि प्रशासनिक आदेश को न केवल श्री चेतन्या टेक्नो स्कूल ने ठेंगा दिखाया, बल्कि शिक्षा विभाग के जमीनी अधिकारियों ने भी मामले में लीपापोती की। पहली गलत रिपोर्ट पेश करने के बाद अब दूसरी रिपोर्ट में क्या बदलाव होता है? यह देखना दिलचस्प होगा और पहली गलत रिपोर्ट बनाने वाले शिक्षा विभाग के एपीसी और बीआरसी पर शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन कोई कार्रवाई करता है, यह उन्हें आगे फिर इसी तरह की साठगांठ की छूट देता है।यह भी एक बड़ा सवाल है?
ग्वालियर मध्यप्रदेश: ग्वालियर स्थित गजराराजा मेडिकल कॉलेज एक बार फिर उस समय चर्चाओं में आ गया, जब यहां छात्रों के अलग गुटों में मारपीट का मामला इतना बढ़ गया कि छात्रों के शर्त तक फूट गए और अनुशासन की ऐसी धज्जियां उड़ी के उच्च शिक्षा के लिए आए। यह छात्र सड़क के गुंडे मवाली की तरह नजर आए और अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए एक दूसरे पर जमकर हमला किया।मामला इतना ज्यादा गंभीर और संवेदनशील था कि मारपीट की इस घटना के बाद कॉलेज प्रबंधन को सख्त कदम उठाने पड़े और पांच छात्रों को निलंबित कर दिया।
जानकारी के अनुसार विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब एमबीबीएस 2025 बैच की छात्रा पर कुछ अन्य छात्रों ने अभद्र टिप्पणी कर दी। इसी बैच के अन्य छात्रों सोनू शर्मा, वेदांत असाती, तरुण कुमार संभ्रांत और ध्रुव पर आरोप लगे हैं कि उन्होंने छात्रा पर अभद्र टिप्पणियां की और जब छात्रा के समर्थन में श्रेयांश गुप्ता ने इसका विरोध किया तो इन छात्रों ने आक्रोशित होकर मारपीट शुरू कर दी। यदि मेडिकल कॉलेज प्रबंधन तत्परता दिखाता, तो यह मामला उसी समय शांत हो सकता था, लेकिन उस समय इस घटना पर किसी ने भी अंकुश लगाने का प्रयास नहीं किया। और इस घटना के बाद कॉलेज परिसर गुंडागर्दी का अड्डा बन गया।
जैसे ही क्लास खत्म हुई तो यह आरोपी छात्र कॉलेज के बाहर घात लगाकर खड़े हो गए और जब श्रेयांश बाहर निकला तो उसे घेर लिया, उसके साथ गाली गलौच और मारपीट शुरू कर दी।यही नहीं, छात्र इतने आक्रोशित थे कि उन्होंने लोहे की रोड से सांश का सिर फोड़ दिया। कॉलेज कैंपस में ही यह उपद्रव चलता रहा। लेकिन इसके बावजूद, वहां इसे रोकने वाला कोई जिम्मेदार नहीं था। जब श्रेयांश लहूलुहान हालत में कॉलेज कैंपस में पड़ा था, तो इसी बैच के अर्पित और कुछ अन्य छात्र श्रेयांश को ट्रॉमा सेंटर ले गए और उसका उपचार कराया। इस समय तक इस घटना की जानकारी मीडिया तक पहुंच चुकी थी और जब मामले में तूल पकड़ा तब अनुशासन हीनता पर डीन ने कार्रवाई के निर्देश दिए।
गजरा राजा मेडिकल कॉलेज डीन आरकेएस धाकड़ परिसर पहुंचे और परिसर में अनुशासनहीनता करने वाले पांचों आरोपी छात्र ध्रुव रोकड़े, संभ्रांत, वेदांत साथी तरुण कुमार और सोनू शर्मा को आगामी आदेश तक समस्त शैक्षणिक गतिविधियों से निलंबित कर दिया। आपको बता दें कि यह पहला मामला नहीं है जब इस मेडिकल कॉलेज परिसर में इस तरह के झगड़े हुए हों। यहां अक्सर छोटी छोटी बात पर भी बड़े झगड़े हो जाते हैं और बड़े झगड़े के बाद इस तरह की कार्रवाई की जाती है। और कुछ महीने के लिए, फिर सब कुछ भुला दिया जाता है। सवाल यह उठता है कि कैंपस में इस तरह की व्यवस्था क्यों नहीं की जाती कि जब झगड़े की शुरुआत हो तभी जिम्मेदार अधिकारी मौके पर पहुंचकर मामले को शांत करा दें, ताकि हमारे आने वाले डॉक्टर्स अपनी पढ़ाई में व्यस्त रहें और इस तरह की अनैतिक गतिविधियों से दूर रहें। इस तरह की घटनाओं से इन उपद्रवी छात्रों के साथ उन छात्रों की पढ़ाई पर भी प्रभाव पड़ता है जो इन सभी गतिविधियों से दूर रहते हैं।
ग्वालियर मध्यप्रदेश: शहर में ट्रैफिक की हालत दिन पर दिन बदतर होती जा रही है। शहर में संभवतः ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहां जाम की स्थिति दिन में एक न एक बार नहीं बनती हो और जो हॉट स्पॉर्ट हैं वहां के हालात तो ऐसे हैं कि वहां से निकलने में कितना समय लगेगा, इसका अंदाजा भी वहां से निकलने वाले वाहन चालक नहीं लगा सकते। शहर में जिस तरह से हर जगह जाम की स्थिति बन जाती है और ऐसे जाम वाले प्वाइंट लगातार बढ़ते जा रहे हैं, उसमें एक और प्रशासन, पुलिस और नगर निगम दोषी है तो वहीं शहर के आमजन का दोष भी कुछ कम नहीं है।
अमूमन रोज ही किसी न किसी क्षेत्र से किसी न किसी आम नागरिक का फोन आता है कि मेरे क्षेत्र में ट्रैफिक की व्यवस्था बहुत खराब है।जाम लगा रहता है।आप आकर खबर बनाएं। ऐसा ही एक फोन परसों मुरार क्षेत्र से आया उस क्षेत्र में रहने वाले एक व्यापारी ने मुझे बताया कि सात नंबर चौराहे पर बहुत बुरी हालत है।दो बजे का समय है तमाम वाहनों के साथ कई स्कूल बसें जाम में फंसी हुई हैं और रोज यही हालत होती है। आप यहां आकर खबर बनाए।इस स्थिति को सुधारें। यकीन मानिए कि जब कोई व्यक्ति एक पत्रकार को फोन करता है की स्थिति सुधारो, तो हंसी भी आती है और आश्चर्य भी होता है।
खैर, जब इन सज्जन को मैंने कहा कि जाम के क्या क्या कारण हैं। और जब उनको मैंने बताया कि दुकानदार अपना सामान दुकान से 4 ft आगे रखते हैं, फिर उसके आगे अपना वाहन खड़ा करते हैं। उसके आगे कोई ठेला खड़ा हो जाता है और किस तरह पचास फीट की रोड भी पन्द्रह फीट की रह जाती है। और फिर उनसे पूछा, क्या आप बताएं कि यदि पन्द्रह फीट की बची हुई रोड पर ट्रैफिक जाम हो रहा है तो इसमें आप जैसे आम नागरिक कितने दोषी हैं? उन्होंने रूखा सा जवाब दिया, चलिए कोई बात नहीं। बस यही जवाब समस्या है कि हम स्वयं के अधिकार तो चाहते हैं, लेकिन हमारी कर्तव्य क्या है? एक आम नागरिक की तरह, शहर की ट्रैफिक व्यवस्था सुधारने के लिए हमारे स्वयं के कर्तव्य किस तरह स्थिति को काफी हद तक सुधार सकते हैं। इस पर चर्चा करते ही लोग बगलें झांकने लगते हैं।
शहर में यदि ट्रैफिक व्यवस्था सुधारनी है तो आमजन को भी स्वयं की जवाबदेही तय करनी होगी। 1 2 शहर में सड़कों पर अतिक्रमण करना और कहीं पर भी बेतरतीब तरीके से अपने वाहन खड़े कर देना। ट्रैफिक जाम की समस्या को बढ़ाते हैं तो वहीं यकीन मानिए कई सारे वाहन चालक जो लाखों की गाड़ी लेकर खुद को सभ्य और पढ़ा लिखा बताते हुए रोप से वाहन में यात्रा करते हैं उनमें से कई लोगों में ट्रैफिक सेंस शून्य होता है ना?उन्हें लेफ्ट खाली रखने या उपयोग करने का सही सली का पता होता है। और ना ही एक पंक्ति में एक एक के पीछे एक चलकर ट्रैफिक को व्यवस्थित रखने का। कुछ दिन पूर्व की ही बात है जब जडेरुआ बांध नहरवाली रोड पर केवल एक सज्जन की गलत तरीके से ओवरटेक करके दूसरी तरफ वाहन फंसा देने के चलते ट्रैफिक जाम हुआ।
आम नागरिक ट्रैफिक नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं।यह ग्वालियर शहर की हकीकत है।लेकिन वहीं दूसरी ओर जो जिम्मेदार कुर्सी पर बैठे हैं, उनका दोष भी कम नहीं है। यदि तमाम व्यस्त बाजारों में दुकानदार कई फुट आगे तक सामान रख देते हैं तो ऐसा नहीं है कि उनका यह कारनामा नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों को नहीं पता है, लेकिन यह जानकारी भी सामने आ रही है कि कुछ पैसों की लालच में नगर निगम के कर्मचारी ऐसे स्थानों पर कार्रवाई नहीं करते और जब मामला पूरी तरह बिगड़ जाता है।तो कार्रवाई के नाम पर सबका सामान उठाकर दुर्व्यवहार किया जाता है। क्या इस मामले में ऐसा नहीं हो सकता कि सबसे पहले समझाइश देकर प्रयास किया जाए और जब कोई व्यक्ति बार बार गलती करे तो उस पर अच्छा खासा जुर्माना लगाया जाए।
शहर की जर्जर खस्ता हाल सड़कें भी कहीं न कहीं ट्रैफिक जाम का कारण है। जब सड़कें ही जर्जर होती हैं तो वहां से वाहन चालकों का निकलना मुश्किल हो जाता है। कई बार जर्जर सड़क पर कोई गाड़ी फंस जाने से उसके पीछे अन्य वाहनों की कतार लग जाती है। और कई सड़कों पर गड्ढों से बचने के लिए वाहन चालक इधर उधर बचाने की कोशिश करते हैं जिसके चलते आमने सामने से वाहन फंस जाते हैं। ग्वालियर में बदतर सड़कें कई क्षेत्रों में ट्रैफिक व्यवस्था को बिगाड़ रही हैं। जहां सड़कों पर जरूरत है वहां डिवाइडर भी नहीं है, कई जगह पर सड़क पर सही ट्रैफिक सूचक नहीं होते हैं। शहर में सही अच्छी क्वालिटी की सड़कें और सही ट्रैफिक सूचना सूचकों के साथ लगी हों तो ट्रैफिक जाम से कुछ हद तक निजात मिल सकती है।
ग्वालियर में ट्रैफिक जाम का एक और बड़ा कारण सड़कों पर घूम रहे आवारा मवेशी हैं। शहर के कई क्षेत्रों में बीच सड़क पर ही मवेशी या तो खड़े रहते हैं या बैठे रहते हैं। जिन सड़कों पर भी मवेशियों का जमावड़ा रहता है वहां से वाहन निकालने में वाहन चालक को खासी मशक्कत करनी पड़ती है और कई बार तो मवेशियों के चलते ही ट्रैफिक जाम की समस्या उत्पन्न हो जाती है।ऐसे आवारा मवेशियों पर कोई भी मजबूत कार्रवाई करने के लिए प्रशासन और नगर निगम अब तक असफल रहा है। कई जगह पर तो सांड जब आपस में बीस सड़क पर लड़ते हैं तो लंबे समय तक ट्रैफिक थम जाता है क्योंकि साड़ों की लड़ाई के बीच में से निकलने का रिस्क कोई वाहन चालक नहीं लेता है।
कहीं न कहीं ट्रैफिक जाम के लिए व्यवस्था में बैठे जिम्मेदार दोषी हैं तो उतना ही दोषी आमजन भी हैं। यदि दोनों तरफ से सार्थक प्रयास किए जाएं तो ग्वालियर शहर को इस तरह लग रहे ट्रैफिक जाम से निजात मिल सकता है। इस अव्यवस्थित ट्रैफिक के चलते कई लोगों का समय बर्बाद होता है, जो दूरी दस मिनट में कवर की जा सकती है, उसे कवर करने के लिए तीस मिनट का समय लगता है और कई बार तो यदि जाम बहुत ज्यादा हो तो एक घंटा भी निकल जाता है। प्रतिज्ञा भी इस पूरी समस्या को जब शहर भर में वाहन चलाकर जांच की तो एक हैरान करने वाली बात मुझे दिखाई दी कि गूगल पर जिस रूट पर भी आप चलते हैं और गूगल पर जहां भी मार्ग पर रेड इंडिकेशन होता है वहां आपको भयंकर ट्रैफिक ज़रूर दिखाई देता है। और यहां येलो इंडिकेशन होता है वहां वाहन खिसक खिसक कर चलते हैं यह भी दिखाई देता है। यह उदाहरण इसलिए दे रहा हूं कि यह कौतूहल का विषय है। ग्वालियर शहर में कहाँ कब ट्रैफिक जाम होगा? यह जानकारी गूगल सटीक तरीके से देता है। जब गूगल इतना सब कर सकता है तो फिर ट्रैफिक जाम से आजादी पाने के लिए हम छोटे छोटे प्रयास क्यों नहीं कर सकते?
भोपाल मध्य प्रदेश: मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में बुधवार को मंत्रालय में सम्पन्न हुई मंत्रि-परिषद की बैठक में किसानों के हित में ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए कृषि भूमि के भूअर्जन पर गुणन कारक (मल्टीफिकेशन फैक्टर) को दोगुना करते हुए 2.0 कर दिया गया है। इससे अब अधिग्रहित कृषि भूमि का मुआवजा किसानों को दोगुना के स्थान पर बाजार दर से 4 गुना प्राप्त होगा। यह निर्णय संपूर्ण प्रदेश की ग्रामीण क्षेत्र की कृषि भूमि के अधिग्रहण पर लागू होगा। मंत्रि-परिषद ने नगरीय सीमा में मुआवजा गुणन कारक को यथावत एक रखा गया है। मंत्रि-परिषद ने इसके साथ सिंचाई, स्वास्थ्य, शिक्षा और सड़क जैसे अधोसंरचना निर्माण तथा विकास के कार्यों के लिए लगभग 33 हजार 985 करोड़ रूपये की स्वीकृति भी दी है।
भू-अर्जन पर बाजार दर का 4 गुना मुआवजा मिलने से किसानों को होगा जबरदस्त फायदा
मंत्रि-परिषद ने किसानों के हित में एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए ‘ मध्यप्रदेश भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार नियम 2015 ‘ के तहत ग्रामीण क्षेत्रों के लिए गुणन कारक (Multiplication Factor) को बढ़ाकर 2.0 कर दिया गया है, जिससे किसानों को अब उनकी कृषि भूमि का बाजार दर से 4 गुना मुआवजा मिलने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।
इस निर्णय से सिंचाई परियोजनाओं, सड़क, पुल, रेलवे और बांध निर्माण जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के लिए केंद्र व राज्य सरकार द्वारा अधिग्रहित की जाने वाली कृषि भूमि पर किसानों को अधिक राशि मिल सकेगी। इससे न केवल विकास कार्यों में तेजी आएगी, बल्कि भूमि देने वाले किसान परिवारों की आर्थिक स्थिति में भी व्यापक सुधार होगा।
उल्लेखनीय है कि इस संबंध में मंत्री श्री तुलसीराम सिलावट, श्री राकेश सिंह और श्री चेतन्य कुमार काश्यप की उप-समिति ने अनुशंसा की थीं। उप-समिति ने अन्य राज्यों की नीतियों का अध्ययन करने के साथ ही विभिन्न् किसान संगठन क्रेडाई,सीआईआई और फिक्की से चर्चा के बाद यह रिपोर्ट तैयार की थी। सरकार के इस पारदर्शी और किसान-हितैषी निर्णय से प्रदेश के हजारों परिवारों को सीधा लाभ पहुँचेगा।
इन्दौख-रुदाहेड़ा सूक्ष्म सिंचाई परियोजना के लिए 157 करोड़ 14 लाख रूपये की स्वीकृति
मंत्रि-परिषद द्वारा उज्जैन जिले की इन्दौख- रुदाहेड़ा सूक्ष्म सिंचाई परियोजना की लागत राशि 157 करोड़ 14 लाख रूपये, सैंच्य क्षेत्र 10,800 हेक्टेयर की प्रशासकीय स्वीकृति प्रदान किये जाने का निर्णय लिया गया है। परियोजना से झारड़ा तहसील के 35 ग्रामों को सिंचाई सुविधा का लाभ होगा।
छिन्दवाड़ा सिंचाई काम्पलेक्स परियोजना में पुनर्वास के लिए 969 करोड़ रूपये के विशेष पुनर्वास पैकेज की स्वीकृति
मंत्रि-परिषद द्वारा छिन्दवाड़ा सिंचाई कॉम्पलेक्स परियोजना में पुनर्वास के लिये स्वीकृत राशि 840 करोड़ 80 लाख रूपये के स्थान पर लगभग 969 करोड़ रूपये का विशेष पुनर्वास पैकेज स्वीकृति किया गया है। यह विशेष पैकेज त्वरित क्रियान्वयन व विस्थापितों के अपेक्षित सहयोग के लिए केन-बेतवा अन्तर्राज्यीय नदी जोड़ो परियोजना के समकक्ष प्रदान किए जाने का निर्णय लिया गया है।
छिन्दवाड़ा सिंचाई कॉम्पलेक्स परियोजना के अंतर्गत छिन्दवाड़ा जिले में संगम 1 बाँध, संगम 2 बाँध, रामघाट बांध एवं पांढुर्णा जिले में बेलेंसिग रिजर्वायर (पांढुर्णा) इस प्रकार कुल 4 बांध प्रस्तावित है, जिससे छिन्दवाड़ा एवं पांढुर्णा जिलों के 1,90,500 हैक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध होगी । परियोजना से छिन्दवाड़ा जिले के 369 एवं पांढुर्णा जिले के 259 ग्राम इस प्रकार कुल 628 ग्राम लाभान्वित होंगे।
लोक निर्माण अंतर्गत विकास कार्यों के लिए 25,164 करोड़ रूपये की स्वीकृति
मंत्रि-परिषद द्वारा लोक निर्माण विभाग अंतर्गत विकास कार्यों के लिए 25,164 करोड़ रूपये की स्वीकृति दी गई है। स्वीकृति अनुसार म..प्र. सड़क विकास निगम के माध्यम से सड़कों का निर्माण को 1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2031 तक निरंतर रखे जाने और संचालन के लिए 7 हजार 212 करोड़ रूपये, ग्रामीण सडकों एवं अन्य जिला मार्गों का निर्माण और उन्नयन के कार्य की निरंतरता के लिए 6 हजार 150 करोड रूपये, पुलों और सड़कों के उन्नयन के लिए 1 हजार 87 करोड़ रूपये, भवनों के मरम्मत और विभागीय परिसंपत्तियों के संधारण के लिए 765 करोड़ रूपये और वृहद पुलों का निर्माण की योजना को सोलहवें वित्त आयोग की अवधि (1 अप्रैल, 2026 से 31 मार्च, 2031) तक में निरंतर रखे जाने और संचालन के लिए 9 हजार 950 करोड़ रूपये की स्वीकृति प्रदान की गई है।
निःशुल्क साइकिल प्रदाय योजना और शैक्षणिक संस्थानों के उन्नयन के लिए 2,191 करोड़ रूपये की स्वीकृति
मंत्रि-परिषद द्वारा स्कूल शिक्षा विभाग अंतर्गत ग्राम क्षेत्रों में शासकीय विद्यालयों में कक्षा 6 वीं एवं कक्षा 9 वी में अध्ययनरत विद्यार्थियों को साइकिल प्रदाय करने से संबंधित निःशुल्क साइकिल प्रदाय योजना को वित्तीय वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक निरंतर रखने के लिए 990 करोड़ रूपये और शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं के वेतन भत्ते, कार्यालयीन व्यय एवं संस्थानों का सृदृढ़ीकरण से संबंधित 8 योजनाओं के संचालन के लिए 1,200 करोड़ 44 लाख रूपये की स्वीकृति प्रदान की गई है।
निःशुल्क साइकिल प्रदाय योजना मध्यप्रदेश में वर्ष 2004-05 से संचालित की जा रही है। निःशुल्क साइकिल प्रदाय योजना अंतर्गत निर्धारित मापदण्ड अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में निवासरत् विद्यार्थी जो कि शासकीय विद्यालयों में कक्षा 6 वीं एवं कक्षा 9 वी में अध्ययनरत् है, तथा वह जिस ग्राम का निवासी है उस ग्राम में शासकीय माध्यमिक / हाईस्कूल संचालित नहीं है तथा वह अध्ययन के लिए किसी अन्य ग्राम या शहर के शासकीय स्कूल में जाता है, उसे निःशुल्क साइकिल वितरण योजना अंतर्गत लाभान्वित किया जाता है।
प्रदेश में उन्नत चिकित्सा सेवाओं के लिए 5,479 करोड़ रूपये की स्वीकृति
मंत्रि-परिषद् द्वारा लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग अंतर्गत प्रदेश में उन्नत चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराने, चिकित्सा महाविद्यालयों में उन्नयन और मण्डला में नवीन शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय की स्थापना के लिए 5 हजार 479 करोड़ रूपये की स्वीकृति दी गई है।
स्वीकृति अनुसार मुख्यमंत्री समग्र एवं उन्नत तृतीयक स्वास्थ्य सेवा संस्था सुदृढ़ीकरण योजना (CM CARE 2025) योजना के 5 वर्षों तक निरंतर संचालन के लिए 3 हजार 628 करोड़ रूपये स्वीकृत किये गए है। योजना के माध्यम से तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं के एक सशक्त हब के रूप में शासकीय और स्वशासी चिकित्सा महाविद्यालयों एवं निजी क्षेत्र में सुपर स्पेशलिटी स्वास्थ्य सेवाओं का सुदृढ़ीकरण अंतर्गत ऑन्कोलॉजी (सर्जिकल, मेडिकल एवं रेडिएशन), कार्डियोलॉजी, कार्डियक सर्जरी तथा अंग प्रत्यारोपण इकाइयों की स्थापना आदि का प्रावधान किया जा रहा है। इसके लिए शासकीय निवेश के साथ-साथ निजी भागीदारों की विशेषज्ञता, नवीनतम तकनीक और पूंजी निवेश का उपयोग कर सेवाओं की उन्नत गुणवत्ता और उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी।
इसके साथ ही चिकित्सा महाविद्यालयो में उन्नयन के लिए 1 हजार 503 करोड़ रूपये स्वीकृत किए गए। स्वीकृति अनुसार इस योजना से चिकित्सा महाविद्यालयों में अगले 5 वर्षों तक चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार किया जा सकेगा।
मण्डला में नवीन शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय स्थापना के निर्माण के लिए पूर्व में स्वीकृत 249 करोड़ 63 लाख रूपये के स्थान पर 347 करोड़ 39 लाख रुपए की पुनरीक्षित प्रशासकीय स्वीकृति प्रदान की है। स्थल परिवर्तन के कारण तकनीकी कारणों से लागत में वृद्धि के कारण पुनरीक्षित प्रशासकीय स्वीकृति प्रदान की है। मण्डला में नवीन शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय की स्थापना से आसपास के क्षेत्र की जनता को तृतीयक स्तर की चिकित्सा सुविधाएं सुलभता से प्राप्त होंगी।
शासकीय चिकित्सा महाविद्यालयों में परिजन आवास की स्थापना की स्वीकृति
मंत्रि-परिषद ने प्रदेश के चुने हुए चिकित्सा महाविद्यालयों के परिसर में परोपकारी संस्थाओं के माध्यम से परिजन आवास स्थापित करने के लिए मंजूरी दी है। संस्थाएं ऐसे परिजन विश्राम गृह की स्थापना अपने वित्तीय संसाधनों से करेगी,जिसके लिए सरकार कोई कोई वित्तीय सहायता नहीं देगी। संस्था द्वारा सेवाओं के लिए लिया जाने वाला शुल्क का निर्धारण शासन द्वारा गठित समिति द्वारा किया जाएगा। प्रस्तावित व्यवस्था से मरीज के परिजनों को बेहतर व्यवस्था कम दरों पर मिलेंगी और मानसिक रूप से वे बेहतर स्थिति में होंगे, जिसका सीधा-सीधा लाभ अस्पताल की व्यवस्था पर पड़ेगा और व्यवस्था सुचारु होगी।
चिकित्सा महाविद्यालय से संबंधित अस्पतालों में दूर-दूर से मरीज आते हैं। इनके साथ परिजन भी आते हैं। इनमें से कई परिजन अस्पताल परिसर से बाहर ठहरने की व्यवस्था के व्यय भार को उठाने में सक्षम नहीं होने के कारण अस्पताल परिसर में हो सो जाते हैं। इससे अस्पताल परिसर की स्वच्छता व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, साथ ही परिजनों को भी ठहरने को आरामदायक स्थान नहीं मिल पाता है। इसका अप्रत्यक्ष असर अस्पताल की प्रशासनिक व्यवस्था तथा मरीज और अस्पताल स्टॉफ के मध्य संव्यवहार पर भी पड़ता है, जिससे अस्पतालों के कार्य प्रभावित होते हैं।
छठवें राज्य वित्त आयोग के कार्यों के संपादन के लिए 15 पदों के सृजन की स्वीकृति
मंत्रि-परिषद् द्वारा छठवें राज्य वित्त आयोग के कार्यों के संपादन के लिए कार्यकाल अवधि के लिए 15 पदों के सृजन की स्वीकृति दी है। राज्य शासन द्वारा छठवें राज्य वित्त आयोग का गठन किया जा चुका है।
मुख्यमंत्री यंग प्रोफेशनल फॉर डेवलपमेंट प्रोग्राम के लिए 24 करोड़ रूपये की स्वीकृति
मंत्रि-परिषद् द्वारा “मुख्यमंत्री यंग प्रोफेशनल फॉर डेवलपमेंट प्रोग्राम के तृतीय चरण को तीन वर्ष के संचालन के लिए 23 करोड़ 90 लाख रूपये की स्वीकृति प्रदान की गई है। साथ ही लोक सेवा प्रबंधन विभाग को अग्रिम कार्यवाही तथा प्रक्रिया निर्धारण कर नियमों एवं निर्देशों को जारी कर क्रियान्वयन के लिये अधिकृत किया गया है। क्रमांक/152/26
भोपाल मध्यप्रदेश: विजय राघवगढ़ से भाजपा विधायक और पूर्व मंत्री संजय पाठक को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है।आपराधिक अवमानना के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला दिया है। आपको बता दें कि संजय पाठक के परिवार से संबंधित माइनिंग कंपनीज के द्वारा अवैध उत्खनन किए जाने का मामला न्यायालय में विचाराधीन है और इस मामले में संजय पाठक ने हाईकोर्ट के माननीय न्यायाधीश विशाल मिश्रा को फोन पर संपर्क किया था, जिसके चलते अब संजय पाठक पर आपराधिक अवमानना का मामला हाईकोर्ट में दर्ज किया है और इसी से राहत पाने के लिए संजय पाठक सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने संजय पाठक को कोई राहत नहीं दी है। हाईकोर्ट द्वारा आपराधिक अवमानना लगाए जाने के बाद राहत के लिए भाजपा विधायक संजय पाठक सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। सुप्रीम कोर्ट ने संजय पाठक को हाईकोर्ट जाने के लिए स्वतंत्र कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत व न्यायमूर्ति जय माल्या बागची की युगलपीठ ने अहम निर्णय दिया है कि विधायक के विरुद्ध हाईकोर्ट द्वारा दर्ज किए गए आपराधिक अवमानना के प्रकरण में हाईकोर्ट ही विचार कर सकता है। अब हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की याचिकाकर्ता आशुतोष दीक्षित की विशेष अनुमति याचिका वापस लेने की अनुमति भी दे दी है। आपको बता दें कि संजय पाठक की कंपनी द्वारा अवैध उत्खनन किए जाने का यह मामला कटनी के याचिकाकर्ता आशुतोष दीक्षित ने ही उठाया है।
संजय पाठक के परिवार के नाम से संचालित माइनिंग।कंपनी ने अवैध उत्खनन किया है जिसके चलते 3 कंपनी पर 443 करोड का जुर्माना लगाया गया था। इस जुर्माने से बचने के लिए संजय पाठक ने हाईकोर्ट की शरण ली थी, लेकिन हाईकोर्ट से भी राहत मिलती न देख। उन्होंने इस मामले के न्यायाधीश विशाल मिश्रा से फ़ोन पर संपर्क किया था। इस बात का खुलासा तब हुआ जब विशाल मिश्रा ने स्वयं को इस मामले से अलग कर लिया औरन्यायालय प्रक्रिया में यह बात लिखित में उल्लेखित की कि उनसे संजय पाठक ने संपर्क किया है, इसलिए वे इस केस से अलग हो रहे हैं। उन्होंने इस पूरे प्रकरण को प्रशासनिक स्तर पर मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजने का भी निर्देश दिया था। विधायक का यह कृत्य न्यायपालिका की छवि को धूमिल करने व गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला माना गया। न्यायिक कार्य में हस्तक्षेप करना आपराधिक अवमानना की श्रेणी में आता है।हाईकोर्ट ने दो अप्रैल को याचिका का निराकरण करते हुए मामले पर संज्ञान लिया और भाजपा विधायक के विरुद्ध आपराधिक अवमानना का प्रकरण दर्ज करने का निर्देश दिया। इस मामले में संजय पाठक जितना हाथ पैर मार रहे हैं, उतना ही वे दलदल में फंसते जा रहे हैं, पूरे मामले को पहले संजय पाठक ने प्रशासन और शासन स्तर पर खुर्दबुर्द करने की कोशिश की, लेकिन शिकायतकर्ता आशुतोष दीक्षित लगातार इस मामले में शिकायत करते रहे और जब उन्हें शासन प्रशासन से भी कार्रवाई की उम्मीद नहीं दिखी तो उन्होंने याचिका के माध्यम से न्यायालय की शरण ली। और धीरे-धीरे इस पूरे मामले के तार खुलते चले गए, औरसंजय पाठक के परिवार द्वारा संचालित तीन कंपनी पर जुर्माना लगाया गया। अब देखना होगा कि संजय पाठक ने प्रदेश सरकार को जो राजस्व का नुकसान पहुंचाया है, उसकी भरपाई के लिए राज्य सरकार कब तक सक्रिय होती है और देश की भाजपा सरकार अपने ही विधायक संजय पाठक के इस कारनामे पर कैसी अनुशासनात्मक कार्रवाई करती है?
ग्वालियर मध्य प्रदेश: यदि आप शहर में संचालित पब्लिक ट्रांसपोर्ट टेम्पो और ई रिक्शा का प्रयोग कर रहे हैं और आप अपने साथ कीमती सामान, सोना, चांदी या मोटी रकम लिए हुए हैं तो सावधान हो जाइए क्योंकि इन ई रिक्शा और टेंपो में अचानक से लेडी थीफ सुनहरी आएगी और सुनहरी धूप के बीच आपके कीमती जेवरात को लेकर रफूचक्कर हो जाएगी। और घटना के बाद आप हाथ मलते रह जाएंगे।इसमें ग्वालियर शहर में ऐसे महिला चोर गैंग का आतंक है जो टेंपो और ई रिक्शा में बैठने वाले परिवार या महिलाओं को निशाना बनाती हैं और उनके पास से जेवर और कीमती सामान चुरा लेती हैं। पिछले कुछ समय में ऐसी घटनाएं बढ़ी हैं जिनको देखकर पुलिस प्रशासन भी परेशान है।
इस समय महिला चोर गैंग के सक्रिय होने की कई वजह हैं। एक दो शादियों का सीजन है। और शादियों के सीजन में ज्यादातर परिवार और महिलाएं जेवर यकीन लेकर यात्रा करते ही हैं। और दूसरा के शहर में पब्लिक ट्रांसपोर्ट के नाम पर ई रिक्शा और टेम्पो की भरमार है जिनमें ना सीसीटीवी होते हैं नहीं सुरक्षा के अन्य इंतजाम। महिला चोर इतनी शातिर हैं कि वह हाव भाव से भांप जाती हैं कि किस ई रिक्शा में ऐसा परिवार या महिला बैठ रही हैं, जिनके पास कीमती सामान है और फिर उसी में सवार हो जाती हैं और इधर उधर की बातों में लगाकर ध्यान भटका कर बैग से जेवर निकाल लेती हैं और अपना काम होते ही बीच में ही उतरकर आँखों से ओझल हो जाती है।
ग्वालियर में पिछले तीन दिन में ही ई रिक्शा टेम्पो से होने वाली इस तरह की चोरी की तीन घटनाएँ अलग अलग क्षेत्रों में हो चुकी हैं। टेम्पो और ई रिक्शा में बहुत सटकर बैठना पड़ता है जिसके चलते आसानी से चोर महिलाएं हाथ साफ कर लेती हैं।इसको देखते हुए ग्वालियर पुलिस ने ई रिक्शा और टेंपो चालकों को समझाइश और निर्देश देने का काम भी शुरू किया है, लेकिन इसका कोई परिणाम निकलता दिखाई नहीं दे रहा है। कई मामलों में, शहर के बाजारों में दुकानों पर लगे।सीसीटीवी के माध्यम से ही महिला चोर को पकड़ने के प्रयास किए जाते हैं। लेकिन जिस तरह से लगातार यह वारदातें हो रही हैं उनके चलते पुलिस के सभी दावे फेल नजर आ रहे हैं।
इस तरह की घटनाओं से बचने के लिए आमजन को खुद ही सावधान रहने की जरूरत है। सबसे जरूरी यह है कि यदि आवश्यक न हो तो जरूरत से ज्यादा कैश कीमती सामान या जेवर लेकर सफर न करें और यदि यात्रा करना मजबूरी है ही तो इस तरह के शेयरिंग ई रिक्शा टेम्पो का प्रयोग न करते हुए अपनी व्यक्तिगत ऑटो बुक कराएं। ऑटो कर्ज के कुछ रुपए बचाने का लालच आपको लाखों का नुकसान देता है। ऑटो में संभवतः आप शेयरिंग वाहन के मुकाबले ज्यादा सुरक्षित हैं। दूसरी बात जब भी आंख, कीमती सामान और जेवर लेकर सफर करें तो आसपास के लोगों की भावभंगिमा, उनके व्यवहार से उनकी हरकतों को समझने की कोशिश करें और ऐसी किसी भी स्थिति में ऐसे वाहन में न बैठे जिसमें कोई संदेह हो। इसके साथ ही जो भी कीमती सामान आप सफर के समय लेकर चल रहे हैं। उसको अपने बैग के अंदर कितना ज्यादा सुरक्षित रखें कि तीन या चार लेयर की सुरक्षा हो ताकि वहां तक पहुंचने में ज्यादा समय लगे क्योंकि जब समय ज्यादा लगता है तो चोरी की संभावना उतनी ही कम हो जाती है। आपकी सतर्कता ही बचाव है।
रीवा मध्यप्रदेश: वीडियो में नेता अपने कपड़े उतारते हैं। फिर एक युवती के साथ आपत्तिजनक हालत में हैं। पूरे घटनाक्रम को हनी ट्रैप से जोड़कर देखा जा रहा है। उनके साथ मौजूद युवती की उम्र काफी कम लग रही है। यह वीडियो इस समय सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है, जिसमें यह आरोप लगाए गए हैं कि वीडियो में दिखाए गए अधेड़ उम्र के पुरुष भाजपा के नेता हैं और पूर्व जनपद उपाध्यक्ष हैं। वहीं दूसरी ओर भाजपा ने भी इन्हें अपना नेता मानने से इनकार कर दिया है और इन्हें कांग्रेस का नेता बता दिया है। किसी भी पार्टी के हों, लेकिन यह तय है कि यह एक नेता हैं और अपने रसूख के दम पर अय्याशी में लिप्त हैं। इस संबंध में अभी तक इन नेताजी का कोई बयान सामने नहीं आया है, लेकिन यह जानकारी जरूर निकल कर आ रही है कि यह नेताजी किसी भी तरह के बयान से बचते नजर आ रहे हैं और कह रहे हैं कि उन्हें इस संबंध में किसी तरह की बात नहीं करनी है। वीडियो पर चर्चा तेज होने के बाद मऊगंज के भाजपा विधायक प्रदीप पटेल ने कहा कि विनोद मिश्रा कांग्रेस नेता हैं। वहीं प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता ने दावा किया कि नेताजी भाजपा विधायक के करीबी हैं। नेता की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।
इस पूरे मामले को हनी ट्रैप से जोड़कर भी देखा जा रहा है, क्योंकि युवती ने अपनी इंस्टा आईडी से शेयर किया था स्क्रीनशॉटवीडियो में नेता के साथ जो लड़की है, उसने अपनी इंस्टा आईडी से एक स्क्रीनशॉट पोस्ट शेयर किया था। इसमें उसने फनी बैकग्राउंड म्यूजिक लगाया था। भाजपा और कांग्रेस दोनों एक-दूसरे का नेता बता रहीमऊगंज से भाजपा विधायक प्रदीप पटेल ने कहा कि विनोद मिश्रा, श्रीनिवास तिवारी के परिवार से जुड़े रहे हैं। कांग्रेस के नेता हैं। सिद्धार्थ तिवारी बीजेपी में आ गए हैं। जमीन विवाद के एक मामले में विनोद मिश्रा के पास स्टे था।उन्होंने मुझसे मदद मांगी थी। मैंने वैध दस्तावेज और स्टे ऑर्डर होने के कारण उनका सहयोग किया था।
जहां तक मुझे जानकारी है कि विनोद मिश्रा ने अभी तक भाजपा जॉइन नहीं की है, लेकिन इस मामले में कहीं न कहीं षड्यंत्र हो सकता है। इसकी प्रशासन को गहन जांच करनी चाहिए।कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता विनोद शर्मा ने कहा कि भाजपा विधायक के करीबी का जिस तरह का वीडियो सामने आया है। यही बीजेपी का असली चाल चरित्र है। सभी जानते हैं कि संबंधित नेता भाजपा विधायक प्रदीप पटेल का खास है। वह भाजपा से ही ताल्लुक रखता है। यह किस तरह का महिला सशक्तिकरण किया जा रहा है। इस तरह के नेता संत के वेश में कालनेमि है। धर्म की बात तो केवल कैमरे के सामने करते हैं। बाकी आसाराम को भी फेल कर दिया है।
ग्वालियर मध्यप्रदेश: शहर के तमाम सफेद होश व्यापारी, जो बिल्डर और कॉलोनाइजर के रूप में काम कर रहे हैं। उनके लिए यह बुरी खबर है क्योंकि अपने रसूख और सामाजिक प्रतिष्ठा की आड़ में चल रहे काले कारनामों पर अब प्रशासन सख्ती दिखाने लगा है। शहर में ऐसे कई बिल्डर हैं जिन्होंने सरकारी जमीन घेर कर कॉलोनी बनाना अपना धंधा बना रखा है। लेकिन ग्वालियर कलेक्टर रुचिका चौहान के न्यायालय ने एक ऐसा फैसला किया है, जिसमें करोड़ों रुपए की पच्चीस बीघा सरकारी जमीन को बिल्डर से मुक्त कराने का आदेश दिया है। यह बेशकीमती जमीन शहर के कथित प्रतिष्ठित व्यापारियों द्वारा कूटचित दस्तावेज के माध्यम से हड़प ली गई थी।
ग्वालियर कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी के इस आदेश के बाद शहर के भूमाफियाओं में हड़कंप मचा हुआ है क्योंकि ऐसे अन्य कई सफेदपोश कथित प्रतिष्ठित बिल्डर और कॉलोनाइजर भी हैं जो अभी तक इस प्रकार की कार्रवाई से बचे हुए हैं, लेकिन कलेक्टर की यह सख्ती यदि आगे भी जारी रहती है तो कहीं ना कहीं उनके कारनामे भी जांच के घेरे में आकर इस तरह की कार्रवाई तक पहुंच सकते हैं। इस मामले में सरकारी जमीन को गलत तरीके से काट छांटकर निजी व्यक्ति के नाम चढ़ाया गया था, फिर बिना अहम दस्तावेज के उससे खरीदकर यह बिल्डर इस जमीन का व्यावसायिक उपयोग करना चाहते थे।
आपको बता दें कि मेसर्स आधुनिक डेवलपर्स, क्लासिक डेवलपर्स और सुपरफाइन डेवलपर्स ने कलेक्टर न्यायालय में एक आवेदन प्रस्तुत किया था।इस आवेदन के अनुसार सर्वे क्रमांक 1616 और 1617 की भूमि से अहस्तांतरणीय शब्द को हटाने की बात कही गई थी ताकि इन कंपनी के मालिक इस जमीन का व्यावसायिक उपयोग कर सकें। कलेक्टर ने संबंधित एसडीएम को रिकॉर्ड जांचने के लिए निर्देशित किया और एसडीएम ने जांच में पाया कि यह जमीन 1962 तक सरकारी रिकॉर्ड में बीहड़ और पहाड़ के रूप में दर्ज है और 1963 में अचानक बिना किसी सक्षम अधिकारी के आदेश के ही करण सिंह पुत्र।सीताराम के नाम पर दर्ज हो गई।
किस सक्षम अधिकारी के किस आदेश के तहत किस कारण से यह जमीन करण सिंह को आवंटित की गई इसके कोई दस्तावेज नहीं मिले। एसडीएम की जांच रिपोर्ट के आधार पर कलेक्टर न्यायालय ने जमीन के कथित सफेद पोश मालिकों को पर्याप्त समय दिया कि वे संबंधित जमीन के दस्तावेज प्रस्तुत करें, लेकिन इन बिल्डर्स की तरफ से कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया जा सका। इस आधार पर कलेक्टर न्यायालय ने 5.403 हेक्टेयर जमीन को शासकीय घोषित कर दिया है।साथ ही एसडीएम ग्वालियर सिटी को यह निर्देश भी दिया है कि इस जमीन पर अब तक जितने भी विक्रय पत्र जारी हुए हैं।उन्हें शून्य घोषित कर विधिक कार्रवाई करे। खसरे खतौनी से निजी नाम हटाकर तुरंत मध्यप्रदेश शासन दर्ज करें।
ग्राम कुलेत स्थित यह 25 बीघा जमीन जिन तीन कंपनी मेसर्स आधुनिक डेवलपर्स, सुपरफाइन डेवलपर्स और क्लासिक डेवलपर्स द्वारा व्यावसायिक रूप से बेचने की जुगत लगाई जा रही थी। इन कंपनी के मालिक राजेंद्र सेठ, सुदर्शन झंवर और राजकुमार गोयल हैं जो इस जमीन को निजी बताकर व्यावसायिक रूप से बेचने की तैयारी में थे। लेकिन कलेक्टर के निर्देश पर एसडीएम द्वारा की गई जांच में इनका फर्जीवाड़ा उजागर हो गया। जिस तरह से कलेक्ट्रेट न्यायालय में यह बिल्डर कोई सबूत पेश नहीं कर सके, उससे साफ हो गया कि गलत तरीके से सरकारी जमीन निजी नाम पर चढ़वा कर बेचने का षड्यंत्र किया जा रहा था। इस पूरे मामले ने इस हकीकत पर मुहर लगा दी है की शहर के रसूखदार बिल्डर दशकों पुराने राजस्व रिकॉर्ड में हेर फेर कर सरकारी संपत्तियों को निजी बनाकर उसकी बंदर बांट कर रहे हैं। अब देखना होगा कि ऐसे ही शहर के अन्य मामलों में कलेक्टर न्यायालय द्वारा क्या फैसला होता है और आगे प्रशासन उन सरकारी जमीनों को मुक्त कराने में किस तरह से कार्रवाई करता है?
मुरैना मध्यप्रदेश: मध्यप्रदेश का मुरैना और भिंड जिला अवैध रेत उत्खनन के लिए कुख्यात है। रेत माफिया इस कदर हावी है कि कई लोगों की मौत भी हो चुकी है। अभी हाल ही में मुरैना में वर्णरक्षक, ऋषिकेश गुर्जर की हत्या रेत माफिया ने ट्रैक्टर से कुचलकर कर दी थी। इस हत्या के बाद मुरैना में हावी रेत माफिया का मुद्दा एक बार और गर्माया और सवाल उठने लगे कि नेताओं के संरक्षण में चल रहा रेत?माफिया कब तक ऐसे ही लोगों की जान लेता रहेगा? इस मामले के बाद पहली बार न केवल भाजपा नेताओं का नाम इस हत्या में सामने आया, बल्कि दो भाजपा नेताओं पर मामला भी दर्ज किया गया। और यह साफ हो गया कि सत्ताधारी भाजपा के संरक्षण में ही अवैध रेत उत्खनन का गंदा खेल चंबल में चल रहा है।
रेत परिवहन कर रही ट्रैक्टर को रोकने के प्रयास में 1 आरक्षक की मौत हो गई। मामले के तूल पकड़ने पर कार्रवाई शुरू हुई मुरैना जिले के दिमनी थाना ने ट्रैक्टर चालक पर एफआईआर दर्ज की और जब पता चला कि यह पूरा काम भाजपा नेता पवन तोमर और सोनू चौहान करवा रहे हैं, तो बाद में जब मामला तूल पकड़ा तो एफआईआर में इन दोनों के नाम भी जोड़े गए। अब दोनों भाजपा नेताओं और ट्रैक्टर चालक पर हत्या, अवैध उत्खनन, खनिज चोरी की धाराओं में मामला दर्ज किया गया है। लेकिन इन छुटभैये भाजपा नेताओं को कौन से भाजपा मंत्री का संरक्षण प्राप्त था जिसके चलते यह रेत माफिया सक्रिय था, इस बात का खुलासा अभी तक पुलिस नहीं कर सकी है और शायद आगे कर भी नहीं पाएगी?
दिमनी थाना क्षेत्र के रामपुर में 8 अप्रैल को बन विभाग की टीम गश्त पर थी। उसी समय अवैध रेत से भरी ट्रैक्टर ट्रॉली दिखाई दी, जिसे रोकने का प्रयास 1 विभाग की टीम ने किया। जब ट्रैक्टर नहीं रुका तो हृषिकेश गुर्जर ट्रैक्टर पर लटक गया, लेकिन ट्रैक्टर चालक ने ट्रैक्टर न रोकते हुए ट्रैक्टर ही 1 आरक्षक रेशे ऋषिकेश पर चढ़ा दिया और बेरहमी से ऋषिकेश की हत्या कर दी। ट्रैक्टर चालक का यह तरीका साफ बता रहा है कि उसको किसी का डर नहीं था या कहें कि उसके ऊपर किसी न किसी रसूखदार सत्ताधारी नेता या मंत्री का संरक्षण था। शुरुआत में पुलिस ने ट्रैक्टर चालक पर मामला दर्ज किया था तो वहीं वन विभाग ने ट्रैक्टर चालक के साथ भाजपा नेता पवन तोमर और सोनू चौहान पर प्राथमिकी दर्ज की थी। जिसके बाद पुलिस को भी अपनी एफआईआर में दोनों भाजपा नेताओं के नाम जोड़ने पड़े।
आपको बता दें कि चंबल अंचल में चंबल नदी से रेत के उत्खनन पर एनजीटी ने सख्ती से रोक लगा रखी है। इसके बावजूद यहाँ अवैध उत्खनन खुलेआम चलता है।यहाँ के जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी और पुलिस अधिकारियों को भी पता है कि कौन कहां अवैध उत्खनन कर रहा है। पहले भी वन विभाग की एक जुझारू महिला अधिकारी उत्खनन के विरोध में कार्यवाही कर रही थी, जिसे दबंग सत्ताधारी नेता ने अपने प्रभाव के चलते जिले से बाहर फिकवा दिया था। मतलब साफ नजर आता है कि क्षेत्र में रेत माफिया की सत्ताधारी भाजपा से साठगांठ है। जिसके चलते प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी अपने हिस्से के टुकड़े लेकर खामोश बैठते हैं। और जो खामोश नहीं बैठता, उसे ऋषिकेश गुर्जर की तरह खामोश कर दिया जाता है।
भाजपा के कद्दावर मंत्री एदल सिंह कंसाना रेत माफिया को पेट माफिया बता चुके हैं। इस तरह उन्होंने रेत माफिया को खुलेआम अवैध कारोबार का मानो सर्टिफिकेट दे दिया है। एक और भाजपा की कद्दावर नेत्री का वह बयान अब तक याद आता है पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने चंबलपुर से गुजरते हुए जब रेत का उत्खनन देखा था तो उन्होंने भी इस पर गंभीर नाराजगी जताई थी। लेकिन रेत माफिया सत्ताधारी पार्टी में इस कदर हावी है कि उमा भारती की वह नाराजगी भी कहीं रफा दफा हो गई और रेत माफिया को संरक्षण देने वाले या कहें, रेतमातरा का संचालन करने वाले सत्ताधारी पार्टी के कद्दावर मंत्रियों और नेताओं ने पूर्व मुख्यमंत्री की आवाज भी दबा दी।
अब आप समझिए कि मुरैना के दिमनी छाना क्षेत्र में वनरक्षक ऋषिकेश गुर्जर की रेत माफिया द्वारा हत्या के मामले में इतनी कार्रवाई क्यों करनी पड़ रही है, इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लिया है और तेरह अप्रैल को इसकी सुनवाई होनी है।अब, यदि पुलिस कार्रवाई नहीं करती, तो पुलिस अधिकारियों को माननीय न्यायालय के सामने जवाब देते नहीं बनता। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है और इस जवाब की तैयारी मुरैना। पुलिस और मुरैना 1 विभाग को करनी है और वही जवाब सुप्रीम कोर्ट के सामने मध्य प्रदेश सरकार की तरफ से दिया जाएगा। अब, यदि इस जवाब में कोई चूक या कमी रह जाती है, तो जिम्मेदारों को माननीय सुप्रीम कोर्ट की सख्ती का सामना करना पड़ सकता है। अब देखना होगा कि तेरह अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट इस मामले में आगे क्या निर्देश देती है?