ग्वालियर मध्यप्रदेश: शहर के तमाम सफेद होश व्यापारी, जो बिल्डर और कॉलोनाइजर के रूप में काम कर रहे हैं। उनके लिए यह बुरी खबर है क्योंकि अपने रसूख और सामाजिक प्रतिष्ठा की आड़ में चल रहे काले कारनामों पर अब प्रशासन सख्ती दिखाने लगा है। शहर में ऐसे कई बिल्डर हैं जिन्होंने सरकारी जमीन घेर कर कॉलोनी बनाना अपना धंधा बना रखा है। लेकिन ग्वालियर कलेक्टर रुचिका चौहान के न्यायालय ने एक ऐसा फैसला किया है, जिसमें करोड़ों रुपए की पच्चीस बीघा सरकारी जमीन को बिल्डर से मुक्त कराने का आदेश दिया है। यह बेशकीमती जमीन शहर के कथित प्रतिष्ठित व्यापारियों द्वारा कूटचित दस्तावेज के माध्यम से हड़प ली गई थी।
ग्वालियर कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी के इस आदेश के बाद शहर के भूमाफियाओं में हड़कंप मचा हुआ है क्योंकि ऐसे अन्य कई सफेदपोश कथित प्रतिष्ठित बिल्डर और कॉलोनाइजर भी हैं जो अभी तक इस प्रकार की कार्रवाई से बचे हुए हैं, लेकिन कलेक्टर की यह सख्ती यदि आगे भी जारी रहती है तो कहीं ना कहीं उनके कारनामे भी जांच के घेरे में आकर इस तरह की कार्रवाई तक पहुंच सकते हैं। इस मामले में सरकारी जमीन को गलत तरीके से काट छांटकर निजी व्यक्ति के नाम चढ़ाया गया था, फिर बिना अहम दस्तावेज के उससे खरीदकर यह बिल्डर इस जमीन का व्यावसायिक उपयोग करना चाहते थे।
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आपको बता दें कि मेसर्स आधुनिक डेवलपर्स, क्लासिक डेवलपर्स और सुपरफाइन डेवलपर्स ने कलेक्टर न्यायालय में एक आवेदन प्रस्तुत किया था।इस आवेदन के अनुसार सर्वे क्रमांक 1616 और 1617 की भूमि से अहस्तांतरणीय शब्द को हटाने की बात कही गई थी ताकि इन कंपनी के मालिक इस जमीन का व्यावसायिक उपयोग कर सकें। कलेक्टर ने संबंधित एसडीएम को रिकॉर्ड जांचने के लिए निर्देशित किया और एसडीएम ने जांच में पाया कि यह जमीन 1962 तक सरकारी रिकॉर्ड में बीहड़ और पहाड़ के रूप में दर्ज है और 1963 में अचानक बिना किसी सक्षम अधिकारी के आदेश के ही करण सिंह पुत्र।सीताराम के नाम पर दर्ज हो गई।
किस सक्षम अधिकारी के किस आदेश के तहत किस कारण से यह जमीन करण सिंह को आवंटित की गई इसके कोई दस्तावेज नहीं मिले। एसडीएम की जांच रिपोर्ट के आधार पर कलेक्टर न्यायालय ने जमीन के कथित सफेद पोश मालिकों को पर्याप्त समय दिया कि वे संबंधित जमीन के दस्तावेज प्रस्तुत करें, लेकिन इन बिल्डर्स की तरफ से कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया जा सका। इस आधार पर कलेक्टर न्यायालय ने 5.403 हेक्टेयर जमीन को शासकीय घोषित कर दिया है।साथ ही एसडीएम ग्वालियर सिटी को यह निर्देश भी दिया है कि इस जमीन पर अब तक जितने भी विक्रय पत्र जारी हुए हैं।उन्हें शून्य घोषित कर विधिक कार्रवाई करे। खसरे खतौनी से निजी नाम हटाकर तुरंत मध्यप्रदेश शासन दर्ज करें।
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ग्राम कुलेत स्थित यह 25 बीघा जमीन जिन तीन कंपनी मेसर्स आधुनिक डेवलपर्स, सुपरफाइन डेवलपर्स और क्लासिक डेवलपर्स द्वारा व्यावसायिक रूप से बेचने की जुगत लगाई जा रही थी। इन कंपनी के मालिक राजेंद्र सेठ, सुदर्शन झंवर और राजकुमार गोयल हैं जो इस जमीन को निजी बताकर व्यावसायिक रूप से बेचने की तैयारी में थे। लेकिन कलेक्टर के निर्देश पर एसडीएम द्वारा की गई जांच में इनका फर्जीवाड़ा उजागर हो गया। जिस तरह से कलेक्ट्रेट न्यायालय में यह बिल्डर कोई सबूत पेश नहीं कर सके, उससे साफ हो गया कि गलत तरीके से सरकारी जमीन निजी नाम पर चढ़वा कर बेचने का षड्यंत्र किया जा रहा था। इस पूरे मामले ने इस हकीकत पर मुहर लगा दी है की शहर के रसूखदार बिल्डर दशकों पुराने राजस्व रिकॉर्ड में हेर फेर कर सरकारी संपत्तियों को निजी बनाकर उसकी बंदर बांट कर रहे हैं। अब देखना होगा कि ऐसे ही शहर के अन्य मामलों में कलेक्टर न्यायालय द्वारा क्या फैसला होता है और आगे प्रशासन उन सरकारी जमीनों को मुक्त कराने में किस तरह से कार्रवाई करता है?
