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अवैध बूचड़ खाने के विरोध में गौ सेवकों की मुख्यमंत्री को चेतावनी

ग्वालियर मध्य प्रदेश; ग्वालियर में 2 दिन पहले मवेशियों की हड्डियों से भरे ट्रक और पांच आरोपियों के पकड़े जाने के बाद आज गौ सेवक पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचे। जहां उन्होंने नारेबाजी कर प्रदर्शन किया। गौ सेवकों की मांग थी कि गिरफ्तार आरोपियों के खिलाफ मकान तोड़ने की कार्रवाई की जाए। इसके साथ ही इसकी जांच SIT की टीम गठित करा कर कराई जाए। वहीं पुलिस अधिकारियों ने इस मामले को लेकर मांगो को पूरा करने और जांच का हवाला देते हुए कार्रवाई करने का आश्वासन दिया है। आपको बता दें कि भोपाल के बाद ग्वालियर में कुछ दिनों से बूचडखाने में गौ हत्या किए जाने का मामला गरमाया हुआ है।

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ग्वालियर पुलिस अधीक्षक कार्यालय में आज भारी संख्या में गौ सेवक पहुंचे। जहां उन्होंने प्रदर्शन कर नारेबाजी कर दी। नारेबाजी करने के बाद पुलिस अधिकारी को अपनी मांगों को लेकर एक ज्ञापन सौपा हैं। उनकी मांग थी कि झांसी रोड थाना क्षेत्र के चेतकपुरी रोड पर 2 दिन पहले सोमवार मंगलवार की रात 12:30 बजे गौवंश की हड्डियां होने की आशंका के चलते गौ सेवकों ने एक ट्रक को पकड़ा था। जिसमें मवेशियों के काफी सारी हड्डियां भारी हुई मिली थी और चार आरोपियों को पकड़ कर पुलिस के हवाले किया था इसके साथी बूचड़ खाना चलने वाले पांचवे आरोपी वसीम को भी पुलिस ने पकड़ लिया और उनके खिलाफ FIR की गई। लेकिन 2 दिन बीत जाने के बावजूद भी पुलिस ने उनका ना तो कोई जुलूस निकाला और ना ही कोई ठोस कार्रवाई उनके खिलाफ की गई।

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गौ सेवकों की मांग है कि पुलिस इस मामले को लेकर SIT टीम गठित करने की मांग की है इसके साथ ही जो हड्डियां पुलिस को मिली है उनको जांच के लिए हैदराबाद भेजा गया है इसके अलावा और भी जगह है जहां सैंपलिंग के लिए भेजा जाना चाहिए जिससे निष्पक्ष जांच की जा सके। यहां इसलिए क्योंकि हैदराबाद में बहुमूल्य क्या है इस बात का सबको पता है क्या वहां बिकता है क्या नहीं बिकता इसलिए वहां हैदराबाद भेजना सही नहीं था। मध्य प्रदेश में कोई लैब की कमी नहीं है वहां भी जांच के लिए भेजा जा सकता था। इसके साथ ही बुलडोजर की मांग की है आरोपियों की जो अवैध घर हैं उनको तोड़ा जाए साथ ही चेतावनी दी है कि अगर 3 दिन के अंदर कार्रवाई नहीं की जाती है तो गौवंश सेवक बूचड़ खाने खुद जाकर बंद कराएगा। वही इस मामले में एसपी सुमन गुर्जर का कहना है कि हड्डियों की जांच के लिए भेजा गया है और उसकी रिपोर्ट आने के बाद आगे की सख्त कार्रवाई की जाएगी।

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आ गया एक साल का BEd, जानिए क्या है पूरी प्रक्रिया

डिजिटल डेस्क 1 year BEd; राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (NCTE) द्वारा शैक्षणिक सत्र 2026-27 से 1 साल का बी.एड (Bachelor of Education) कोर्स शुरू किया जा रहा है। यह 12 महीने का सघन कार्यक्रम (Intensive Programme) है, जो मुख्य रूप से स्नाकोत्तर (Postgraduate) डिग्री धारकों के लिए है। इसका उद्देश्य कम समय में योग्य उम्मीदवारों को शिक्षक बनने के लिए प्रशिक्षित करना है। देश में शिक्षक बनने की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए एक बड़ी राहत की खबर सामने आई है। करीब दस साल बाद फिर से 1 वर्षीय B.Ed कोर्स को लागू करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। नई शिक्षा नीति 2020 के तहत राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दी है। पिछले वर्षों में दो साल का B.Ed अनिवार्य होने से कई छात्रों को समय और खर्च दोनों की चुनौती झेलनी पड़ी थी। अब यह नया बदलाव उन अभ्यर्थियों के लिए खास अवसर बनकर उभरा है, जो कम समय में प्रोफेशनल टीचर ट्रेनिंग लेकर शिक्षा क्षेत्र में प्रवेश करना चाहते हैं।

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1 साल का B.Ed कोर्स विशेष रूप से उन छात्रों के लिए डिजाइन किया गया है, जिन्होंने चार वर्षीय इंटीग्रेटेड ग्रेजुएशन या पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा कर लिया है। इस कोर्स में थ्योरी के साथ-साथ प्रैक्टिकल ट्रेनिंग पर अधिक फोकस रहेगा। स्कूल इंटर्नशिप, डिजिटल टीचिंग टूल्स, स्मार्ट क्लास टेक्नोलॉजी और बाल मनोविज्ञान जैसे विषयों को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। NCTE के अनुसार, जिन छात्रों की शैक्षणिक पृष्ठभूमि पहले से मजबूत है, उनके लिए एक साल की गहन ट्रेनिंग पर्याप्त मानी गई है। इससे प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता भी तेजी से बढ़ेगी।

इस फैसले का सबसे बड़ा लाभ यह है कि अब शिक्षक बनने का रास्ता छोटा और किफायती हो जाएगा। दो साल की जगह एक साल में कोर्स पूरा होने से युवाओं का समय बचेगा और वे जल्दी शिक्षक भर्ती परीक्षाओं में शामिल हो सकेंगे। कम फीस होने से मध्यमवर्गीय और ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्रों को भी अवसर मिलेगा। शिक्षा क्षेत्र में प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी दूर करने में यह कदम मददगार साबित हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर ट्रेनिंग के साथ स्कूलों में पढ़ाई का स्तर भी सुधरेगा।

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आवेदक ने चार वर्षीय इंटीग्रेटेड स्नातक डिग्री या पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा किया हो।
सामान्य वर्ग के लिए न्यूनतम 50% अंक अनिवार्य हैं।
आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को 45% अंकों की छूट मिलेगी।
अधिकतम आयु सीमा निर्धारित नहीं की गई है।
स्नातक या परास्नातक की मार्कशीट और डिग्री प्रमाणपत्र।
आधार कार्ड या अन्य वैध पहचान पत्र।
पासपोर्ट साइज फोटो और हस्ताक्षर की स्कैन कॉपी।
जाति प्रमाणपत्र (यदि लागू हो)।
यह कोर्स अवधि में छोटा जरूर है, लेकिन इसे आधुनिक जरूरतों के अनुसार तैयार किया गया है। इसमें डिजिटल शिक्षा, नई शिक्षण पद्धतियों और व्यवहारिक प्रशिक्षण को प्राथमिकता दी गई है। सरकारी कॉलेजों में संभावित फीस 20,000 से 25,000 रुपये के बीच हो सकती है, जबकि निजी संस्थानों में यह लगभग 30,000 रुपये तक रह सकती है। कुछ राज्यों में स्कॉलरशिप और इंटर्नशिप स्टाइपेंड की सुविधा भी मिल सकती है। कम समय और कम खर्च के कारण यह कोर्स युवाओं के लिए आकर्षक विकल्प बन सकता है।

सनातनी सरकार के मंत्री के विधानसभा क्षेत्र में अवैध कत्लखाना, गौमांस और हड्डियों की तस्करी?

ग्वालियर मध्य प्रदेश: अभी हाल ही में सोमवार रात झांसी रोड पुलिस ने हिंदूवादी संगठनों से मिली सूचना पर मवेशियों की हड्डियों से भरा एक ट्रक पकड़ा था।झाँसी का था। समाजसेवी एपीएस गुर्जर और पंकज ठाकुर ने पुलिस को जानकारी दी थी कि सेवा नगर और नूरगंज क्षेत्र में गऊमास और हड्डियों की तस्करी की जाती है और उन्हीं का यह ट्रक झाँसी जा रहा है। जब तमाम समाजसेवियों की उपस्थिति में ट्रक को खोला गया तो दृश्य चौंकाने वाला था। पूरा ट्रक हड्डियों से भरा हुआ था। पुलिस ने इस मामले में आसिफ खान शाहरुख खान अनवर खान अरमान खान के खिलाफ पशु क्रूरता अधिनियम का मामला दर्ज किया था। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि यदि मामला गऊमास और हड्डियों की तस्करी से जुड़ा है तो इतना बड़ा काम इतने लंबे समय से संचालित हो रहा था तो जिम्मेदारों को खबर क्यों नहीं लगी?

समाजसेवी एपीएस गुर्जर का कहना है कि सेवा नगर किले की तलहटी पर झाड़ियों से घिरी एक सुनसान जगह है जहां यह अवैध गतिविधि लंबे समय से चल रही है।उस क्षेत्र में आप मेरी सड़क से भी कभी निकलते हैं तो मांस की दुर्गंध आपको असहज कर देती है। एपीएस गुर्जर को वहां से ट्रक भर कर हड्डियां। तस्करी करने की जानकारी थी और उन्होंने पूरी जानकारी लेने के बाद ही 9 फरवरी के रात को ट्रक निकलने की सूचना मिलने पर उसे पकड़ने का प्रयास किया था। ट्रक सेवा नगर से निकल चुका था और झांसी रोड पर उसे पकड़ने में इन्हें सफलता मिली। उन्होंने दावा किया कि ट्रक में गाय के कटे हुए पैर हड्डियां और मांस बरामद हुआ है। पुलिस इस मामले में अभी जांच की बात कर रही है।

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ऐसी जानकारी मिली है कि इन हड्डियों को झांसी और कटनी भेजा जा रहा था जहां पर इनको पीसा जाता है। मुख्य सरगना वसीम खान ने भी बताया है कि हड्डियों को पिसाई के लिए वह कटनी भेजता है। इन हड्डियों का उपयोग शक्कर की सफाई दवाईयों के कैप्सूल कवर और बोन चाइना बर्तन बनाने में होता है। इसके साथ ही इसमें फास्फोरस होने के चलते इसका उपयोग खाद के रूप में भी किया जाता है। साथ ही हड्डियों के इस पाउडर से कई दवाएं और सौंदर्य प्रसाधन भी बनाए जाते हैं। आरोपी का कहना है के उसने शिवपुरी की पंचायतों से मृत पशुओं को उठाने का ठेका लिया है। तो वहीं शासन के जिम्मेदार विभाग अपनी जिम्मेदारी की फुटबॉल इधर-उधर उछाल रहे हैं। जिला प्रशासन का कहना है कि हड्डियों और मांस के कारोबार की अनुमति निगम का अधिकार क्षेत्र है तो पशुपालन विभाग का कहना है कि वह केवल जीवित मवेशियों के व्यापार की अनुमति देता है।मांस या हड्डियों के कारोबार की नहीं वहीं नगर निगम का कहना है कि वह किसी भी प्रकार के अवैध कारोबार की अनुमति नहीं देता है। फिर मृत पशुओं और गायों को उठाने और उनके शरीर को सम्मानपूर्वक अंतिम विदाई देने की क्या व्यवस्था है इस बारे में किसी प्रशासनिक अधिकारी ने कोई जानकारी नहीं दी है।

आपको बता दें कि अभी हाल ही में भोपाल में भी एक स्लॉटर हाउस से गऊमास बड़ी मात्रा में मिलने की जानकारी मिली थी। राजधानी में चलने वाले गऊ मांस के कारोबार ने प्रदेश की मोहन सरकार पर बड़े सवाल खड़े किए थे। क्योंकि भाजपा हमेशा यह दावा करती है कि वह गौ रक्षक है। भोपाल के बाद अब ग्वालियर में सेवा नगर और नूरगंज इलाके में जिस तरह से अवैध कत्ल काना संचालित होना उजागर हुआ और यह कत्लखाना भी प्रदेश की भाजपा सरकार के ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर के क्षेत्र में आता है। आप सोचिए कि इसी तरह के कत्लखा ने जहां गऊ मांस और हड्डियों की तस्करी के आरोप लगे हो यह खुलासा किसी गैर भाजपा शासित राज्य में होता या किसी ऐसे विधायक के क्षेत्र में होता या किसी ऐसे मंत्री के क्षेत्र में होता जिसका भाजपा से कोई नाता नहीं है तो क्या आज भाजपा सड़क पर उतरकर ऐसी घटनाओं का विरोध नहीं करती? और जिस तरह से भाजपा इन मामलों पर खामोश है ऐसा लगता है कि प्रदेश की भाजपा सरकार का संरक्षण भी ऐसे तस्करों को मिला हुआ है। 

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समाजसेवियों के ऐसे आरोप हैं। ये शहर के आवारा मवेशियों को चोरी छुपे पकड़कर किले की तलहटी में लाया जाता है जहां उन्हें काटकर मांस और हड्डियों को बोरियों में भर कर तस्करी की जाती है। मुख्य सरगना वसीम खान हर महीने पांच ट्रक अवैध हड्डियां और मांस झांसी और कटनी भेज रहा है। यह पूरा अवैध धंधा मृत पशुओं के शव उठाने की आड़ में खुलेआम सेवा नगर और नूरगंज में चल रहा है। यदि यह कारोबार अभेद्य नहीं है तो इसे रात के अंधेरे में ही क्यों अंजाम दिया जाता है क्योंकि क्षेत्र के लोग भी अब बता रहे हैं कि हड्डियों और मांस से भरे हुए यह ट्रक रात के अंधेरे में ही यहां से निकाले जाते हैं। सवाल प्रदेश की भाजपा सरकार के सामने अब यह है कि भोपाल स्लॉटर हाउस के बाद अब ग्वालियर सेवानगर नूरगंज का अवैध कत्लखाना और इसके आगे और कितने ऐसे कत्लखाने?

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प्रशासनिक लापरवाही का घड़ा (कलश) भरा तो भगदड़ में मौत की सच्चाई की आवाज दबाने का हुआ तमाशा

डबरा भगदड़ हादसा: ग्वालियर के डबरा क्षेत्र में नवग्रह मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के दौरान आयोजित कलश यात्रा में हुई भगदड़ में एक महिला की मौत हो जाती है और 10 महिलाएं घायल होती हैं। यह आम लोग धार्मिक आयोजन में जाते ही मरने के लिए हैं। माफ कीजिए लेकिन यह इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि धार्मिक आयोजनों में भगदड़ और मौत का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी तमाम ऐसे मामले हो चुके हैं। बात चाहे मध्यप्रदेश की हो चाहे देश के अन्य राज्यों की धार्मिक आयोजनों में भीड़ जुटाने के लिए प्रशासन अपने आकाओं को खुश करने के लिए नियम विरुद्ध सारे हथकंडे अपनाता है और गरीब मासूमों को मौत के मुंह में ढकेल देता है। लेकिन माफ कीजिए प्रशासनिक लापरवाही का घड़ा अभी भी नहीं भरा है और मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि आने वाले समय में होने वाले धार्मिक आयोजनों में भी ऐसी घटनाएं होती रहेंगी!

डबरा नवग्रह मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का आयोजन पूर्व मंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा द्वारा किया जा रहा है। वे ही प्रमुख आयोजक हैं और भाजपा सरकार में पूर्व मंत्री हैं तो पूरी भाजपा सरकार भी इस कार्यक्रम की तैयारियों में जुटी हुई है और प्रशासन को भीड़ जुटाने से लेकर सभी तामझाम के लिए लगाया हुआ है। बड़े बड़े कथित कथावाचक और संत यहां आने वाले हैं और उनकी आवभगत जनता की सुरक्षा से ज्यादा आवश्यक है। माफ कीजिए प्रशासन की जवाबदेही आम जनता के प्रति नहीं है बल्कि नौकरी को संरक्षित रखते हैं। यही कारण है कि तमाम धार्मिक आयोजनों में हुई भगदड़ की घटनाओं को जांच के नाम पर दबा दिया जाता है। आमजन की आवाज को कुचल दिया जाता है।हाल ही में सीहोर में भी प्रदीप शास्त्री के कार्यक्रम के दौरान भगदड़ हुई थी।मौत हुई थी लेकिन उसके बाद भी किसी भी प्रशासनिक अधिकारी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई थी।

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 ऐसे आयोजनों में लगे प्रशासनिक अधिकारियों को ठीक से होमवर्क करना चाहिए। उन्हें क्राउड मैनेजमेंट का पाठ पढ़ना चाहिए। कितना क्षेत्र है? उसमें कितने लोग आ सकते हैं? कितने समय में कितने लोगों को प्रवेश देना चाहिए। यदि आयोजन स्थल पर पर्याप्त स्थान नहीं है तो भीड़ को कैसे दूसरे क्षेत्रों में रोका जाना चाहिए और कहीं कोई अव्यवस्था होती है तो भीड़ के निकासी के क्या विकल्प होने चाहिए? ऐसे ही तमाम बिंदुओं पर क्या आयोजन से पूर्व मंथन होता है?यदि मंथन होता है तो क्या इनका क्रियान्वयन होता है?यदि क्रियान्वयन होता है तो फिर यह अति शिक्षित अधिकारी इस क्रियान्वयन में फैल क्यों हो जाते हैं और यदि मंथन नहीं होता है तो फिर ऐसे अयोग्य अधिकारियों को पद पर भेजा ही क्यों जाता है? 

एक और बात मै दावे के साथ कह सकता हूं कि किसी लापरवाही से हुई मौत के मामले में जांच और कार्रवाई इस बात पर निर्भर करती है कि मरा कौन है यदि कोई आम ऐसा व्यक्ति मरता है जिसकी कोई औकात नहीं है तो फिर जांच में सभी दोषी पाक साफ पाए जाते हैं। और यकीन मानिए कि यदि ऐसे किसी धार्मिक आयोजन के भगदड़ में किसी माननीय के घर से या किसी रसूखदार ब्यूरोक्रेट्स के घर से या किसी न्यायाधीश के घर से कोई अनहोनी हो तो जांच एक अलग ही दिशा में चलेगी और कार्यवाही भी एक अलग स्वरूप में आपको नजर आएगी। लेकिन गरीब इस देश में इसलिए गरीब रखा जाता है कि वह भीड़ का हिस्सा बने और यदि मौत हो भी जाए तो लाख दो लाख रुपये उसके मुंह में ठूंस कर उसकी आवाज दबा दी जाए।

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डबरा में हुए रतिबाई साहू की मौत के मामले में भी प्रशासन ने इस परिवार की आवाज को खामोश करने और जनता के आक्रोश को रोककर अपने आकाओं को खुश करने की हर संभव कोशिश की। किसी तरह से भी किसी भी जिम्मेदार निचले स्तर के अधिकारी तक को इस भगदड़ का दोषी नहीं माना जो वहां ऑन ड्यूटी थे। किसी को दोषी मानना तो छोड़िए पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने तो भगदड़ होने की बात ही नकार दी और प्रशासन ने भी पूरा के पूरा घड़ा महिलाओं के सर पर ही मड़ दिया कि वे कलश लेने के लिए इकट्ठा हो गई थी जिसके चलते हादसे का शिकार हो गई। इस तरह प्रशासन भी अपने लापरवाही के घड़े को सुरक्षित रखता नजर आया। 

अब यहां प्रशासनिक लापरवाही को इस तरह समझिए कि यदि महिलाओं को साड़ी पहले से दी गई थी तो क्या उनका लिखित में पंजीयन किया गया था उनकी सूची बनाई गई थी जितनी महिलाओं को कलश दिए जाने थे उनको सूची के आधार पर अलग अलग गेट पर क्यों नहीं बुलाया गया स्टेडियम के तमाम गेट बंद कर एक ही गेट पर भीड़ जमा क्यों की गई। और जब महिलाओं की भीड़ बढ़ रही थी तो वहां पहुंचने वाली महिलाओं को बैरिकेट्स लगाकर क्यों नहीं रोका गया? कलश कलश के खेल में अपनी लापरवाही को छुपाने का तमाम प्रयास प्रशासन कर ले। लेकिन साफ दिखाई देता है कि ऐसे बड़े आयोजनों में प्रशासन केवल वीआईपी सर्कल के आसपास ही व्यवस्थाओं को दुरुस्त रखता है और आम जन को राम भरोसे छोड़ देता है। और राम तो आजकल माननीयों के घर पर जाकर उनके भाग खोलते हैं। आमजन की तो शायद उन्हें भी चिंता नहीं।

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पूरी घटना के बाद प्रशासन और आयोजक अपने कार्यक्रम में ही लगे रहे। गरीब की मौत पर उन्हें संवेदना दिखाने का भी वक्त नहीं मिला।एक महिला की मौत हुई तमाम महिलाएं घायल अभी भी इलाज करा रही हैं। जब सोशल मीडिया पर आयोजन पर सवाल खड़ा करते हुए तमाम खबरें चलने लगी तब प्रशासन ने कार्रवाई की लीपापोती शुरू की इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती महिलाओं को देखने प्रशासन की टीम पहुंची। लेकिन इसी बीच प्रशासन ने अपना एक और कारनामा किया कि रत्ती बाई साहू के परिवार और रिश्तेदार जब इस अव्यवस्था पर आवाज उठाने की कोशिश कर रहे थे तो उनकी आवाज को दबाने का हर भरसक प्रयास किया। वे चक्का जाम करने जा रहे थे जहां उन्हें दबाव बनाकर रोका गया और इसके साथ ही ग्यारह बजे हुई रती बाई की मौत के बाद चार घंटे के भीतर ही उसका पोस्टमार्टम करके अंतिम संस्कार भी जल्दबाजी में करा दिया गया और गरीब परिवार की आवाज अंग्रेजी हुकूमत की तर्ज पर दबा दी गई। यह घटना और ऐसी ही पूर्व की घटनाएं साफ बताती हैं कि इस देश में गरीब के लिए न कोई कानून है न न्याय और गरीब की मजबूरी भी है कि चंद रुपये लेकर उसे खामोश होना पड़ता है! चलिए प्रशासन की लापरवाही का घड़ा भरने का इंतजार करते हैं…..

डिजिटल फ्रॉड पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, बैंकों के मिली भगत पर कह दी बड़ी बात

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नई दिल्ली डिजिटल डेस्क: देश में लगातार बढ़ रहे डिजिटल फ्रॉड के मामलों को लेकर एक तरफ जहां जनता परेशान है तो दूसरी ओर सरकार सोई हुई है इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने डिजिट फ्रॉड के मामलों में सख्त टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल फ़्रांस को रोकने के लिए केंद्र सरकार से स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर तैयार करने के लिए कहा है।भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा है कि डिजिटल फ्रॉड में जनता द्वारा गवाई गई रकम कई छोटे राज्यों में बजट से भी ज्यादा है। आपको बता दें कि हर साल भारत में चौवन हजार करोड़ रुपए का डिजिटल फ्रॉड होता है और इस तरह के फ्रॉड को सुप्रीम कोर्ट ने सीधी डकैती करार दिया है।

पीआईबी की ताजा रिपोर्ट्स में जो आंकड़े पेश किए गए हैं उसके अनुसार देश में डिजिटल फ्रॉड के केस दो हजार बाईस में 10.29 लाख से बढ़कर दो हजार चौबीस में 22.68 लाख हो गए हैं यह एक अप्रत्याशित वृद्धि है। इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेन्टर के अनुसार 2024 में 22.849 करोड़ का नुकसान हुआ वहीं 2025 में 19.813 करोड का नुकसान जनता को हुआ। साइबर फ्रॉड से जुड़ी इक्कीस लाख से ज्यादा शिकायतें नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पर दर्ज हुई। एक ही साल में बाईस लाख से ज्यादा शिकायतें चौंकाने वाली हैं और हो सकता है कि कई छोटे मामलों में तो शिकायतें दर्ज तक नहीं हुई हो। सबसे बड़ी हैरान करने वाली बात है कि दो साल में ही साइबर फ्रॉड की दर्ज शिकायतें दोगुनी से ज्यादा बढ़ चुकी हैं।

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चीफ जस्टिस सूर्यकान्त की अध्यक्षता वाली बैंक ने कहा है कि 54 हजार करोड का डिजिटल फ्रॉड कई छोटे राज्यों के बजट से भी ज्यादा हैं। ऐसे अपराधों में बैंक अधिकारियों की मिलीभगत या लापरवाही हो सकती है इसलिए समय पर कार्रवाई बेहद जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए गृह मंत्रालय को निर्देश दिए हैं कि आरबीआई दूरसंचार विभाग और अन्य स्टेकहोल्डर्स की एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर को देखते हुए चार हफ्ते में ड्राफ्ट तैयार किया जाए। कोर्ट ने कहा कि आरबीआई ने एक एसओपी बनाई है। इसके तहत साइबर फ्रॉड रोकने के लिए बैंकों के पास डेबिट कार्ड को अस्थायी रूप से होल्ड करने का प्रावधान है। 

बैंकों के मिलीभगत और लापरवाही को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि हमने देखा है कि डिजिटल गिरफ्तारी मामलों में बैंक अफसर आरोपियों के साथ पूरी तरह हाथ में हाथ डाले हुए हैं। ये बैंक बोझ बनते जा रहे हैं। इन्हें समझना चाहिए कि वे जनता के पैसों के संरक्षक हैं उस भरोसे को नहीं तोड़ना चाहिए। समस्या यह भी है कि बैंक धोखेबाजों को कर्ज देते हैं और फिर एनसीएलटी जैसे मंच सामने आते हैं। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह से डिजिटल फ्रॉड के मामले में बैंकों को कटघरे में खड़ा किया है उससे उम्मीद जताई जा सकती है कि आने वाले समय में बैंक अपनी कार्यशैली में बदलाव लाएंगे और ग्राहकों के हित में डिजिटल फ्रॉड के मामलों को रोकने के लिए मजबूत नीति बनाएंगे। 

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भ्रष्टाचार से परेशान पुलिसकर्मी ने खाया जहर हुई मौत, सुसाइड नोट में खोल दिया अधिकारियों का काला चिट्ठा

नीमच, मध्य प्रदेश:  शहर की पुलिस लाइन में उस वक्त हड़कंप मच गया, जब वहां तैनात एक हेड कॉन्स्टेबल ने विभाग के ही बड़े अधिकारियों पर भ्रष्टाचार और प्रताड़ना के आरोप लगाते हुए मौत को गले लगा लिया। कनावटी पुलिस लाइन में पदस्थ 50 वर्षीय होशियार सिंह ने रविवार दोपहर जहरीला पदार्थ गटक लिया। जहर खाने के बाद वे खुद चलकर कंट्रोल रूम पहुंचे और वहां मौजूद स्टाफ को इसकी जानकारी दी। जब तक उन्हें अस्पताल ले जाया जाता, उनकी हालत बिगड़ गई और इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया। मौत से पहले होशियार सिंह ने 4 पन्नों का एक सुसाइड नोट लिखा है, जो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस नोट ने पुलिस महकमे के भीतर चल रहे पैसों के खेल और भ्रष्टाचार की पोल खोल कर रख दी है।

होशियार सिंह ने अपने सुसाइड नोट में रक्षित निरीक्षक (आरआई) विक्रम सिंह भदौरिया और लाइन में तैनात हेड कॉन्स्टेबल प्रणव तिवारी पर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने लिखा कि नीमच पुलिस लाइन में सब कुछ बिक रहा है। रोजनामा लिखने से लेकर ड्यूटी लगाने तक के लिए कर्मचारियों से पैसे वसूले जा रहे हैं। नोट में दर्द छलकते हुए लिखा गया है कि महोदय, पुलिस को इतना भी मत बेचो कि ईमानदार आदमी नौकरी ही न कर पाए। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रणव तिवारी हर कर्मचारी से पैसे लेकर ड्यूटी लगाता है। जो पैसा देता है, उसे अच्छी जगह तैनाती मिलती है और जो नहीं देता, उसे प्रताड़ित किया जाता है।

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सुसाइड नोट में इस बात का भी जिक्र है कि जब भी भ्रष्टाचार का विरोध किया जाता, तो ऊपर के अधिकारियों के नाम का डर दिखाया जाता था। होशियार सिंह ने लिखा कि प्रणव तिवारी कहता है कि वह और आरआई साहब बड़े अधिकारियों के व्यक्तिगत खर्चों का ध्यान रखते हैं, इसलिए उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। होशियार सिंह ने डीजीपी, डीआईजी और एसपी से गुहार लगाते हुए लिखा कि अगर विभाग में यही सब चलना है, तो उन्हें आत्महत्या की अनुमति दे दी जाए। उन्होंने ट्रेजरी गार्ड की नियुक्तियों में 5 से 10 हजार रुपये की अवैध वसूली की जांच करने की मांग भी की है।

होशियार सिंह पिछले पांच दिनों से छुट्टी पर थे और सोमवार को उन्हें वापस काम पर लौटना था। लेकिन सिस्टम की बेरुखी और अपने ही विभाग के लोगों की प्रताड़ना से वे इतना टूट चुके थे कि उन्होंने ड्यूटी जॉइन करने के बजाय मौत को चुनना बेहतर समझा।

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इस घटना के बाद शहर में चर्चाओं का बाजार गर्म है। यह चर्चाएं भी हैं कि क्या सुसाइड नोट में होशियार सिंह ने जो कुछ लिखा है वही मध्य प्रदेश पुलिस की हर जगह हकीकत है। एक तरफ जहां पुलिस विभाग इस मामले में जांच की बात कह रहा है, वहीं आम जनता के बीच पुलिस की छवि को गहरा धक्का लगा है। होशियार सिंह ने अपने सुसाइड नोट में जो कुछ लिखा है उसने पुलिस विभाग के ऊपर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। 

तेरा भाई मेरी बहन को भगा ले गया अब तू मेरे साथ…. पीड़ित युवती ने बताया हैरान करने वाला मामला

ग्वालियर मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश में महिला किस तरह असुरक्षित है?इसकी घटनाएं रोज आपको हर जिले में किसी न किसी तरह से देखने को मिल ही जाती हैं। कुछ मामले तो इस तरह चौंका देते हैं कि उन पर विश्वास करना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसा ही एक मामला ग्वालियर में सामने आया है।जहां एक युवक ने युवती के घर में घुसकर दुष्कर्म की कोशिश की।युवक इस युवती का मौसेरा भाई है जो अपने दोस्तों के साथ युवती के घर में घुसा और उसके साथ गलत काम करने का प्रयास किया। इस पूरे मामले में हालांकि अंत में युवती बच जाती है और पुलिस को शिकायत करती है लेकिन वह पुलिस को जो जानकारी देती है वह हैरान करने वाली है।

युवती ने पुलिस को बताया कि युवक उसका मौसेरा भाई है और युवक उसे यह धमकी दे रहा था कि तेरा भाई मेरी बहन को भगा ले गया है। इसलिए अब तुझे मुझसे शादी करनी पड़ेगी और जब युवती ने इनकार किया तो युवक और उसके साथ आए लड़के आक्रोशित हो गए और युवती के साथ जबरदस्ती करने लगे और युवती के कपड़े तक फाड़ दिए। शोर शराबा सुनकर युवती के माता पिता बीच बचाव करने पहुँच गए तो युवकों ने उनके साथ भी मारपीट की। घर में तोड़फोड़ की युवती युवकों के चंगुल से निकलकर धक्का देते हुए भागी और पुलिस को फोन कर दिया।पुलिस के आने से पहले ही आरोपी भाग निकले।

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घटना ग्वालियर जिले के पुरानी छावनी थाना क्षेत्र के लालघाटी की है। जहां बीस वर्षीय युवती अपने माता पिता के साथ रहती हैं। वह छह फरवरी को अपने घर में काम कर रही थी उसी समय उसका मौसेरा भाई अमन और उसका एक और रिश्तेदार सुनील घर में आ गए और युवती को धमकाने लगे। युवकों की नियत साफ नहीं थी।वह किसी बड़ी घटना को अंजाम देना चाहते थे। माता पिता के बीच में आने और युवती के सूझबूझ से कोई बड़ी घटना तो नहीं हुई। लेकिन युवती ने जो जानकारी पुलिस को दी है वह यह सवाल खड़ा करती है कि क्या किसी के साथ गलत हो तो उसका बदला उसी तरह गलत करके लिया जाना चाहिए। युवती की शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

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साइबर फ्रॉड का बढ़ता जाल, एमपी में 638 करोड़ का फ्रॉड, पैसा गया तो वापस आना मुश्किल

भोपाल मध्य प्रदेश: जैसे जैसे तकनीक बढ़ रही है वैसे ही ठगी के तरीके भी बदल रहे हैं और साइबर फ्रॉड मैं गवाई गई रकम का आंकड़ा पिछले कुछ सालों में अप्रत्याशित रूप से बड़ा है। मध्य प्रदेश में यह आंकड़ा छह सौ अड़तीस करोड़ रुपये को पार कर चुका है और यह सारी रकम 64 हजार लोगों से ठगी गई है। यहाँ सबसे बड़ी चौंकाने वाली बात यह है कि ठगे गए इन लोगों में से ज्यादातर लोग शिक्षित हैं। लेकिन ठगों के शातिर पैंतरे इतने प्रभावशाली हैं कि वह इन लोगों को भी अपने झांसे में ले लेते हैं। मध्य प्रदेश में भी साइबर ठगी का बड़ा नेटवर्क सक्रिय है। एमपी सहित सत्रह राज्यों में बैठे साइबर ठग के निशाने पर मध्य प्रदेश के लोग हैं।वह किसी न किसी हथकंडे को अपनाकर रोज़ लोगों को अपने जाल में फंसा रहे हैं।

साइबर ठगी के लिए जो हथकंडे अपनाते हैं उनमें डिजिटल अरेस्ट एपीके फ़ाइल सिम स्वेप जैसे हथकंडे आजकल ज़्यादा प्रचलन में हैं। यह साइबर ठग इतने शातिर हैं कि ठगी की रकम लेते ही वे तुरंत इसे मनी लॉन्ड्रिंग की तर्ज पर लेयरिंग करते हुए एक से दूसरे तीसरे चौथे खातों में ट्रांसफर करते चले जाते हैं जिससे कि यदि कोई शिकायत करें भी तो वह ठगी के मुख्य सरगना तक नहीं पहुंच पाए। ज्यादातर मामलों में खोता भी यही है कि पुलिस लापरवाही से ठगी के मामलों में तुरंत शिकायत दर्ज नहीं करती और इस लेटलतीफी का लाभ ठगों को मिलता है। पुलिस ज्यादातर मामलों में मुख्य सरगना तक पहुंच ही नहीं पाती और किराये पे लिए गए मासूम मजबूर को ही आरोपी बनाकर पकड़ लेती है जिनके खातों में पहली लेयर में रकम गई होती है। 

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मध्य प्रदेश की बात करें तो सभी बड़े शहर साइबर ठगों के निशाने पर हैं। राजधानी भोपाल में 64 करोड़ रुपये की ठगी 4490 लोगों से की गई है। जबकि इंदौर में तैंतालीस करोड़ की ठगी 147 लोगों से की गई है। ठगों ने छोटे कस्बों में अपने एजेंट बना रखे हैं। यह एजेंट जरूरतमंद लोगों को लालच देकर बहुत कम रकम में बैंक में उनका खाता खुलवा लेते हैं और खाते के सभी डॉक्यूमेंट अपने पास रख लेते हैं और यही डॉक्यूमेंट वह अपने सरगना को भेज देते हैं। साइबर ठगी की रकम जब इन लोगों के अकाउंट में पहुंचती है तो पुलिस इनके अकाउंट डिटेल्स के आधार पर इनके घर पर पहुंचकर इन गरीब लोगों को पकड़ लेती है। 

प्रदेश में बढ़ रही ठगी के मामलों में ज्यादातर मामलों में रकम वापस मिलना मुश्किल हो जाता है वो इसका प्रमुख कारण पुलिस की शिथिलता है। ठगी के मामलों में रकम छोटी होने पर न तो शिकायत करता बहुत प्रयास करता है न ही छोटी मोटी ठगी की शिकायतों में पुलिस दिलचस्पी लेती है। जब ठगी की रकम बड़ी हो या ठगी किसी प्रभावशील व्यक्ति के साथ हुई हो तब ही त्वरित कार्यवाही देखने को मिलती है। आंकड़ों की मानें तो मध्यप्रदेश के आम लोगों को प्रतिदिन पांच हजार से ऊपर कॉल अलग ठगों के गैंग द्वारा किए जाते हैं।इनमें से लगभग 175 लोग प्रतिदिन ठगों का शिकार बन रहे हैं। यह आंकड़े बताते हैं के हर पच्चीस वां व्यक्ति ठगी का शिकार बन जाता है। मध्यप्रदेश के लोगों द्वारा ठगी जाने वाली रकम भी 1.75करोड़ रुपए प्रतिदिन है। 

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साइबर ठगी में ज्यादातर मामलों में डूबा हुआ पैसा वापस आना मुश्किल होता है। इसलिए साइबर ठगी से बचने का एकमात्र उपाय आपकी स्वयं की सावधानी है।सबसे पहली बात तो है कि आप किसी अनजान व्यक्ति पर भरोसा ही न करें। एपी के फाइल चाहे किसी भी नजदीकी परिचित व्यक्ति द्वारा भेजी गई हो लेकिन उसको कभी नहीं खोले। पब्लिक इंटरनेट सेवा में अपने मोबाइल में बैंकिंग का प्रयोग कभी न करें। किसी भी तरह की लिंक को न दबाएं इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया पर इनवेस्टमेंट की लुभावनी स्कीमों के लालच में न पड़े। ठगी से बचने में सबसे कारगर केवल दो अस्त्र आपके पास हैं।वह अपने डर पर काबू रखना और अपने लालच पर काबू रखना क्योंकि ठगी के ज्यादातर मामलों में आपका डर या आपका लालच ही ठगी की वजह बनता है। 

बिलौआ में अवैध खनन, खनिज विभाग का गजब खेल

ग्वालियर: बिलौआ में जिला प्रशासन एवं खनिज विभाग की टीम ने छापामार कार्रवाई की। इस दौरान उन्हें अलग-अलग स्थानों पर 80 डंपर अवैध बोल्डर मिला, जिसे जब्त किया गया। जांच के दौरान विवाद की स्थिति उत्पन्न होने पर जांच के निर्देश दिए गए। साथ ही जांच होने तक यथास्थिति काम बंद करने के भी निर्देश खदान संचालक को दिए गए हैं.कलेक्टर रूचिका चौहान ने बिलौआ क्षेत्र में हो रहे अवैध उत्खनन की जांच के लिए डिप्टी कलेक्टर अनिल राघव के नेतृत्व में खनिज विभाग की टीम को मौके पर भेजा था। आपको बता दें कि लंबे समय से बिलौआ क्षेत्र में अवैध उत्खनन होता रहा है।इसके लिए जिम्मेदार खनिज विभाग कागजों पर लीपापोती करता है लेकिन मौके की हकीकत से हमेशा आंख मूंद लेता है।

टीम ने बिलौआ में अलग-अलग स्थानों पर पहुंचकर जांच की। जांच के दौरान उन्हें वहां पर 80 डंपर अवैध बोल्डर के मिले। खनिज विभाग की टीम ने बोल्डर को जब्त किया। एक स्थान पर जांच के दौरान विवाद की स्थिति बन गई। विवाद को देखते हुए डिप्टी कलेक्टर अनिल राघव ने तत्काल वहां पर काम को बंद करा दिया और जांच के आदेश दिए। जांच पूरी होने तक खदान संचालक को काम को बंद रखने के निर्देश दिए गए हैं। निरीक्षण के दौरान राजस्व,हल्का पटवारी एवं खनिज अधिकारी व पुलिस बल मौजूद रहा।

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यहां अवैध उत्खनन का मामला अब ग्वालियर सांसद भारत सिंह कुशवाह के संज्ञान में भी आया है. सांसद ने कहा पूरी जानकारी पता लगाएंगे और कोई भी दोषी,अपराधी, माफिया हो उसे बक्शा नहीं जाएगा। ऐसे ही दावे और वादे पहले भी कई बार हो चुके हैं लेकिन इसके बावजूद बिलउआ अवैध खनन के मामले में बदनाम रहा है।सबसे बड़ी बात है कि खनिज विभाग सब कुछ जानते हुए भी हमेशा अपनी मौन सहमति इस अवैध खनन को देता रहा है।

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NEET2026 exam date: 3 मई को परीक्षा, 8 मार्च तक कर सकते हैं आवेदन

नई दिल्ली डिजिटल डेस्क: देश के सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस (NEET UG 2026) का नोटिफिकेशन नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने रविवार को जारी कर दिया है. इसके अनुसार परीक्षा तारीख और रजिस्ट्रेशन शुरू होने की घोषणा की गई है. परीक्षा 3 मई 2026 रविवार को आयोजित की जाएगी. परीक्षा बीते साल की तरह 180 मिनट यानी 3 घंटे की होगी.
नोटिफिकेशन के अनुसार दोपहर 2 बजे से 5 के बीच आयोजित होगी. इसके लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन रविवार 8 फरवरी से ही शुरू कर दिए गए हैं. यह रजिस्ट्रेशन 8 मार्च 2026 रात 9 बजे तक होंगे. वहीं, ऑनलाइन आवेदन भी की फीस भी देर रात 11:50 तक जमा कराई जा सकेगी. ऑनलाइन आवेदन में हुई गलतियों का सुधार के लिए 10 से 12 मार्च 2026 के बीच का समय दिया गया है. कैंडिडेट परीक्षा के लिए ऑनलाइन आवेदन नीट यूजी 2026 की वेबसाइट पर कर सकते हैं.

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परीक्षा शुल्क जनरल कैटेगरी के विद्यार्थियों के लिए 1700 रुपए रखा गया है, जबकि ईडब्ल्यूएस व ओबीसी कैटेगरी के लिए 1600 रुपए रखा गया है. वहीं, एससी-एसटी विद्यार्थियों के लिए यह फीस 1000 रुपए है. ऑनलाइन आवेदन के दौरान जीएसटी अतिरिक्त विद्यार्थियों को देना होगा. भारत के बाहर परीक्षा केंद्र लेने वाले विद्यार्थियों के लिए फीस 9500 रुपए रखी गई है. विद्यार्थी अपनी रजिस्ट्रेशन फीस को ऑनलाइन इंटरनेट बैंकिंग, डेबिट-क्रेडिट कार्ड और यूपीआई के जरिए जमा कर सकेंगे.
एजुकेशन एक्सपर्ट देव शर्मा ने बताया कि परीक्षा दोपहर 2 से 5 बजे तक आयोजित होगी. वहीं, परीक्षा केंद्र की घोषणा एडमिट कार्ड के साथ की जाएगी. एडवांस सिटी इनफॉरमेशन स्लिप के जरिए परीक्षा शहरों की घोषणा आयोजित की जाएगी. इस बार भी 13 लैंग्वेज हिंदी, अंग्रेजी, असमिया, बंगाली, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, मराठी, उड़िया, पंजाबी, तमिल, तेलुगू व उर्दू में परीक्षा आयोजित होगी.

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इस परीक्षा के जरिए मेडिकल (MBBS), नर्सिंग, डेंटल, वेटरिनरी एंड एनिमल हसबेंडरी कॉलेज में प्रवेश मिलेगा. इसके साथ आयुर्वेद, होम्योपैथी, यूनानी और सिद्धा एडमिशन मिलेगा. एजुकेशन एक्सपर्ट देव शर्मा ने बताया कि बीते सालों में 22 से 24 लाख तक भी विद्यार्थी इस परीक्षा में आवेदन कर चुके हैं और परीक्षा देने वाले 21 से 23 लाख लाख तक परीक्षा भी दे चुके हैं. सबसे ज्यादा आवेदन का आंकड़ा साल 2024 में 24 लाख से ऊपर था और 23.33 लाख तक परीक्षा भी दे चुके हैं.