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प्रशासनिक लापरवाही का घड़ा (कलश) भरा तो भगदड़ में मौत की सच्चाई की आवाज दबाने का हुआ तमाशा

घटना के बाद प्रशासन और आयोजक अपने कार्यक्रम में ही लगे रहे। गरीब की मौत पर उन्हें संवेदना दिखाने का भी वक्त नहीं मिला।एक महिला की मौत हुई तमाम महिलाएं घायल अभी भी इलाज करा रही हैं। जब सोशल मीडिया पर आयोजन पर सवाल खड़ा करते हुए तमाम खबरें चलने लगी तब प्रशासन ने कार्रवाई की लीपापोती शुरू की

डबरा भगदड़ हादसा: ग्वालियर के डबरा क्षेत्र में नवग्रह मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के दौरान आयोजित कलश यात्रा में हुई भगदड़ में एक महिला की मौत हो जाती है और 10 महिलाएं घायल होती हैं। यह आम लोग धार्मिक आयोजन में जाते ही मरने के लिए हैं। माफ कीजिए लेकिन यह इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि धार्मिक आयोजनों में भगदड़ और मौत का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी तमाम ऐसे मामले हो चुके हैं। बात चाहे मध्यप्रदेश की हो चाहे देश के अन्य राज्यों की धार्मिक आयोजनों में भीड़ जुटाने के लिए प्रशासन अपने आकाओं को खुश करने के लिए नियम विरुद्ध सारे हथकंडे अपनाता है और गरीब मासूमों को मौत के मुंह में ढकेल देता है। लेकिन माफ कीजिए प्रशासनिक लापरवाही का घड़ा अभी भी नहीं भरा है और मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि आने वाले समय में होने वाले धार्मिक आयोजनों में भी ऐसी घटनाएं होती रहेंगी!

डबरा नवग्रह मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का आयोजन पूर्व मंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा द्वारा किया जा रहा है। वे ही प्रमुख आयोजक हैं और भाजपा सरकार में पूर्व मंत्री हैं तो पूरी भाजपा सरकार भी इस कार्यक्रम की तैयारियों में जुटी हुई है और प्रशासन को भीड़ जुटाने से लेकर सभी तामझाम के लिए लगाया हुआ है। बड़े बड़े कथित कथावाचक और संत यहां आने वाले हैं और उनकी आवभगत जनता की सुरक्षा से ज्यादा आवश्यक है। माफ कीजिए प्रशासन की जवाबदेही आम जनता के प्रति नहीं है बल्कि नौकरी को संरक्षित रखते हैं। यही कारण है कि तमाम धार्मिक आयोजनों में हुई भगदड़ की घटनाओं को जांच के नाम पर दबा दिया जाता है। आमजन की आवाज को कुचल दिया जाता है।हाल ही में सीहोर में भी प्रदीप शास्त्री के कार्यक्रम के दौरान भगदड़ हुई थी।मौत हुई थी लेकिन उसके बाद भी किसी भी प्रशासनिक अधिकारी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई थी।

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 ऐसे आयोजनों में लगे प्रशासनिक अधिकारियों को ठीक से होमवर्क करना चाहिए। उन्हें क्राउड मैनेजमेंट का पाठ पढ़ना चाहिए। कितना क्षेत्र है? उसमें कितने लोग आ सकते हैं? कितने समय में कितने लोगों को प्रवेश देना चाहिए। यदि आयोजन स्थल पर पर्याप्त स्थान नहीं है तो भीड़ को कैसे दूसरे क्षेत्रों में रोका जाना चाहिए और कहीं कोई अव्यवस्था होती है तो भीड़ के निकासी के क्या विकल्प होने चाहिए? ऐसे ही तमाम बिंदुओं पर क्या आयोजन से पूर्व मंथन होता है?यदि मंथन होता है तो क्या इनका क्रियान्वयन होता है?यदि क्रियान्वयन होता है तो फिर यह अति शिक्षित अधिकारी इस क्रियान्वयन में फैल क्यों हो जाते हैं और यदि मंथन नहीं होता है तो फिर ऐसे अयोग्य अधिकारियों को पद पर भेजा ही क्यों जाता है? 

एक और बात मै दावे के साथ कह सकता हूं कि किसी लापरवाही से हुई मौत के मामले में जांच और कार्रवाई इस बात पर निर्भर करती है कि मरा कौन है यदि कोई आम ऐसा व्यक्ति मरता है जिसकी कोई औकात नहीं है तो फिर जांच में सभी दोषी पाक साफ पाए जाते हैं। और यकीन मानिए कि यदि ऐसे किसी धार्मिक आयोजन के भगदड़ में किसी माननीय के घर से या किसी रसूखदार ब्यूरोक्रेट्स के घर से या किसी न्यायाधीश के घर से कोई अनहोनी हो तो जांच एक अलग ही दिशा में चलेगी और कार्यवाही भी एक अलग स्वरूप में आपको नजर आएगी। लेकिन गरीब इस देश में इसलिए गरीब रखा जाता है कि वह भीड़ का हिस्सा बने और यदि मौत हो भी जाए तो लाख दो लाख रुपये उसके मुंह में ठूंस कर उसकी आवाज दबा दी जाए।

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डबरा में हुए रतिबाई साहू की मौत के मामले में भी प्रशासन ने इस परिवार की आवाज को खामोश करने और जनता के आक्रोश को रोककर अपने आकाओं को खुश करने की हर संभव कोशिश की। किसी तरह से भी किसी भी जिम्मेदार निचले स्तर के अधिकारी तक को इस भगदड़ का दोषी नहीं माना जो वहां ऑन ड्यूटी थे। किसी को दोषी मानना तो छोड़िए पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने तो भगदड़ होने की बात ही नकार दी और प्रशासन ने भी पूरा के पूरा घड़ा महिलाओं के सर पर ही मड़ दिया कि वे कलश लेने के लिए इकट्ठा हो गई थी जिसके चलते हादसे का शिकार हो गई। इस तरह प्रशासन भी अपने लापरवाही के घड़े को सुरक्षित रखता नजर आया। 

अब यहां प्रशासनिक लापरवाही को इस तरह समझिए कि यदि महिलाओं को साड़ी पहले से दी गई थी तो क्या उनका लिखित में पंजीयन किया गया था उनकी सूची बनाई गई थी जितनी महिलाओं को कलश दिए जाने थे उनको सूची के आधार पर अलग अलग गेट पर क्यों नहीं बुलाया गया स्टेडियम के तमाम गेट बंद कर एक ही गेट पर भीड़ जमा क्यों की गई। और जब महिलाओं की भीड़ बढ़ रही थी तो वहां पहुंचने वाली महिलाओं को बैरिकेट्स लगाकर क्यों नहीं रोका गया? कलश कलश के खेल में अपनी लापरवाही को छुपाने का तमाम प्रयास प्रशासन कर ले। लेकिन साफ दिखाई देता है कि ऐसे बड़े आयोजनों में प्रशासन केवल वीआईपी सर्कल के आसपास ही व्यवस्थाओं को दुरुस्त रखता है और आम जन को राम भरोसे छोड़ देता है। और राम तो आजकल माननीयों के घर पर जाकर उनके भाग खोलते हैं। आमजन की तो शायद उन्हें भी चिंता नहीं।

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पूरी घटना के बाद प्रशासन और आयोजक अपने कार्यक्रम में ही लगे रहे। गरीब की मौत पर उन्हें संवेदना दिखाने का भी वक्त नहीं मिला।एक महिला की मौत हुई तमाम महिलाएं घायल अभी भी इलाज करा रही हैं। जब सोशल मीडिया पर आयोजन पर सवाल खड़ा करते हुए तमाम खबरें चलने लगी तब प्रशासन ने कार्रवाई की लीपापोती शुरू की इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती महिलाओं को देखने प्रशासन की टीम पहुंची। लेकिन इसी बीच प्रशासन ने अपना एक और कारनामा किया कि रत्ती बाई साहू के परिवार और रिश्तेदार जब इस अव्यवस्था पर आवाज उठाने की कोशिश कर रहे थे तो उनकी आवाज को दबाने का हर भरसक प्रयास किया। वे चक्का जाम करने जा रहे थे जहां उन्हें दबाव बनाकर रोका गया और इसके साथ ही ग्यारह बजे हुई रती बाई की मौत के बाद चार घंटे के भीतर ही उसका पोस्टमार्टम करके अंतिम संस्कार भी जल्दबाजी में करा दिया गया और गरीब परिवार की आवाज अंग्रेजी हुकूमत की तर्ज पर दबा दी गई। यह घटना और ऐसी ही पूर्व की घटनाएं साफ बताती हैं कि इस देश में गरीब के लिए न कोई कानून है न न्याय और गरीब की मजबूरी भी है कि चंद रुपये लेकर उसे खामोश होना पड़ता है! चलिए प्रशासन की लापरवाही का घड़ा भरने का इंतजार करते हैं…..

Gajendra Ingle
Gajendra Inglehttp://theinglespost.com
The author is founder Editor of this news portal. He has long experience of journalism. He has deep expertise on political and social issues.
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