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सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले हो जाएं सावधान, सुप्रीम कोर्ट ने दे दिया बड़ा आदेश

डॉ॰ सुब्रमण्यम स्वामी वर्सेज डॉक्टर मनमोहन सिंह वाले फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि सीआरपीसी का एक सर्वमान्य सिद्धांत है कि कोई भी व्यक्ति आपराधिक कानून के आधार पर कानूनी कार्रवाई शुरू करवा सकता है बशर्ते

डिजिटल डेस्क नई दिल्ली: आए दिन सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया जाता है और नष्ट किया जाता है लेकिन शिकायत दर्ज कराने वाले व्यक्ति के कानून जिम्मेदार नहीं होने के चलते ज्यादातर मामलों में इस तरह के लोग बचकर निकल जाते हैं और यही कारण है कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं आए दिन होती रहती हैं। यहाँ न तो लोगों में सार्वजनिक संपत्ति को स्वयं की संपत्ति की तरह सुरक्षित रखने ही नैतिक दायित्व का बोध है और न ही कोई सख्त कानून जिसकी वजह से देश की संपत्ति की सुरक्षा की जा सके लेकिन अब सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान पर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश दिया है।

जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने 18 नवंबर को उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ के एक मामले में महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। इस मामले में लालचंद्र राम द्वारा अपील की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने न केवल अपील को स्वीकारा बल्कि एक महत्वपूर्ण आदेश भी दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अभियुक्तों के खिलाफ आजमगढ़ की विशेष अदालत से जारी समन का इलाहाबाद हाईकोर्ट का चौबीस सितंबर दो हजार चौबीस का आदेश खारिज कर दिया। इस मामले में आदेश जारी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने डॉ सुब्रमण्यम स्वामी वर्सेज डॉ॰ मनमोहन सिंह के मामले में दिए गए फैसले का जिक्र किया जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि सीआरपीसी में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो किसी नागरिक को अपराध करने वाले लोकसेवक या किसी अन्य व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए शिकायत करने से रोकता हो।

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डॉ॰ सुब्रमण्यम स्वामी वर्सेज डॉक्टर मनमोहन सिंह वाले फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि सीआरपीसी का एक सर्वमान्य सिद्धांत है कि कोई भी व्यक्ति आपराधिक कानून के आधार पर कानूनी कार्रवाई शुरू करवा सकता है बशर्ते अपराध को लागू करने या बनाने वाला कानून स्पष्ट रूप से इसके विरुद्ध न हो। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम उन्नीस सौ चौरासी में ऐसा कोई विशेष प्रावधान नहीं है जो शिकायतकर्ता की पात्रता को सीमित करता हो। सुप्रीम कोर्ट ने आजमगढ़ के थाना सिघारी के इस मामले में पीडीपीए एक्ट के अलावा अन्य कानूनों के तहत लिए गए संज्ञान एवं जारी संबंध पर कहा कि आरोपपत्र में दिए गए कानूनों में इस सिद्धांत के खिलाफ कोई संकेत नहीं है। “हाईकोर्ट का यह मानना गलत है कि ग्राम प्रधान एफआईआर दर्ज कराने के लिए सक्षम अथॉरिटी नहीं था इसलिए विशेष जज का उसके आधार पर अभियुक्तों को समन जारी करना कानून गलत है। “

पूरा मामला ग्राम प्रधान द्वारा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने पर की गई एफआईआर से संबंधित है। ग्राम प्रधान की शिकायत पर अभियुक्त नौशाद व अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी। इसके बाद पुलिस ने अभियुक्तों के खिलाफ आईपीसी एससी एसटी पीडीपीए एक्ट के तहत अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया था।आजमगढ़ के न्यायाधीश ने आरोप पत्र पर संज्ञान लेते हुए अभियुक्तों को समन जारी किया जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।हाईकोर्ट ने यह कहते हुए सम्मान रद्द कर दिया कि ग्राम प्रधान को एफआईआर दर्ज कराने का अधिकार नहीं था। इसी मामले में अब सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश कर स्पष्ट कर दिया है कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने पर कोई भी व्यक्ति शिकायत दर्ज करा सकता है।

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Gajendra Ingle
Gajendra Inglehttp://theinglespost.com
The author is founder Editor of this news portal. He has long experience of journalism. He has deep expertise on political and social issues.
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