डिजिटल डेस्क नई दिल्ली: एंटीबायोटिक के अनाधुन तरीके से बढ़ते हुए उपयोग पर अब आईसीएमआर सख्त निर्णय लेने वाला है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) ने देश में एंटीबायोटिक दवाओं के अंधाधुंध इस्तेमाल पर गहरी चिंता जताई है। इस पर लगाम लगाने के लिए संस्थान सख्त दिशानिर्देश लाने जा रहा है। आइसीएमआर के महानिदेशक डा. राजीव बहल ने कोलकाता में एक कार्यक्रम में कहा कि एम्पिरिकल प्रोटोकाल (प्रयोगसिद्ध नियमावली) लागू किया जाएगा, जिसके अंतर्गत संक्रमण के प्रकार के अनुसार एंटीबायोटिक के इस्तेमाल के स्पष्ट निर्देश होंगे।
कोलकाता के बेलेघाटा स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट फार रिसर्च इन बैक्टीरियल इंफेक्शंस (एनआइआरबीआइ) में ओरल रिहाइड्रेशन थेरेपी (ओआरटी) के जनक और पद्म विभूषण से सम्मानित डा दिलीप महालनाबिस की प्रतिमा के अनावरण के मौके पर आइसीएमआर के महानिदेशक ने कहा कि इस दिशानिर्देश के अंतर्गत डाक्टरों को वैज्ञानिक मार्गदर्शन किया जाएगा। उन्हें बताया जाएगा कि किन परिस्थितियों में और कितने समय तक एंटीबायोटिक दवा दी जानी चाहिए।
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कब और किन परिस्थितियों में एंटीबायोटिक बदली जानी चाहिए। डा. बहल ने कहा कि जरूरत पडऩे पर डाक्टरों को विशेष प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। किसी भी बीमारी के परीक्षण से पहले डाक्टरों को स्वयं आकलन करना होगा कि मरीज को वास्तव में एंटीबायोटिक की आवश्यकता है या नहीं। उन्होंने कहा कि किसी भी बीमारी की टेस्ट रिपोर्ट आने से पहले मरीजों को एंटीबायोटिक देने से बचना चाहिए। आपको बता दें कि ज्यादातर मामलों में मरीज मेडिकल स्टोर से ही सीधे एंटीबायोटिक खरीद लेता है।कौन सी एंटीबायोटिक कितनी मात्रा में दी जानी चाहिए?यह जानकारी मेडिकल स्टोर वाले को नहीं होती और इस तरह से एंटीबायोटिक का गलत डोस मरीज में पहुंचता है और रजिस्टेंस पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है।
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आपको बता दें कि लंबे समय से यह देखा गया है कि कई मरीजों पर एंटीबायोटिक का असर नहीं हो रहा, जिसका मुख्य कारण इनका बेवजह सेवन है। दवा दुकानों पर बिना डाक्टर की पर्ची के एंटीबायोटिक दवा दिए जाने की प्रवृत्ति भी चिंताजनक है। आइसीएमआर के महानिदेशक ने हाल में निपाह संक्रमण की रोकथाम में बंगाल सरकार की भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार केंद्र के साथ समन्वय कर प्रभावी ढंग से काम कर रही है।
