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भोजशाला है मंदिर, सर्वे में प्रमाणित। सामने आए चौंकाने वाले प्रमाण

मध्यप्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। एएसआई द्वारा संरक्षित 11वीं सदी में बनी भोजशाला पर हिंदू और मुस्लिम अलग-अलग धावे को फ़ोन करो करते आए हैं। हिंदू इसे वाग्देवी (सरस्वती देवी) का मंदिर मानते हैं, वहीं मुस्लिम इसे कमाल मौलाना मस्जिद बताते हैं। भोजशाला को लेकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में कई याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है। हिंदू फॉर जस्टिस नामक संगठन ने करीब एक वर्ष पहले हाईकोर्ट में नई याचिका दायर कर भोजशाला परिसर में प्रत्येक शुक्रवार को होने वाली नमाज रोकने की मांग की थी। याचिका में कहा गया कि हिंदू धर्मावलंबी मंगलवार को भोजशाला में पूजा करते हैं, जबकि मुस्लिम समाज के लोग शुक्रवार को परिसर में नमाज कर उसे अपवित्र कर देते हैं। इस याचिका पर हाई कोर्ट ने इसी वर्ष 11 मार्च को एएसआई को आदेश दिया था कि वह वाराणसी स्थित ज्ञानवापी की तरह भोजशाला का भी वैज्ञानिक सर्वे कर रिपोर्ट प्रस्तुत करे।

भोजशाला में 22 मार्च से 27 जून तक 98 दिन चले वैज्ञानिक सर्वे और इसमें मिले पुरातत्व महत्व के अवशेषों के आधार पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने सोमवार को हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में करीब दो हजार पन्नों की रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी। रिपोर्ट की छह प्रतियां सौंपी गई हैं। इनमें दो प्रति कोर्ट के लिए, एक याचिकाकर्ता के लिए और तीन अन्य पक्षकारों के लिए है। रिपोर्ट में 10 खंड हैं। जिन पक्षकारों को सर्वे रिपोर्ट सौंपी गई है, एएसआई को भोजशाला में मंदिर के पुख्ता प्रमाण मिले हैं, हर संरचना को किस तरह बदला गया है इसके ऐसे प्रमाण मिले हैं जो आपको चौंका देंगे। रिपोर्ट में यह भी निष्कर्ष निकाला गया है कि वर्तमान संरचना (कमाल मौला दरगाह) का निर्माण करने में यहां पहले से मौजूद मंदिर के ही हिस्सों का उपयोग किया गया था। एएसआई के वकील हिमांशु जोशी ने बताया कि सर्वे के दौरान पुरावशेषों की कार्बन डेटिंग भी कराई गई। की हकीकत को साक्ष्य सहित सामने लाने के लिए 1700 से ज्यादा प्रमाण और खोदाई में मिले अवशेषों का विश्लेषण किया गया है। निष्कर्ष 151 पन्नों में संकलित है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सर्वे में मिले स्तंभों और उसकी कला व वास्तुकला से यह कहा जा सकता है ये स्तंभ पहले मंदिर का हिस्सा थे, बाद में मस्जिद के स्तंभ बनाते समय उनका पुन: उपयोग किया गया। मौजूदा संरचना में चारों दिशाओं में खड़े 106 और आड़े 82 (कुल 188) स्तंभ मिले हैं। इनकी वास्तुकला से पुष्टि होती है कि ये स्तंभ मंदिरों का ही हिस्सा थे।

उन्हें वर्तमान संरचना (कमाल मौला दरगाह) बनाने के लिए उन पर उकेरी गई देवताओं और मनुष्यों की आकृतियों को विकृत कर दिया गया। मानव और जानवरों की कई आकृतियां, जिन्हें मस्जिदों में रखने की अनुमति नहीं है, उन्हें छेनी जैसी वस्तु का इस्तेमाल कर विकृत किया गया। मौजूदा संरचना में संस्कृत और प्राकृत भाषा में लिखे कई शिलालेख मिले हैं। ये भोजशाला के ऐतिहासिक, साहित्यिक और शैक्षिक महत्व को उजागर करते हैं। सर्वे में एक ऐसा शिलालेख भी मिला, जिस पर राजा नरवर्मन परमार (1097-1134) का उल्लेख है।

मालवा के परमार वंशीय शासकों में से एक नरवर्मन ने यहां शासन किया था। भोजशाला के पश्चिम क्षेत्र में कई स्तंभों पर उकेरे गए ‘कीर्तिमुख’, मानव, पशु और मिश्रित चेहरों वाली सजावटी सामग्री को मस्जिद-दरगाह बनाते समय नष्ट नहीं किया गया था। – दीवारों में खिड़की के फ्रेम पर उकेरी गई देवताओं की छोटी-छोटी आकृतियां मिली हैं, जिनकी हालत अन्य आर्टिकल के मुकाबले बहुत अच्छी है। – दो स्तंभ ऐसे मिले हैं, जिन पर ‘ऊं सरस्वतै नम:’ लिखा है।

भोजशाला को राजा भोज द्वारा बनाने के प्रमाण भी सामने आए हैं।- 94 ऐसी मूर्तियां मिली हैं, जिन पर महीन नक्काशी की गई है। कई अन्य आर्टिकल मिले हैं, जो मंदिर होने की ओर संकेत कर रहे हैं। – उकेरी छवियों में गणेश, अपनी पत्नियों के साथ ब्रह्मा, नृसिंह, भैरव, देवी-देवता, मानव और पशु आकृतियां शामिल थीं। जानवरों की छवियों में शेर, हाथी, घोड़ा, श्वान, बंदर, सांप, कछुआ, हंस और पक्षी शामिल हैं। – 30 सिक्के मिले हैं। ये चांदी, तांबा और अन्य धातुओं के हैं और परमारकालीन हैं।- खोदाई में बहुमंजिला संरचना के पुख्ता प्रमाण सामने आए हैं।

विश्व में गिरती भारतीय मीडिया की साख, दोगले न्यूज ट्रेडर्स कब तक भेदभाव की कलम घसीटते रहेंगे? 

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नवीनतम वार्षिक विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2024 में भारत 180 देशों में 159वें स्थान पर है। इससे पहले 2023 की सूची में भारत 161वें स्थान पर था। भारत ने दो अंकों की छलांग लगाते हुए अपनी रैंकिंग में सुधार किया है। क्या इस उपलब्धि पर हमें एक-दूसरे की पीठ थपथपानी चाहिए? हर बात पर इवेंट मनाने वाले सिस्टम को इस उपलब्धि पर भी क्या एक ग्रैंड इवेंट पूरे देश के हर कोने में आयोजित करना चाहिए? जिस पाकिस्तान को घूंट फूट पानी पीकर हम सालों से गरियाते आ रहे हैं वह भी भारत से सात पायदान ऊपर 152वें स्थान पर है। 2023 में यह 150वें स्थान पर था। नॉर्वे रैंकिंग में शीर्ष पर है, जबकि डेनमार्क विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में दूसरे स्थान पर है। सूची में स्वीडन तीसरे स्थान पर है। और इन तीनों में से कोई भी देश विश्व गुरु बनने की चाह नहीं रखता है वह चाह रखता है है भारत जिसके रैंकिंग बता रही है की विश्व गुरु बनने का सपना मुंगेरी लाल के हसीन सपने के समान ही है।

एक अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी संगठन, रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स कि यह रिपोर्ट चिंताजनक है। क्यों की हमारे देश में प्रतिदिन तमाम नए चैनल्स अखबारों करो की शुरुआत हो रही है। छोटे छोटे छोटे खबर नवीस से लेकर बड़े बड़े खबर व्यापारी इस क्षेत्र में अपना भाग्य आजमा रहे हैं। आज भी यहाँ जो खबर नबीस हैं शुद्ध पत्रकार हैं उनका उद्देश्य तो जनहित और देश हित में पत्रकारिता करना ही होता है और आर्थिक संकट के बीच भी वह अपने कलम को लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाने के लिए करो। ही प्रयोग करते हैं। लेकिन इस क्षेत्र में अपने निस्वार्थ को लेकर आए तमाम छोटे बड़े न्यूज ट्रेडर्स ने स्थिति को गंभीर कर दिया है। इन्हें जो न्यूज़ ट्रेडर्स शब्द दिया है वह अपने आप में ही पर्याप्त है इनकी कार्यशैली को परिभाषित करने के लिए। 

किसी भी शहर के जब किसी छोटे निजी अस्पताल में किसी मरीज की मौत हो जाती है तो उसको डॉक्टर की लापरवाही या गलत इंजेक्शन से मौत बता। उस अस्पताल का नाम बड़े बड़े अक्षरों में दिखा करो तमाम अखबार और न्यूज चैनल बिना सत्यता जाने उस अस्पताल का चीर हरण कर देते हैं। और जब बात किसी प्रतिष्ठित दबंग राजनीतिक रसूख रखने वाले व्यक्ति से संबंधित हो है तो फिर सब हकीकत सामने होने के बावजूद भी ऐसे अस्पताल के नाम को छुपाकर इन्हें बचाने का पूरा षडयंत्र ऐसे न्यूज ट्रेडर्स द्वारा किया जाता है। पिछले कुछ सालों की घटनाओं को याद करें तो हो सकता है आपको भी ऐसे ही किसी घटना की याद आ जाए। जब किसी रसूखदार व्यक्ति के बड़े अस्पताल को न्यूज ट्रेडर्स द्वारा बचाया गया हो हो सकता है कोरोना काल में ऐसी घटना हुई हो! हो सकता है कि मिलावटी प्लाज्मा से किसी की मौत हो गई हो और है अस्पताल का नाम छापने से न्यूज ट्रेडर्स परहेज कर गए हों। 

तमाम शहरों में तमाम छोटे स्कूलों में कभी न कभी कुछ न कुछ घटनाएं हो जाती हैं और उन घटनाओं की भनक तक यदि इन कथित दिग्गज मीडिया हाउस जिन्हें न्यूज ट्रेडर्स संचालित करते हैं को लगे है तो उस स्कूल संचालक करो को सबसे बड़ा अपराधी घोषित कर दिया जाता है। करो उस स्कूल को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती। तरह तरह के कुतर्क देकर स्कूल मालिक को ही मुख्य षड्यंत्रकारी कोशित कर दिया जाता है। लेकिन यदि कोई गंभीर से गंभीर अपराध भी इसी रख सूखदार बड़े मंत्री के स्कूल में हो जाए है तो यह न्यूज ट्रेडर्स इस स्कूल का नाम छापने से ऐसे परहेज करते हैं मानो किसी सर्जन ने कह रखा हो की यदि इस स्कूल का नाम लिया तो तुम्हें बदहजमी हो जाएगी है और तुम्हारा ठीक से ऑपरेशन करना पड़ेगा। 

बड़े बड़े बड़े व्यापारियों और भू माफियाओं को ऐसे न्यूज ट्रेडर्स संरक्षण देते हैं क्योंकि पीछे ही पीछे दोनों का आर्थिक लाभ एक-दूसरे पर निर्भर होता है लेकिन शहर का छोटा व्यापारी है यदि दुकान के ऊपर बोर्ड भी निगम के नियम के। विरुद्ध लगा ले है तो उसका बड़ा सा फोटो। उसका पूरा नाम उसका पूरा पता और उसका पूरा गंभीर अपराध बड़ा महिमा मंडित करके परोसा जाता है। जब देश में यह सब घट रहा हो है तो फिर है भारत के मीडिया को उच्च स्तर की रैंकिंग अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कैसे मिलेगी? मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है और यदि ये चौथा स्तंभ न्यूज ट्रेडर्स के चंगुल नहीं रहा है तो यह स्तंभ खोखला होना स्वाभाविक है और यदि यह स्तंभ खोखला रहता है तो लोकतंत्र का मंदिर निस्संदेह ज्यादा लंबे समय टिक नहीं पाएगा! 

अब सवाल यह उठता है कि भारतीय मीडिया में ख़बर नवीसों के ऊपर खबर व्यापारियों का वर्चस्व क्यों है? इसका मूल कारण यदि आप खोजें तो शायद आपको वह कारण नहीं मिलेगा क्योंकि एक कहावत है कस्तूरी कुंडली बसे मृग ढूंढे वन माही। इसी तरह से भारत की मीडिया की गिरती साख और इस क्षेत्र में न्यूज ट्रेडर्स के बढते कुप्रभाव का कारण आप, आप मतलब देश की जनता है। जी हाँ देश की वही जनता जिसको सब कुछ फ्री में चाहिए। देश के जिम्मेदार सत्ताधारियों ने फ्री की रेवडी खिला खिला इस देश की जनता को फ्री में खाने की बीमारी लगा दी है और अच्छी खासी है आए वाला व्यक्ति भी अखबार के नाम पर करो। पांच रुपए खर्च करने को भी फिजूलखर्ची मानता है और न्यूज चैनल और सोशल मीडिया पर खबरें भी उसे फ्री में चाहिए। जब ₹50 में छपने वाला अखबार एक आम आदमी को ₹5 में मिलेगा और ₹50 लाख महीना खर्च कर सैटेलाइट चैनल से प्रसारित खबरें फ्री में मिलेंगी है तो है यह बाकी का लाखों रुपये का अंतर और खबर नवीसों की तनखा ये न्यूज़ ट्रेडर्स कहां से निकालेंगे? आम नागरिक हमेशा वीडियो मीडिया को बिकाऊ कह यह आरोप लगाते देखा जाता है की करो सब कुछ बिका हुआ है और यह नसीहत भी देता है है मीडिया को स्वतंत्र होना चाहिए। काले लुटेरों के स्वागत में दो घंटे धूप में खड़े रहकर पचास रुपये की कीला पहनाने वाले और फिर उसकी सेल्फी सोशल मीडिया पर बहु प्रसारित करने वाले किसी आम आदमी ने क्या कभी स्वतंत्र मीडिया के निर्माण के लिए कुछ अंशदान किया है? जब लोकतन्त्र में सरकार है का निर्माण भी जनता करती है तो स्वतंत्र मीडिया का निर्माण भी जनता को ही करना होगा।  जनता की भागीदारी के बिना न तो स्वतंत्र मीडिया का निर्माण संभव है न ही मजबूत लोकतंत्र का।

टिप टिप बरसा रील गर्ल ने कर दी रील मेकर्स की आफत, कलेक्टर का फरमान आपको कर देगा हैरान

एक ऐसी रील वायरल होते होते कलेक्टर कार्यालय तक जा पहुंची। जिस की शूटिंग भी कलेक्टर कार्यालय के बाहर ही हुई थी और इस कलेक्टर कार्यालय के बाहर शूट की गई रील को कुछ युवकों ने इतनी गंभीरता से किया कि वे इसकी शिकायत करने पहुंच गए और शिकायत को भी गंभीरता से लेते हुए। प्रशासन ने भी एक ऐसा आदेश जारी कर दिया जिसको लेकर अब सभी हैरान हैं। है और इस आदेश में साफ साफ कहा गया है की सार्वजनिक जगहों पर रील बनाने के लिए आपको प्रशासन से अनुमति लेनी होगी। करो और अनुमति लेने के बाद ही आप रील बना सकते हैं। यदि आप बिना अनुमति के रील बनाते पकड़े जाते हैं तो आपको जेल भी जाना पड़ सकता है।

दरअसल एक युवती ने टिप टिप बरसा पानी पर कलेक्टर कार्यालय के प्रवेश द्वार के बाहर एक रिल की शूटिंग की थी और उसे अपने सोशल मीडिया पर अपलोड किया था। इस रेल में बैकग्राउंड में कलेक्टर कार्यालय साफ दिखाई दे रहा है। बस इसी स्थान पर रील की शूटिंग पर आपत्ति जताते हुए प्रशासन से इस रील की शिकायत की गई थी। उस समय शायद शिकायत करने वाले को भी न पता हो के प्रशासन एक रील के मामले को इतनी गंभीरता से लेगा लेकिन प्रशासन ने इस मामले को गंभीरता से लिया और कलेक्टर। रुचिका चौहान ने एक आदेश जारी कर दिया और उस आदेश की इबारत कुछ इस प्रकार है

ऐतिहासिक एवं सार्वजनिक भवनों पर वीडियोग्राफी, फोटोग्राफी व रील शूटिंग पर लगा प्रतिबंध

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता – 2023 की धारा-163 के तहत ग्वालियर जिले में पहला प्रतिबंधात्मक आदेश जारी हुआ है। कलेक्टर एवं जिला दण्डाधिकारी श्रीमती रुचिका चौहान ने धारा-163 के तहत प्रतिबंधात्मक आदेश जारी कर ऐतिहासिक इमारतों, रेलवे स्टेशन, बस स्टेण्ड, न्यायालयों, शासकीय कार्यालयों एवं अन्य सार्वजनिक स्थलों व पार्कों में बगैर अनुमति के वीडियोग्राफी, रील शूटिंग एवं फोटोग्राफी इत्यादि पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। परिवार के साथ या व्यक्तिगत रूप से शालीनतापूर्वक फोटो व वीडियो लेने पर यह आदेश प्रभावशील नहीं होगा। लेकिन दीवार व ऐसे अन्य स्थान पर खड़े होकर फोटो व सेल्फी इत्यादि लेते की मनाही रहेगी, जहां पर खुद को या किसी दूसरे की सुरक्षा को खतरा पैदा होता हो।
आदेश के उल्लंघन की दशा में संबंधित के खिलाफ भारतीय न्याय संस्था 2023 की धारा-223 एवं अन्य सायबर विधियों के अंतर्गत दण्डात्मक कार्रवाई की जायेगी।
ज्ञात हो पहले भारतीय दण्ड विधान की धारा-144 के तहत इस तरह के प्रतिबंधात्मक आदेश जारी किए जाते थे। हाल ही में देश में तीन नए कानून लागू हुए हैं, जिसमें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता भी शामिल है।
प्रतिबंधात्मक आदेश में स्पष्ट किया गया है कि प्रतिबंधित स्थलों पर यदि कोई व्यक्ति या संस्था व संगठन वीडियोग्राफी, फोटोग्राफी व शूटिंग करना चाहता है तो उसे पूर्व में लिखित अनुमति लेनी होगी। अनुमति प्राप्त करने के लिये शूटिंग/वीडियोग्राफी का उद्देश्य तथा उसके कंटेंट सहित लिखित आवेदन पत्र संबंधित विभाग को देना होगा। विभाग द्वारा दी गई अनुमति की लिखित सूचना पुलिस अधीक्षक एवं संबंधित एसडीएम को तीन दिन पूर्व अनिवार्यत: देनी होगी।

यह है वह युवती की रील जिस पर यह आदेश जारी हुआ है

इस आदेश के बाद शहर के लोगों को भी यह यकीन नहीं हो रहा है कि सार्वजनिक जगहों पार्क धार्मिक स्थलों या ऐतिहासिक स्थलों पर हब न केवल रील बनाना बल्कि फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी करना भी एक अपराध माना जाएगा। क्योंकि जब भी आम लोग कहीं न कहीं आउटिंग पर चाहते हैं तो? आज कल एक सामान्य चलन है कि वह वहां की यादों को भी वीडियो और फोटो के रूप में सहेज कर रख लेते हैं। अब से यह आदेश किसी भी तरीके से लोगों के गले नहीं उतर रहा है क्योंकि आप कहीं घूमने जाएं और वहां की यादों को न सहेजे यह कैसे संभव है।

श्याम लाल पांडवीय होगा पीएम कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस, विधानसभा अध्यक्ष ने किया उद्घाटन

ग्वालियर/ एक्सीलेंस कॉलेज में नई शिक्षा नीति के अनुरूप कोर्सेज शुरू होंगे। साथ ही सभी तरह के शैक्षणिक संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित होगी। विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलेगी और युवा पीढ़ी का भविष्य उज्ज्वल होगा। यह बात विधानसभा अध्यक्ष श्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने “प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस” के उदघाटन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कही। मुरार स्थित श्याम लाल पाण्डवीय महाविद्यालय को प्रदेश सरकार द्वारा प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस के रूप में विकसित किया गया है। कार्यक्रम की अध्यक्षता सांसद श्री भारत सिंह कुशवाह ने की।
केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह एवं मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इंदौर के अटल बिहारी वाजपेयी शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय में आयोजित हुए प्रदेश स्तरीय कार्यक्रम से ग्वालियर के एसएलपी कॉलेज सहित प्रदेश के 55 जिलों के प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस का वर्चुअल शुभारंभ किया। इस कार्यक्रम का ग्वालियर के श्याम लाल पाण्डवीय महाविद्यालय (एसएलपी कॉलेज) में आयोजित हुए जिला स्तरीय कार्यक्रम में सीधा प्रसारण हुआ।


विधानसभा अध्यक्ष श्री तोमर ने एसएलपी कॉलेज के मुख्य द्वार पर फीता काटकर प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस का उदघाटन किया। साथ ही पीएम कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस के विद्यार्थियों के लिये बस सेवा का शुभारंभ भी किया। इसके अलावा महाविद्यालय परिसर में भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकोष्ठ हिंदी ग्रंथ अकादमी के काउण्टर का शुभारंभ भी विधानसभा अध्यक्ष श्री तोमर एवं अन्य अतिथियों द्वारा किया गया।


कार्यक्रम में महाविद्यालय की जनभागीदारी समिति के अध्यक्ष श्री प्रहलाद सिंह घुरैया, संभाग आयुक्त श्री मनोज खत्री, पुलिस महानिरीक्षक श्री अरविंद सक्सेना, कलेक्टर श्रीमती रुचिका चौहान, अतिरिक्त संचालक उच्च शिक्षा प्रो. कुमार रत्नम व महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. आर के एस सेंगर मंचासीन थे।
विधानसभा अध्यक्ष श्री तोमर ने कहा कि मैं स्वयं इस महाविद्यालय का छात्र रहा हूँ। इसलिए एसएलपी महाविद्यालय को “प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस” बनाए जाने की मुझे अत्यंत खुशी है। उन्होंने कहा कि यहां के आचार्यगणों से मिले संस्कारों की बदौलत ही मुझे विभिन्न प्रकार के दायित्वों का निर्वहन करने में सफलता मिली है। श्री तोमर ने कार्यक्रम में मौजूद विद्यार्थियों का आह्वान किया कि वे एक्सीलेंस कॉलेज की सुविधाओं का लाभ उठाकर अच्छे विद्यार्थी बनें और सफलता का परचम लहराकर महाविद्यालय का नाम रोशन करें।
सांसद श्री भारत सिंह कुशवाह ने श्याम लाल पाण्डवीय महाविद्यालय को प्रधानमंत्री एक्सीलेंस कॉलेज बनाने के लिये केन्द्र व राज्य सरकार के प्रति धन्यवाद व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि दोनों सरकारें शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम कर रही हैं।

“एक पेड़ माँ के नाम” अभियान के तहत पौधे भी रोपे

प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस का उदघाटन करने पहुँचे विधानसभा अध्यक्ष श्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने एसएलपी महाविद्यालय परिसर में “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान के तहत पौधा रोपा। सांसद श्री भारत सिंह कुशवाह, संभाग आयुक्त श्री मनोज खत्री, पुलिस महानिरीक्षक श्री अरविंद सक्सेना एवं कलेक्टर श्रीमती रुचिका चौहान ने भी इस अवसर पर विभिन्न प्रजातियों के पौधे रोपे।

सीएम के आदेश को ठेंगा बता मछली खुद बाजार आ रहीं खुले में बिकने!

जैसे ही मध्यप्रदेश में भी भाजपा की सरकार 4.0 सत्ता में आई और के मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया गया है तो मोहन यादव ने मुख्यमंत्री बनते ही है। ताबड़तोड़ आदेश जारी किए उनके आदेश जारी करने से ऐसा लगा ही पूरे प्रदेश में राम राज स्थापित हो जाएगा, लेकिन हुआ इसके इतर। वह आदेश कहीं फाइलों में दब गए और जो हालात व्यवस्था में पहले बने हुए थे वह जस के तस रहे। ऐसा ही एक आदेश मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव ने खुले में मांस मछली की बिक्री पर रोक के लिए दिया था। आदेश जारी होते ही 2, 3 दिन के लिए प्रशासन ने कार्रवाई के ढोल पीटे और खुद की पीठ थपथपाई। जिम्मेदारों ने तो अपना काम कर दिया लेकिन ये मछलियां इतनी बेशर्म हैं के बार बार बिकने के लिए खुले में निकल आती हैं!

सीएम के आदेश की बात करें तो ग्वालियर में अब हालात यह है के पुलिस, प्रशासन, मत्स्य विभाग इस आदेश को भूल चुका है और शायद मुख्यमंत्री जी भी भूल गए हों कि इस आदेश की वर्तमान स्थिति क्या है और इस पर प्रशासनिक अधिकारियों से अपडेट लेते रहें? बात ग्वालियर की करें तो शहर में तमाम जगह पर खुले में मांस मछली का वितरण हो रहा है लेकिन सबसे गंभीर हालात मच्छी मंडी लधेडी के हैं। जहां पर बीच रोड पर ही दोनों तरफ मछली की दुकानें हैं और इन मछली की दुकानों पर खुले में मछली सजाकर बेची जा रही हैं। यह मामला मानसून का मौसम चलते और भी गंभीर हो जाता है क्योंकि प्रशासनिक आदेश के अनुसार पन्द्रह जून के बाद किसी भी तरह का मछली के उत्पादन पर पाबंदी है क्योंकि बरसात का मौसम मछलियों के लिए प्रजनन काल होता है। मतलब साफ है कि कहीं ना कहीं के तालाबों में इस पाबंदी के बाद भी धड़ल्ले से मछलियां निकाली जा रही हैं और वही मछलियां इस मछली मंडी तक बिक्री के लिए आ रही हैं जो कि खुलेआम बेची जा रही हैं।  लदेड़ी मछली मंडी में न केवल खेरीज में मछली बेची जाती हैं बल्कि यहीं से शहर के आसपास के कई क्षेत्र व कस्बों में भी मछली की सप्लाई होती है।

इस मामले में मत्स्य विभाग भी कठघरे में है क्योंकि मछली पालन के लिए जितने भी तालाब और क्षेत्र हैं वह सब मस्जिद वाक की मॉनिटरिंग में आते हैं। मस्जिद विभाग यदि अपना काम ठीक से कर रहा है तो फिर इन है तालाबों और जल स्रोतों से मछलियां कैसे निकाली जा रही है? है और इन मछली माफियाओं को सरकार के आदेश का डर क्यों नहीं है? इसी के साथ मस्त विभाग को यह भी पता है कि शहर में कौन-कौन से क्षेत्र में इस समय मछली की बिक्री हो रही है लेकिन इस विभाग के गैर जिम्मेदार अधिकारी किसी भी तरह की कार्रवाई करो नहीं करते हैं। एक तो खुले में मछलियां बिकनी ही नहीं चाहिए और दूसरा पन्द्रह जून के बाद तो मछलियों के किसी भी तरह के उत्पादन पर पाबंदी है तो फिर यह मछली बाजारों में कहां से आ रही हैं? लगता है कि या तो इन मछलियों के पर निकल आए हैं जो यह सीधे तालाबों से उड़कर दुकानों में सज रही हैं या चीता की तरह दौड़ रही है और दुकानों तक पहुंच जाती है।

आपको बता दें कि 13 दिसंबर 2023 को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही डॉक्टर मोहन यादव ने यह आदेश जारी किया था कि खुले में मांस मछली की बिक्री पूर्णत प्रतिबंधित होगी है। इस आदेश के बाद ग्वालियर पुलिस व प्रशासन भी मुस्तैदी से दुकानों पर कार्रवाई करने लग गया था। पूरे प्रदेश की बात करें तो मुख्यमंत्री को ये आंकड़े दिए गए थे की 25 हजार दुकानों को बंद किया गया है। ग्वालियर में भी कई दुकानों को पर्दानशी करके खानापूर्ति की गई थी लेकिन कुछ दिनों बाद ही पर्दे खुल गए और अब तो यह हालत है कि मांस मछली बेचने वालों को है। किसी तरह का कोई न तो पुलिस प्रशासन का डर है, ना ही उनको आदेश याद है अब दुकानदारों को आदेश कैसे याद हो, जब जिले के जिम्मेदार अधिकारी ही मुख्यमंत्री के आदेश को भूल चुके हों। 

पुलिस को आवंटित जमीन पर ही रेत का अवैध धंधा, खनिज विभाग की ऐसी मेहरबानी क्यों?

खनिज विभाग से आपकी अच्छी सेटिंग है तो आप शहर में बीचोंबीच खुलेआम कहीं पर भी रेत गिट्टी का फल लगाकर अपना अवैध कारोबार कर सकते हैं। अब यह अवैध धंधा निजी जमीन पर हो वहां तक तो ठीक है लेकिन जब अवैध रूप से गिट्टी और रेत का फड़ सरकार द्वारा पुलिस के आवास बनाने के लिए आवंटित की गई जमीन पर ही कर दिया जाए तो इसे अवैध नहीं महा अवैध और सांठगांठ नहीं महासांठगांठ कहेंगे। ऐसे अवैध रेत गिट्टी के फड़ खुलेआम चल रहे हों और विभाग को इसकी जानकारी भी न होना हो यह कैसे संभव है?

आपको बता दें कि मध्यप्रदेश शासन के नियमानुसार 1 जुलाई से रेत के उत्खनन पर प्रतिबंध लग जाता है। मॉनसून को देखते हुए पूरे प्रदेश की किसी भी नदी से किसी भी प्रकार से रेत का उत्खनन नहीं किया जा सकता चाहे आपके पास आवंटित खदान ही क्यों न हो। इसके बावजूद भी आप रेत का उत्खनन परिवहन खुलेआम होता देख सकते हैं और यही कारण है की रेत पूरे शहर में खुलेआम हर जगह उपलब्ध है। इस मामले में खनिज विभाग के जिम्मेदार साहब कहते हे ही पहले की निकाली हुई रेत भंडार करके रखी गई होगी। अब कितनी रेत भंडार की जा सकती है जो अभी तक बिक रही है? खैर खैर साहब का जवाब बता रहा है की कहीं न कहीं रेत माफिया और खनिज विभाग का यह रिश्ता पुराना है।

मानपुर गिर्द में सर्वे नंबर 398 की भूमि पुलिस विभाग को आवासीय परिसर बनाने के लिए आवंटित की गई है और इस संबंध में यह सूचना पटल भी इस जमीन पर दो तरफ से लगा हुआ है कि यह भूमि पुलिस के आवासीय परिसर के लिए आवंटित है। इसके बावजूद भी खनन माफिया इतना दबंग है कि उसने खुले आम इस जमीन पर रेत और गिट्टी की अवैध फड़ बना रखी है, जहां से अवैध रूप से रेत गिट्टी का भंडारण और विक्रय हो रहा है और यह सब के दहाड़े खुले आम की मुख्य सड़क पर चल रहा है जहाँ से दिन में कोई न कोई जिम्मेदार अधिकारी तो निकलता ही होगा लेकिन इन्होंने अपनी आँखों पर हरा चश्मा। पहन रखा है शायद इसी वजह से इन्हें यह अवैध धंधा दिखाई नहीं देता। 

सिंधिया समर्थक नेता विश्वासनाथ राव सालुंके ने उठाया है यह गंभीर मुद्दा , सुनिए क्या है उनका कहना …

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राजस्व विभाग के एप पर दिखाए गए मानचित्र में भी रेत की फड़ साफ नजर आ रही है है जिसका मतलब साफ है कि ये रेत की फड़ कोई छोटी सी जगह पर या पिछले कुछ दिनों में नहीं बनी है बल्कि काफी लंबे समय से चल रही है। अब सवाल यह उठता है है यदि यह रेत की फड? लगाने की अनुमति खनिज विभाग ने दीदी हो तो क्या करो पुलिस आवासीय परिसर के लिए आवंटित सरकारी जमीन पर है। यह काम किया जा सकता है है इसकी एवज में पुलिस विभाग को कुछ शुल्क मिल रहा है। के लिए और एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि क्या पुलिस विभाग को इसकी जानकारी है? खैर इन सबका कारण एक ही है कि जब सबको मिलता हो चंदा तो क्यों न चले अवैध धंधा!

सूचना; – पर्यावरण को बचाना है। नदियों को बचाना है पहाड़ों को बचाना है। इस महा अभियान में आप का सहयोग अपेक्षित है।

नगर निगम के खुद के कार्यालय में गंदगी की इंतहा, शौचालय देख उबकारी आ जाए

आप किसी सरकारी कार्यालय में जाएं और वहां पर आपको गंदे इस कदर गंदे शौचालय दिखाई दें कि आप उसमें घुसने में भी घबरा जाए और आपको उबकारी आने लगे तो यदि हम कहें कि यह हालात हैं। नगर निगम के शौचालय केजी हां वही नगर निगम जिसके ऊपर जिम्मेदारी होती है पूरे शहर को साफ रखने की। तो क्या आप यकीन करेंगे कि नगर निगम ग्वालियर के मुख्यालय के शौचालय भी इतने गंदे हो सकते हैं। हो सकता है कि आपको लगे कि पूरे शहर को साफ रखने वाले नगर निगम पे तो कम से कम ऐसे कर्मचारी रहते होंगे जो अपने ही कार्यालय को कम से कम इतना साफ रखें कि पूरे शहर में एक मिसाल कायम कर सकें। तो पहले आप ये नीचे दी गई लिंक क्लिक करके उन तस्वीरों को देख लीजिए जो चीख चीख के कह रहे हैं के नगर निगम केवल शहर ही नहीं खुद के कार्यालय के शौचालयों को साफ रखने में भी पूरी तरह फेल साबित हुआ है…

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यह शौचालय है शहरी आजीविका मिशन कार्यालय का, जो नगर निगम मुख्यालय कैंपस में ही बना हुआ है है और नगर निगम का ही एक विभाग है। इस विभाग में ज्यादातर वह हितग्राही आते हैं जो छोटे मोटे रोजगार के लिए लोन लेना चाहते हो और जब से यहां आने पर इन्हें घंटों इंतजार करना होता है तो फिर इन्हें शौचालय की जरूरत भी महसूस होती है लेकिन जब हितग्राही शौचालय की तरफ रुख करते हैं तो वहां फैली गंदगी। और बदबू के मारे हालात यह हो जाते हैं के इन्हें अपनी सब आवश्यक के लिए हैं नित्य प्राकृतिक क्रियाएं रोकने के लिए मजबूर होना पड़ता है। अब सवाल यह उठता है कि जिस नगर निगम से हम उम्मीद करते हैं कि वह शहर के हर मोहल्ले कॉलोनी गली चौराहे को साफ सुथरा रखेगा, वह निगम अपने कैम्पस में अपने खुद के ही एक कार्यालय में सफाई रखने में फेल नजर आ रहा है। जब खुद के कार्यालय में ही इतनी गंदगी पसरी है तो ऐसे नगर निगम से पूरे शहर को साफ सुथरा रखने की उम्मीद कैसे करें?

प्रशासन करा रहा मौत की खुदाई, जनता के दर्द की नहीं सुनवाई, खंबे लटके, करंट फैलने का खतरा!

श्रीराम कॉलोनी मोती झील ग्वालियर के रहवासियों का जीवन इस समय संकट में है। यहाँ रहने वाले दो सौ परिवारों के लगभग एक हजार लोग इस समय डर के साए में जी रहे हैं और वह अपनी गुहार तमाम जगह से लेकर सीएम हेल्पलाइन तक लगा चुके हैं लेकिन अब तक उनकी कोई सुनवाई नहीं है। मामला यह है कि कॉलोनी के नजदीक से निकलने वाली हाई टेंशन लाइन के खंभे गिरने की कगार पर हैं और यदि यह खंभे गिरते हैं तो पूरे क्षेत्र में हाई वोल्टेज करंट फैल जाएगा जो किसी बड़ी घटना का कारण बन सकता है। 

पहले आप यह समझें कि यह खंभे गिरने की कगार पर क्यों है? जब कॉलोनी के रहवासियों की शिकायत पर ग्राउंड रियलिटी चेक की गई तो वहां जाकर पता चला, यह खंभे मुरम के पहाड के ऊपर लगे हुए हैं और इन पहाडों को चारों तरफ से खनन माफियाओं द्वारा अवैध रूप से काटा गया है। अब बारिश के समय पर खंभों के आसपास की और मुरम भी निकल जाने से ये खंभे गिरने की कगार पर हैं। साफ है कि यदि आगे कोई बड़ा हादसा करता है तो उसका कारण कहीं न कहीं यह अवैध खनन भी है, जिसने खंभों के चारों ओर से पूरी मुरम हटा दी जिससे खंभों की नींव कमजोर हो गई और अब वह अध पर लटके हुए हैं। 

हाई टेंशन लाइन खंभा इस तरह गिरने की कगार पर है 

आपको बता दें कि यह को फ़ोन करो ग्वालियर मध्य प्रदेश में मोती झील की वही पहाड़ी है जिसके बारे में हमने कुछ समय पूर्व भी खबर प्रसारित कर प्रशासन को चेताया था कि इस पहाडी को चारों तरफ से काटकर अवैध पत्थर और मुरम का खनन तो किया ही जा रहा है और साथ ही जमीन को समतल कर भू माफिया अवैध कालोनी भी बसा रहे हैं। लेकिन उस खबर के बाद भी प्रशासन कुंभकर्णीय नींद में लीन है और किसी बडे हादसे के इंतजार में है। वर्तमान स्थिति में तो इस अवैध मुरम खुदाई से केवल दो खंभों की नींव ही कमजोर हुई है और वह खतरे की स्थिति में है लेकिन इस पूरी पहाड़ी के ऊपर और भी खंभे लगे हुए हैं है और जिस तरीके से यहां पर अवैध उत्खनन हो रहा है। उससे और भी खंभे गिरने की स्थिति में आ सकते हैं। 

यहाँ बड़ा सवाल यह है जब प्रशासन को इस पहाड़ी पर चारों तरफ से किए जा रहे अवैध उत्खनन की जानकारी है तो प्रशासन द्वारा इन अवैध खनन माफिया करने वालों पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई और अभी भी चल रहे खनन को क्यों नहीं रोका जा रहा और अब इस खनन की वजह से जो हाई टेंशन लाइन के खंभे गिरने की स्थिति में है, उनके लिए किसे दोषी माना जाएगा? हालाँकि रहवासियों ने संबंधित बिजली विभाग को लिखित में शिकायत की है और इस शिकायत पर बिजली विभाग के अधिकारियों द्वारा मौका मुआयना भी किया गया है। लेकिन अभी तक इन खंभों को गिरने से रोकने की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। 

कालोनी वासी महिला ने वीडियो बना अपनी पीड़ा इस तरह बताई

कॉलोनी के रहवासियों का कहना है की इस पहाड़ी पर अवैध खनन लगातार होता रहता है। पहाड़ी के ऊपर कई भारी वाहन भी चलते हैं और ब्लास्टिंग करके भी खनन किया जाता है। ब्लास्टिंग से संबंधित भी शिकायतें की गई हैं लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इस पहाड़ी पर होने वाले। अवैध खनन के कारण ही या खंभे की जड़ें कमजोर हो गई हैं और खंभे गिरने की कगार पर हैं। कॉलोनी के रहवासी इस स्थिति को देखकर काफी डरे हुए हैं और किसी बड़ी घटना की आशंका जाहिर कर रहे हैं में है।

यदि इन खंभों के गिरने से कोई हादसा होता है तो उसकी वजह यह अवैध उत्खनन भी है जिसकी वजह से ये खंभे लटके हुए हैं है और प्रशाशन को इन अवैध उत्खनन करने वालों पर सख्त कार्रवाई करना चाहिए जिससे है आगे ये उत्खनन और अधिक न हो सके और बाकी के खंभे भी सुरक्षित स्थिति में रहे। साथ ही इस पूरा पहाड़ी को भी बचाया जा सके। लेकिन प्रशासन को यह अवैध खनन क्यों नहीं दिखाई दे रहा? प्रशासन इन पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं कर रहा? प्रशासन इन खनन माफियाओं पर क्यों मेहरबान है? यह भी एक बड़ा सवाल है। 

जीडीए महाघोटाला; सौ करोड़ के जमीन की बंदरबांट की बारह साल से 26 फाइलें गायब, कार्यवाही अब तक शून्य

जीडीए जिसे आप ग्वालियर डेवलपमेंट अथॉरिटी के नाम से जानते हैं। यदि हम इसे ग्रैंड डैकोइट अलायंस कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योंकि में इस संस्था ही कारिंदों के कारनामे ऐसे हैं जिन पर पूरा के पूरा महाग्रंथ लिखा जा सके। छोटे मोटे मामले और आर्थिक अनियमितता तो यह आम बात है लेकिन सालों पहले यहां एक इतना बड़ा घोटाला हुआ जिसे छुपाने के लिए यहां के कारिंदों ने उन मामलों की फाइलें तक गायब करा दी और सबसे बड़ी बात यह है कि 12 साल बाद भी न तो उन फाइलों का पता चला है। ना ही उस मामले में कोई कार्रवाई हुई है।

सालों पहले जीडीए द्वारा तमाम प्राइम लोकेशन की कॉलोनियों पर गलत तरीके से प्लॉट्स सोसायटियों को आवंटित किए गए थे। इस खेल में बेशकीमती प्लॉट कोडियों के भाव इन सोसाइटों को दिए गए थे। शताब्दी पुरम सिटी सेन्टर विनयनगर आनंदनगर जैसी पॉश और बड़ी कॉलोनियां बसीने की स्कीम जब आई थी उस समय जीडीए के गैर जिम्मेदारों द्वारा कुछ सोसाइटों को प्लॉट देने के नाम पर बड़ा खेल किया गया था। इस आर्थिक अनियमितता का मामला जब उजागर हुआ है तो इससे भी बड़ा कारनामा यहां के अधिकारियों ने कर दिखाया और इन मामलों से जुड़ी फाइलें ही गायब कर दी। साल दो हज़ार ग्यारह बारह में इन कॉलोनियों में आवंटस से जुड़ी छब्बीस फाइलें गायब हुई थी और इसमें एफआईआर भी दर्ज की गई थी।और जीडीए को भी कार्रवाई करनी थी लेकिन आज बारह साल बीत जाने के बाद भी इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई है। 

अब हम आपको बताते हैं के 12 साल बाद जमीन में गड़ा हुआ यह मामला अचानक कैसे ऊपर आया है? कुछ माह पूर्व ग्वालियर विकास प्राधिकरण का कार्यभार सीईओ नरोत्तम भार्गव ने संभाला है। उनके पास ऐसे कई पीड़ित हितग्राही इन स्कीमों से आ रहे थे जिनकी प्लॉट आवंटन को लेकर कुछ समस्याएं थी। जब इन हितग्राहियों को न्याय दिलाने के लिए नरोत्तम भार्गव अपने संबंधित तो से जानकारी लेते थे तो पता चलता था कि उसका रिकॉर्ड ही नहीं है। पूरे मामले की डिटेल लेने पर नृतम भार्गव जीके पकड़ में आया कि ये सब वही गड़बड़झाला माली। स्कीम के आवंटन के रिकॉर्ड हैं जो बारह साल पहले गायब कर दिए गए थे। सीईओ नर्तम् भार्गव की सक्रियता के चलते ही अब यह मामला फिर से उजागर हुआ है। उन्होंने पुलिस को पत्र लिखकर भी इस मामले में की गई कार्रवाई का अपडेट मांगा है। 

मौत की सेल्फी; सेल्फी का शौक दो युवकों को ले गया रेलवे ट्रैक और हो गई उनकी मौत

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सेल्फी का शौक दो युवकों को इतना महंगा पड़ गया कि उनकी मौत हो गई हुआ। यूं कि रेलवे ट्रैक पर ट्रेन निकलते समय सेल्फ़ी। या वीडियो बनाते समय ये दोनों युवक ट्रेन की चपेट में आ। गए कई बार ऐसा होता है कि युवा अपने सेल्फी के शौक के लिए काफी जानले वह करतब दिखाने की कोशिश करते हैं और ऐसा ही यह मामला ग्वालियर में हुआ। जहाँ चलती ट्रेन के पास खड़े होकर सेल्फी लेने के चक्कर में इन युवकों की मौत हो गई।

सुबह-सुबह घर से घूमने निकले दो दोस्तों के शव रेलवे ट्रैक पर पड़े हुए मिले। स्थानीय लोगों ने रेलवे ट्रैक पर जब शव पड़े हुए देखे तो तुरंत पुलिस को मामले की जानकारी दी और मौके पर पहुंची पुलिस ने मृतकों की शव को पोस्टमार्टम हाउस पहुंचाया है। प्रत्यक्षदर्शियों से पुलिस को पता लगा है कि रेलवे ट्रैक पर सेल्फी लेते समय ट्रेन की चपेट में आकर उनकी मौत हुई है।

मौके पर पहुंची पुलिस ने जब जांच पड़ताल का स्थानीय लोगों से पूछताछ की तो पुलिस को पता लगा है कि दोनों मृतक रेलवे ट्रैक पर सेल्फी खींचने की कोशिश कर रहे थे तभी ट्रेन की चपेट में आकर उनकी मौत हुई है। पुलिस ने फिलहाल दोनों मृतक युवकों के शव को पोस्टमार्टम हाउस भेज दिया है और मर्ग कायम कर पुलिस पूरे घटनाक्रम की जांच पड़ताल कर रही है। अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक निरंजन शर्मा का कहना है की रेलवे ट्रैक से पुलिस ने दो युवकों के शव बरामद किए हैं झांसी रोड पुलिस ने मर्ग कायम कर दोनों के शव पीएम हाउस पहुंचा कर विवेचना शुरू की है और विवेचना में जो भी तथ्य सामने आएंगे उस आधार पर कार्रवाई की जाएगी।

फिलहाल पुलिस द्वारा मर्ग कायम कर मामले की जांच पड़ताल की जा रही है। झांसी रोड थाना पुलिस को आज सुबह सूचना मिली कि इलाके के सुविधा हॉस्पिटल के पास रेलवे ट्रैक पर दो व्यक्तियों के शव पड़े हुए हैं। मामले की जानकारी लगते ही रेलवे पुलिस बल और झांसी रोड थाना पुलिस मौके पर पहुंची। दोनों मृतकों की पहचान निखिल सोनी और सत्येंद्र गुर्जर के रूप में हुई है दोनों युवक आपस में दोस्त भी बताए गए हैं और एक ही गांव के रहने वाले हैं।

निरंजन शर्मा,अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक,ग्वालियर को फ़ोन करो ने क्या कहा घटना के बारे में सुनिए