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गागर भर ध्यान से सागर भर तनाव से पुलिसकर्मियों को मुक्त करने की नाकाम कवायद

पुलिस रिफॉर्म पर कई बार कई चर्चाएं हुई हैं। पुलिसकर्मियों के ड्यूटी समय को निर्धारित करने पर भी चर्चाएं हुई हैं। पुलिसकर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य को सुधारने पर भी चर्चाएं हुई हैं लेकिन जमीनी स्तर पर यकीन मानिए अभी तक कुछ नहीं हुआ है

इक्कीस दिसंबर पूरे देश नहीं बल्कि पूरी दुनिया में विश्व ध्यान दिवस के रूप में मनाया गया और ध्यान के महत्व पर जगह जगह तमाम चर्चाएं हुई। ध्यान जिसे अंग्रेजी में मेडिटेशन कहते हैं इसके माध्यम से आप अपने जीवन को तनाव मुक्त कर सकते हैं। लेकिन यह ध्यान एक या दो दिन की जाने वाली प्रक्रिया नहीं बल्कि लगातार की जाने वाली एक तपस्या है। विश्व ध्यान दिवस पर मध्य प्रदेश पुलिस ने भी एक अजीबोगरीब पहल शुरू की। सोच अच्छी है। शुरुआत अच्छी है लेकिन यह सतत नहीं होगी और सतत ना होने के चलते ही अंत में परिणाम शून्य होगी और यही वजह है कि यह पहल अजीबोगरीब है और फिजूल है।

प्रदेश के पुलिसकर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य को सुधारने के लिए मध्यप्रदेश पुलिस के मुखिया डीजीपी कैलाश मकवाना ने यह पहल की है। उन्होंने हार्टफुलनेस सेशन शुरू किया है। इसके लिए रामकृष्ण मिशन के दाजी के साथ एक एमओयू भी भलीभांति किया गया है। हार्ट फुलनेस सेशन के लिए विशेषज्ञों को बुलाया गया। उनके द्वारा पहले अस्सी पुलिसकर्मियों को ट्रेंड कराया गया और अब यह पुलिसकर्मी साथ ही पुलिसकर्मियों को ट्रेंड करेंगे। आपको बता दें कि डीजीपी कैलाश मकवाना को हार्टफुलनेस संस्था द्वारा हार्ट फुलनेस चेंजमेकर अवार्ड दिया गया है। अवार्ड के लिए डीजीपी साहब को बधाई और जो प्रयास वह करने की कोशिश कर रहे हैं उसके लिए भी उन्हें बधाई। लेकिन क्या वह वास्तव में ऐसी कोई व्यवस्था लागू कर पाएंगे कि प्रदेश के पुलिसकर्मी तनाव मुक्त जीवन जी पाए।

मध्यप्रदेश में ज्यादातर पुलिसकर्मी तनाव और मानसिक विकार से पीड़ित हैं। इसका कारण है उनकी दिनचर्या उनके सेवा का कोई समय निर्धारित नहीं है। एकमात्र पुलिस विभाग ही है जो किसी भी राष्ट्रीय या सामाजिक त्योहार पर भी कार्य करता है। 26 जनवरी और 15 अगस्त को आपको पुलिसकर्मी कार्य करते नजर आएंगे। इसी तरह दिवाली होली हो या ईद पुलिसकर्मी आपको कार्य करते नजर आते हैं। मध्यप्रदेश में सप्ताह में फ़ाइव डेज वर्किंग लागू है लेकिन पुलिस ही एकमात्र विभाग है जहां सात दिन कार्य होता है। पुलिसकर्मी लगातार इतने लंबे समय तक काम करते हैं। कहीं न कहीं कोई न कोई आकस्मिक ड्यूटी भी आ जाती है उसे भी निभाते हैं। कई बार तो न खाने की फुर्सत होती है न सोने की और अपने खानपान और नींद पूरी न होने के चलते वह अवसाद और मानसिक रूप से विकार का शिकार हो जाते हैं। 

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आपने ज्यादातर पुलिस का एक विलेन वाला चेहरा ही देखा होगा जिसमें वह आपको वसूली करता नजर आता है। थाने जाओ तो अखर स्वभाव में बदतमीजी करता नजर आता है। लेकिन एक पुलिसकर्मी का स्वभाव ऐसा क्यों हो जाता है? यह एक चिंतन का विषय है। झुंझलाहट और आवेश एक मानसिक विकार ही है और यदि आपको भी लगातार अनवरत बिना निजी जीवन जिए कार्य करने को दिया जाए तो आपके अंदर भी इस तरह के मानसिक विकार के लक्षण दिखाई देने लगेंगे। एक पुलिसकर्मी के जो सेवा समय की व्यस्तताएं हैं वही कारण होता है जिसकी वजह से उसके स्वभाव में आपको यह सब विकार दिखाई देते हैं। हो सकता है कि एक आम आदमी मेरी बात से सहमत न हो लेकिन जो भी पुलिसकर्मी और उनके परिवारजन इस लेख को पढ़ेंगे वह इस दर्द को भलीभांति समझ सकते हैं। 

पुलिस रिफॉर्म पर कई बार कई चर्चाएं हुई हैं। पुलिसकर्मियों के ड्यूटी समय को निर्धारित करने पर भी चर्चाएं हुई हैं। पुलिसकर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य को सुधारने पर भी चर्चाएं हुई हैं लेकिन जमीनी स्तर पर यकीन मानिए अभी तक कुछ नहीं हुआ है और अभी भी जो कुछ हुआ है तो वह केबल विश्व ध्यान दिवस पर एक अजीबोगरीब शुरुआत है। क्योंकि केबल आज के दिन फोटो खिंचवाए गए हैं। आगे यह सतत जारी रहेगी।इस बात में संशय है। हालांकि विभाग का दावा है कि अब हर रविवार को दस से ग्यारह बजे हर थाने में एक ध्यान सत्र आयोजित किया जाएगा जिसमें थाने के पुलिसकर्मी ध्यान करेंगे और अपने जीवन को तनाव मुक्त बनाएंगे। लेकिन पहला प्रश्न है कि क्या हर रविवार को यह हो पाएगा और दूसरा प्रश्न है कि केवल रविवार को एक घण्टी का ध्यान क्या पर्याप्त है? और तीसरा प्रश्न क्या कोई ऐसी अन्य व्यवस्था नहीं हो सकती जिसमें पुलिसकर्मियों के सेवा समय को निर्धारित किया जाए?

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एक पुलिसकर्मी कितने तनाव में कार्य करता है? यह आप उन खबरों से समझ सकते हैं जो समय समय पर सुर्खियां बनती हैं। कहीं न कहीं कोई पुलिसकर्मी आत्महत्या कर लेता है।कहीं न कहीं कोई पुलिसकर्मी अपने साथी को पीट देता है।कहीं ना कहीं कोई पुलिसकर्मी सड़क पर उद्दंडता कर बैठता है। इन सब का कारण यही है कि तनावग्रस्त पुलिसकर्मी का अपने मन पर नियंत्रण नहीं होता है और कई बार तनाव इतना ज्यादा बढ़ जाता है कि वह इसके चलते स्वयं की जीवनलीला समाप्त कर लेता है हालांकि मेरे पास स्पष्ट आंकड़े नहीं हैं लेकिन पिछले कुछ सालों में पुलिसकर्मियों द्वारा किए जाने वाले आत्महत्या के मामलों में इजाफा हुआ है। कारण केवल एक है वह अनियमित दिनचर्या जो पुलिसकर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य पर विपरीत असर डाल रही है।

विश्व ध्यान दिवस पर पुलिसकर्मियों के संबंध में डीजीपी कैलाश मकवाना ने जो विचार रखे हैं उन्हें ध्यान से समझिए। उनका कहना है कि बहुत तनावपूर्ण परिस्थितियों में पुलिसकर्मी दिमाग पर नियंत्रण नहीं रख पाता। आउट ऑफ़ प्रिकॉशन रिएक्ट कर देता है जैसा कि कहा जाता है। पानी शांत होगा तो नीचे तल में कंकड़ पत्थर। अंदर की सुंदरता आप देख सकेंगे उसी तरीके से जब तक मन को स्थिर नहीं करेंगे बेहतर निर्णय लेने की स्थिति में अपने आप को नहीं रख सकेंगे इसलिए मैंने यह प्रयास किया कि पुलिस फोर्स को ध्यान से जोड़ा जाए।वह इससे मन पर नियंत्रण रख पाएंगे। शारीरिक और मानसिक रूप से उनकी प्रोफेशनल व पर्सनल लाइफ में भी बेहतर तरीके से सामंजस्य बैठा पाएंगे।

जो कुछ डीजीपी कैलाश मकवाना ने कहा उससे सहमत होने में कोई संशय नहीं होना चाहिए। निस्संदेह उनकी सोच सराहनीय है। लेकिन साल में एक घंटे के ध्यान यह महीने में एक घंटे के सप्ताह में एक घंटे के ध्यान की जगह यदि पुलिसकर्मियों के सेवा समय से संबंधित कोई बड़ा प्रयास किया जाए तो संभवतः उनका जीवन तनाव मुक्त हो सकता है। यह एक दिन का प्रयास आगे लगातार जारी रहेगा। इस बात में संशय है क्योंकि रविवार को ही जो ध्यान का समय दस से ग्यारह निर्धारित किया गया है उसी समय कोई माननीय वीआईपी आ धमकेगा और फिर यह ध्यान सत्रों तक सिमट कर रह जाएगा। दिनभर के तनावपूर्ण सेवा काल के बाद अब हर थाने पर एक काम का तनाव और बढ़ जाएगा कि उसे अब ध्यान सत्र को भी कागजों पर जीवित रखना पड़ेगा। आइए इंतजार करते हैं अगले विश्व ध्यान दिवस 21 दिसंबर 2026 का…

Gajendra Ingle
Gajendra Inglehttp://theinglespost.com
The author is founder Editor of this news portal. He has long experience of journalism. He has deep expertise on political and social issues.
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