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यह कैसा न्याय? सौ रुपये के रिश्वत केस में 39 साल बाद बरी, परिवार ने सहे अन्याय का दोषी कौन?

मध्य प्रदेश स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन के रायपुर कार्यालय में बिल सहायक के पद पर कार्यरत थे। उसी समय 1986 में उन पर सौ रुपए की रिश्वत लेने का केस बना था के झूठ बताया जा रहा था लेकिन उसे साबित करने का इसके लिए जागेश्वर प्रसाद को उनतीस साल की लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी।

“भगवान की घर देर है पर अंधेर नहीं” यह कहावत तो आपने सुनी होगी लेकिन यदि न्यायपालिका की बात करें तो भारतीय न्यायपालिका में देर भी है और अंधेर भी है और इसका हाल ही में जो उदाहरण सामने आया है वह इतना दर्द भरा है कि शायद इस दर्द को जागेश्वर प्रसाद अवधिया और उनका परिवार ही बेहतर समझ सकता है। हो सकता है कि आप पाठकों में से भी कुछ लोग उस दर्द को थोड़ा बहुत महसूस कर पाए। मामला भारत की घोंघा गति न्याय व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े करता है। यह भी तब जब भारतीय न्याय प्रक्रिया का मूल नैसर्गिक सिद्धांत है कि “जस्टिस डिलेड इस जस्टिस डिनाइड”। तो फिर उनतालीस साल बाद जो फैसला जागेश्वर प्रसाद अवधिया को तमाम आरोपों से बरी कर रहा है क्या हम उसे न्याय कहें?

मामला छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर तत्कालीन मध्यप्रदेश का है। जब छत्तीसगढ़ व मध्य प्रदेश एक ही राज्य हुआ करते थे। जागेश्वर प्रसाद। मध्य प्रदेश स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन के रायपुर कार्यालय में बिल सहायक के पद पर कार्यरत थे। उसी समय 1986 में उन पर सौ रुपए की रिश्वत लेने का केस बना था के झूठ बताया जा रहा था लेकिन उसे साबित करने का इसके लिए जागेश्वर प्रसाद को उनतीस साल की लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। इतने लंबे समय की इस लड़ाई में न जाने कितनी बार वह बिखरे होंगे और कितनी बार उन्होंने अपनी हिम्मत को समेटा होगा समाज की कितनी यातनाएं सही होंगी। और न्याय की उम्मीद में साल दर साल गुजरता गया होगा। 

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जागेश्वर प्रसाद अवधिया का कहना था कि वह निर्दोष है उन्हें फंसाया गया है। तभी एक बिल को पास कराने के लिए उन पर दबाव बनाया जा रहा था और वे गलत बिल पास नहीं कर रहे थे। उनका कहना था कि जब तक ऊपर से ऑर्डर नहीं आएगा वे बिल पास नहीं कर सकते तभी एक वहीं के कर्मचारी ने जागेश्वर को ₹20 की रिश्वत देने की कोशिश की। और इसके बाद वही कर्मचारी एक दुकान पर पहुंच गया जहां जागेश्वर खड़े हुए थे उसने जागेश्वर की शर्ट की जेब में पचास पचास के दो नोट जबरदस्ती डाल दिए जागेश्वर लोकायुक्त की टीम ने उन्हें रंगे हाथों पकड़ लिया। अब सवाल यह है कि यदि शिकायत मजबूत थी सबूत पक्के थे तो फिर कुछ ही सालों के सुनवाई के बाद जागेश्वर प्रसाद को सजा क्यों नहीं दी गई? क्यों उनके जीवन के उनतालीस साल बर्बाद कर दिए गए? चौवालीस साल की उम्र में इस मामले में फंसाए गए जागेश्वर।अब तिरासी साल के हो चुके हैं और अपने जीवन के उनतालीस साल उन्होंने इस रिश्वत की दाग के साथ गुजारे हैं।

इन उनतालीस सालों में न केवल जागेश्वर प्रसाद बल्कि उनके परिवार ने भी समाज और सिस्टम के तमाम ताने सुने हैं और इतने लंबे समय तक एक अन्याय का शिकार होते रहे हैं जिस तरह का अन्याय उन्होंने उसका दर्द वे ही समझ सकते हैं। उन्नीस सौ छियासी में रिश्वत का दाग लगने के बाद उनकी सामाजिक छवि धूमिल हुई।उनकी तरक्की रुक गई वेतन आधा रह गया।बच्चों की पढ़ाई अधूरी रह गई।उनकी पत्नी भी काल के गाल में समा गई। उनके परिवार ने भी तमाम यातनाएं सही लोगों के ताने सहे। उनतालीस साल मतलब चौदह हजार से ज्यादा दिन। और एक एक दिन नई चुनौती नई समस्या लेकिन साथ ही न्याय पाने की एक नई उमंग। 

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जो कुछ जागेश्वर प्रसाद अवधिया के साथ घटा क्या आप उसे न्याय कहेंगे? एक और एक न्यायाधीश के घर से जले हुए करोड़ों रुपये मिलते हैं। लेकिन उनको न्यायाधीश होने का कवच हर तरह के कानूनी प्रक्रिया से बचाता है और दूसरी ओर जागेश्वर प्रसाद अवधिया जैसे न जाने कितने आम लोग हमारे देश में हैं जो न्यायपालिका की इस अंधेर नगरी में जाने कितने सालों से अन्याय सह रहे हैं और अपना पूरा जीवन न्याय की आस में गुजार देते हैं। क्या हर आम और खास के लिए कानून प्रक्रिया समान है?क्या देश का कानून चाहे आंखों पर पट्टी बंदी हो चाहे आंखों से पट्टी हटा दी गई हो लेकिन क्या वह हर एक नागरिक को समानता के नजरिए से देख पा रहा है? क्या भारतीय न्याय प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता नहीं है?

स्तंभ के लेखक गजेंद्र इंगले, संपादक द इंगलेज पोस्ट

Gajendra Ingle
Gajendra Inglehttp://theinglespost.com
The author is founder Editor of this news portal. He has long experience of journalism. He has deep expertise on political and social issues.
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