डिजिटल डेस्क पटना: बिहार विधानसभा चुनाव मैं अप्रत्याशित ऐतिहासिक और हर कल्पना से परे परिणाम आपके सामने आए हैं। एनडीए दो सौ से अधिक सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत प्राप्त कर चुका है। यह सब कुछ हैरान करने वाला कई वजह से उनमें से एक वजह यह भी है कि तमाम भाजपा नेता चुनाव से पहले एनडीए के एक सौ साठ से ज्यादा सीटें जीतने का दावा कर रहे थे। भाजपा नवासी सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी है। भाजपा के इलेक्शन मैनेजमेंट ने एक बार फिर विपक्षियों को चारों खाने चित्त कर दिया। इस जीत की कई वजह हो सकती है। लेकिन आइए सबसे बड़ी वजह जानने की कोशिश करते हैं।
हालांकि हर चुनाव परिणाम की तरह इस चुनाव परिणाम के बाद भी विपक्ष ईवीएम और बोर्ड चोरी के आरोप लगा रहा है। यदि ऐसी कोई वजह है तो इसके लिए न्यायालय का रास्ता अपनाना चाहिए।तथ्यों के साथ वहां पर अपनी बात रखनी चाहिए। लेकिन यहाँ हम उन मूलभूत मुद्दों का जिक्र करेंगे जिनकी वजह से जनता ने एनडीए के पक्ष में मतदान किया। ऐसी क्या वजह रही जिसके वजह से बिहार में बंपर बोटिंग हुई और वोटिंग में भी मतदाताओं की लहर एनडीए के पक्ष में रही? इतने सालों से सुशासन बाबू की पहचान पा चुके नीतीश कुमार पर और भाजपा पर मतदाताओं ने भरोसा जताया।
बिहार विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा चौंकाने वाला रहा वोटों के % और सीटों की प्राप्ति का आंकड़ा बिहार के 75000000 मतदाताओं में से लगभग 50000000 मतदाताओं ने अपने मत का प्रयोग किया। इसमें से सबसे ज्यादा एक करोड़ पंद्रह लाख वोट राजद को मिले। वोट पाने के मामले में भाजपा 10000000 वोट के साथ दूसरे नंबर पर रही। दोनों के बीच में मात्र 1400000 वोट का अंतर है। इसके बावजूद भाजपा राजद से चौंसठ सीटें अधिक जीत गई। यह आंकड़े आपको हैरान करेंगे लेकिन इसके पीछे की वजह भी है। राजद को ज्यादा वोट इसलिए मिले क्योंकि वह ज्यादा सीटों एक सौ तैंतालीस पर चुनाव लड़ी जबकि भाजपा केवल एक सौ एक सीट पर लड़ी इसलिए भाजपा को मिलने वाले बोट की संख्या कम है।
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हमारे देश में जब भी चुनाव होते हैं मतदान होते हैं तो जातिवाद के आधार पर मतदान का झुकाव देखा जाता है लेकिन इस बार बिहार में जिस तरह से यह परिणाम आए हैं वह कहीं ना कहीं यह भी साबित कर रहे हैं कि अब मतदाता जातिवाद से ऊपर उठकर भी वोट दे रहे हैं। जिस एम बाय फार्मूले के आधार पर बिहार में ज्यादातर सीट जीती जा रही थी उस फार्मूले की इस चुनाव में हवा निकल चुकी है। इस जीत में नीतीश कुमार के द्वारा सुशासन के लिए चलाए जा रहे प्रयासों की भी अहम भूमिका रही है। हालांकि एनडीए को दो हजार दस के विधानसभा चुनाव में भी दो सौ छह सीटों पर प्रचंड जीत मिली थी लेकिन अब पन्द्रह साल बाद शासन करते हुए भी जनता के बीच में इस तरह का विश्वास होना कि फिर से इतनी सीटें मिल जाए यह कहीं ना कहीं साफ दर्शाता है कि इस बार मतदान जातिवाद की मानसिकता को अलग रखकर किया गया है।
आइए अब उस बिंदु पर चर्चा करते हैं जो इस बार बिहार चुनाव में गेम चेंजर रहा। पिछले कई राज्यों के विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ा बदलाव महिलाएं ही लेकर आई हैं। इसकी शुरुआत मध्य प्रदेश में उस समय हुई थी जब शिवराज सिंह चौहान ने लाडली बहन योजना लागू करके महिला मतदाताओं का रुझान पूरी तरह भाजपा की तरफ कर दिया था और इसके बाद यही योजना अलग अलग नामों से अलग अलग राज्यों में चलाई गई जिसका लाभ एनडीए को मिला। बिहार में भी बिहार सरकार ने मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के नाम से महिला मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए 10 – 10 हजार रुपये दिए जाने की योजना चलायी और बताया गया कि यह रकम आगे जाकर 2-2 लाख रुपये तक हो जाएगी। आपको बता दें कि इस योजना का लाभ बिहार में 1 करोड 21 लाख महिलाओं को दिया गया। मतलब बिहार की लगभग आधी महिला मतदाता इस योजना से लाभान्वित हुई और उसका असर यह हुआ कि इस बार महिला मतदाताओं ने बिहार चुनाव में नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया।
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संभवतः थोड़ा न थोड़ा प्रभाव कई विषय का रहा होगा लेकिन सबसे ज्यादा प्रभाव यदि इस बार बिहार विधानसभा चुनाव में हुआ है तो वह इस मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना का ही रहा है। यही योजना गेम चेंजर स्थापित हुई और यही वजह रही कि कुछ महीने पहले जहां एंटी इनकमेंसी फैक्टर थोड़ा बहुत दिखाई दे रहा था। इस योजना ने उसे भी शून्य कर दिया और एनडीए सरकार की तमाम छोटी बड़ी कमियों को दरकिनार करते हुए महिलाओं ने एनडीए के पक्ष में बंपर वोटिंग की।
