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सरकारी स्कूल में क्वालिटी एजुकेशन के दावे फेल; प्राइवेट स्कूल संख्या में कम लेकिन उनमें छात्र दो गुने

जिस स्कूल में आईएएस और आईपीएस के बच्चे पढ़ेंगे वहां पर सुविधाएं कागजों पर नहीं हकीकत में दुरुस्त नजर आएंगी न कोई शिक्षक अनुपस्थित होने की हिमाकत करेगा ना ही लापरवाही बरतने की। क्या माननीय मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव में है इच्छाशक्ति यह नियम लागू करने की?

ग्वालियर मध्य प्रदेश : सरकारी स्कूल में शिक्षा का स्तर अच्छा होता है या प्राइवेट स्कूल में? यह प्रश्न सुनकर आप हंस भी सकते हैं बाल भी खींच सकते हैं और इस खबर को बेवजह मान कर छोड़ भी सकते हैं। लेकिन याद कीजिए सीएम राइज स्कूल क्यों खोले गए सीएम राइज? स्कूल खोलने से पहले तत्काल मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने क्या दावे किए थे? उनका कहना था कि निजी स्कूल से बेहतर शिक्षा सरकारी स्कूल में मिलेगी। संसाधन भी बेहतर होंगे लेकिन अभी जो आंकड़े सामने निकलकर आए हैं वह चौंकाने वाले हैं। क्योंकि आज भी ज्यादातर माता पिता अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में भेजना ही पसंद कर रहे हैं।उनका भरोसा सरकारी स्कूल पर नहीं है और सरकार द्वारा किए गए दावों पर तो कतई नहीं है।

सबसे पहले आंकड़ों से समझें कि सरकारी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण बेहतर शिक्षा और संसाधन देने के दावों की पोल यह आंकड़े किस तरह खोल रहे हैं। शैक्षणिक वर्ष दो हजार पच्चीस छब्बीस में ग्वालियर जिले के समस्त स्कूलों में पहली से हायर सेकेंडरी में 4 लाख 61 हजार 466 छात्रों का नामांकन हुआ है। इनमें से केंद्रीय विद्यालय में 10398 छात्र का नामांकन हुआ है। नवोदय विद्यालय में 445 छात्र का नामांकन हुआ है। राज्य सरकार के सरकारी स्कूलों में 135227 छात्र का नामांकन हुआ है। राज्य सरकार द्वारा सहायता प्राप्त स्कूल में 3350 छात्र का नामांकन हुआ है जबकि ग्वालियर के समस्त प्राइवेट स्कूल में 322510 छात्र का नामांकन हुआ है। आंकड़े साफ बता रहे हैं कि निजी स्कूल में लगभग दुगने छात्रों का नामांकन हुआ है। 

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यह हालात तब है जब पिछले कुछ सालों से सीएम राइड स्कूल के नाम पर सरकारी स्कूलों की ढपली सरकार बजा रही है। लेकिन हकीकत यह है कि सरकार के मुफ्त शिक्षा के दावों पर प्राइवेट स्कूल की मोटी फीस होते हुए भी उनकी शिक्षा का स्तर भारी पड़ रहा है। तत्कालीन शिवराज सरकार के सीएम राइज स्कूल का नाम बदलकर मोहन सरकार ने सादनी स्कूल तो कर दिया लेकिन शिक्षा का स्तर सुधारने में मोहन सरकार पूरी तरह फैल हुई है। इस बात की गवाही यह आंकड़े चीख चीख कर दे रहे हैं। सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर घटिया है।इस बात का प्रमाण यह भी है कि सरकारी स्कूलों की बेहतर सुविधाओं के लिए गाल बजाने वाले सरकार के नुमाइंदे अधिकारियों के बच्चे भी इन सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ते हैं। मतलब साफ है कि सरकार को खुश करने के लिए यह प्रशासनिक अधिकारी गाल तो सरकार के हक में बजाते हैं लेकिन मोटी फीस प्राइवेट स्कूलों की थाल में सजाते हैं। 

आपको बता दें कि ग्वालियर जिले में सरकारी स्कूलों की संख्या प्राइवेट स्कूलों से कहीं ज्यादा है। इसके बावजूद प्राइवेट स्कूल में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या कहीं अधिक है। वह साफ बता रही है कि प्रदेश सरकार पालकों को सरकारी स्कूलों की तरफ आकर्षित करने में पूरी तरह फेल हुई है और आकर्षित करें भी कैसे केवल घटिया मिड डे मील और फ्री की किताबें देखकर कोई भी पालक अपने बच्चों का भविष्य बर्बाद करने के लिए तो उन्हें उन सरकारी स्कूलों में नहीं भेजेगा जहां शिक्षक ही न हो और शिक्षक हो भी तो उनका पढ़ाने का तरीका राम भरोसे हो। सरकार करोड़ों रुपए बर्बाद करने के बाद भी सरकारी स्कूलों का स्तर नहीं सुधार पाई है जी सरकारी स्कूलों का स्तर सुधर जाए। इसका तरीका एक ही है कि सरकार को यह नियम लागू कर देना चाहिए कि जितने भी लोग शासकीय सेवा में हैं उनके लिए अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाना अनिवार्य होगा। यकीन मानिए कि जिस स्कूल में आईएएस और आईपीएस के बच्चे पढ़ेंगे वहां पर सुविधाएं कागजों पर नहीं हकीकत में दुरुस्त नजर आएंगी न कोई शिक्षक अनुपस्थित होने की हिमाकत करेगा ना ही लापरवाही बरतने की। क्या माननीय मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव में है इच्छाशक्ति यह नियम लागू करने की?

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Gajendra Ingle
Gajendra Inglehttp://theinglespost.com
The author is founder Editor of this news portal. He has long experience of journalism. He has deep expertise on political and social issues.
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