डिजिटल डेस्क नई दिल्ली : न बीड़ी सिगरेट गुटखा तंबाकू न शराब और नशा और यदि शादी करनी है तो दहेज इसका लेन देन भी नहीं। ऐसी ही तमाम सामाजिक कुरीतियों से दूर रहते हैं रामपाल महाराज के अनुयायी। आज लाखों लोग रामपाल महाराज से ज्ञान प्राप्त कर अपने जीवन को इन सामाजिक कुरीतियों से मुक्त कर चुके हैं। अभी हाल ही में 512 वाँ दिव्य धर्म यज्ञ दिवस समागम रमैणी, रक्तदान, देहदान और आध्यात्मिक सेवा का वैश्विक उत्सव का आयोजन सतलोक आश्रम धनाना धाम (सोनीपत), कुरुक्षेत्र, भिवानी में किया गया और आश्रम में आए तमाम अनुयायी एक सरल सहज जीवन के साथ तमाम सामाजिक कुरीतियों से दूर नजर आए।
512वां दिव्य धर्म यज्ञ दिवस समागम सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था — यह श्रद्धा, सेवा और आत्मिक उन्नयन का ऐसा पर्व बन गया, जिसमें हर दिल ने कुछ न कुछ पा लिया। तीन दिनों तक चलने वाला यह अध्यात्मिक उत्सव मानो ईश्वर और इंसान के बीच एक सजीव संवाद बन गया हो। संत रामपाल जी महाराज की प्रेरणा से समागम में शास्त्र आधारित सत्संगों की गूंज हर मन को छू गई। अमरवाणी के अखंड पाठ और अखंड ज्योत ने वातावरण को दिव्यता से भर दिया, तो वहीं चौबीसों घंटे सेवादारों ने मोहन-भोजन भंडारे में हर श्रद्धालु को प्रेमपूर्वक भोजन कराया — बिना भेदभाव के।
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लेकिन इस महायज्ञ की सबसे सुंदर बात रही इसकी मानव सेवा की भावना — नि:शुल्क नाम-दीक्षा से लेकर दहेज-मुक्त रमैणी (सामूहिक विवाह), रक्तदान शिविर, और देहदान संकल्प जैसे नेक कार्यों ने समाज में एक नई चेतना जगा दी। यह समागम, केवल साधना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह लाखों श्रद्धालुओं के लिए एक आत्मिक जागरण और सामाजिक ज़िम्मेदारी का अनुभव बन गया। हर व्यक्ति जो वहाँ पहुँचा, वह सिर्फ एक भक्त नहीं, बल्कि एक बेहतर इंसान बनकर लौटा।
512वां दिव्य धर्म यज्ञ दिवस समागम केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं था, बल्कि इसका मूल उद्देश्य कहीं अधिक गहरा और व्यापक था — मानवता को दिव्यता की ओर मोड़ना और समाज को एक सार्थक दिशा प्रदान करना। यह आयोजन उस ऐतिहासिक दिव्य लीला की पुनरावृत्ति था, जो स्वयं परमेश्वर कबीर साहेब ने लगभग 600 वर्ष पूर्व काशी नगरी में रची थी। जहाँ तीन दिनों तक अखंड भंडारे के माध्यम से लाखों संत-महात्माओं को बिना भेदभाव, प्रेमपूर्वक अन्न और सत्संग का प्रसाद प्रदान किया गया था। इस कार्यक्रम में प्रयास किया गया कि सभी अनुयायियों को तमाम सामाजिक कुरीतियों के प्रति जागरूक किया जाए। जो लोग पहले से ही अनुयायी हैं वे अन्य लोगों को भी ऐसी कुरीतियों से दूर रहने के लिए प्रेरित करें और अपने सादगीपूर्ण जीवन से सभी को प्रभावित करें।
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संत रामपाल जी महाराज ने उसी दिव्य परंपरा को आज के युग में पुनर्जीवित किया — लेकिन केवल रस्म अदायगी के लिए नहीं, बल्कि उसे एक जीवंत और व्यवहारिक अध्यात्म के रूप में प्रस्तुत किया। यहाँ न केवल भक्ति और सत्संग की अनुभूति थी, बल्कि सेवा, समानता, सादगी, और नशामुक्त समाज की वास्तविक झलक भी थी। इस समागम ने यह स्पष्ट कर दिया कि अध्यात्म केवल ध्यान और पूजा का विषय नहीं है, बल्कि यह एक जीवनशैली है — जिसमें हर व्यक्ति को प्रेम, करुणा और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ जीना होता है। यह आयोजन न सिर्फ एक दिव्य स्मृति की पुनरावृत्ति था, बल्कि यह सामाजिक बदलाव और आत्मिक जागरूकता का मंच बन गया, जहाँ हज़ारों नहीं, बल्कि लाखों लोग अपने भीतर कुछ नया लेकर लौटे — एक बदला हुआ दृष्टिकोण, एक सच्चे उद्देश्य की ओर कदम।
आयोजन के सूत्रधार आयोजन समिति के सदस्य बड़े ही सहस्राव से बताते हैं कि हर सफल आयोजन के पीछे एक गूढ़ प्रेरणा होती है — और इस दिव्य धर्म यज्ञ दिवस समागम के केंद्र में थे जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज, जिनकी दृष्टि सिर्फ आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना से भी ओतप्रोत है। सतगुरु ने न केवल आयोजन का मार्गदर्शन किया, बल्कि उसके हर पहलू को स्वयं के अनुभव और दिव्य ज्ञान से अंतरात्मा की गहराइयों तक आकार दिया। उनका उद्देश्य केवल आयोजन कराना नहीं था, बल्कि प्रत्येक श्रद्धालु को भक्ति, सेवा और जीवन के वास्तविक अर्थ से जोड़ना था।
इस पुण्य कार्य में देश-विदेश के सतलोक आश्रमों से आए हजारों समर्पित सेवादारों ने अनुशासन, समर्पण और संयम के साथ योगदान दिया। वे दिन-रात एक करके न केवल व्यवस्थाओं को सँभालते रहे, बल्कि हर आने वाले अतिथि को यह अहसास दिलाते रहे कि सेवा में ही सच्चा सुख है। चिकित्सा टीमों, तकनीकी सहयोगियों और भंडारा सेवकों ने जिस समर्पण और आत्मीयता से सेवा दी, उसने इस आयोजन को केवल एक समागम नहीं, बल्कि एक उत्सव जैसा अनुभव बना दिया — जहाँ हर कोना, हर पल और हर चेहरा श्रद्धा और सेवा की महक से भर गया। लाखों श्रद्धालुओं ने इस आयोजन से न केवल स्थलीय उपस्थिति के माध्यम से, बल्कि ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म्स पर भी जुड़कर सत्संग, नामदीक्षा और संत-दर्शन का लाभ लिया। यह तकनीक और आस्था का अनोखा संगम था, जहाँ दूरी मायने नहीं रखती थी, बल्कि जुड़ाव का भाव सर्वोपरि था। इस समागम ने सिद्ध कर दिया कि जब सतगुरु की दृष्टि, सच्चे सेवा-भाव और अनुशासित टीम का संगम होता है, तब एक साधारण आयोजन भी समाज और आत्मा को छू जाने वाला दिव्य अनुभव बन जाता है।
देश-विदेश के सतलोक आश्रमों में रमैणी, रक्तदान एवं देहदान संकल्प — केंद्रवार मुख्य उपलब्धियाँ
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क्रमांक सतलोक आश्रम स्थान रमैणी (जोड़े) रक्तदान (यूनिट) देहदान संकल्प
1 धनाना धाम हरियाणा 26 292 –
2 कुरुक्षेत्र हरियाणा 19 270 –
3 भिवानी हरियाणा 1 143 0
4 मुंडका दिल्ली 11 106 –
5 बैतूल मध्य प्रदेश 20 273 3,075
6 इंदौर मध्य प्रदेश 16 105 195
7 शामली उत्तर प्रदेश 11 60 –
8 सीतापुर‑महोली उत्तर प्रदेश 21 107 –
9 खमाणों पंजाब 7 178 –
10 धूरी पंजाब 0 90 –
11 सोजत राजस्थान 28 295 60
12 धवलपुरी महाराष्ट्र 4 487 119
13 धनुषा‑जनकपुर नेपाल 13 83 –
कुल योग 177 2,589 3,449
पाठकों को बता दें कि यह सूची तभी हाल ही के आयोजित कार्यक्रम की है यदि हम अब तक किए गए तमाम दिव्यधर्म यज्ञ व अन्य कार्यक्रम की बात करें तो आज तक रामपाल महाराज के लाखों अनुयायियों ने कई राज्यों में उनके विचार को अपनाकर स्वयं के जीवन को कुरीतियों से मुक्त बनाया है। आज जहां देश में एक और गरीब परिवार की बेटियों का विवाह दहेज की वजह से नहीं हो पाता या कई बेटियाँ दहेज न दिए जाने की वजह से मार दी जाती हैं या कई दंपती दहेज के डर से बेटियों को जन्म ही नहीं देते हैं.. ऐसे लोगों के लिए रामपाल महाराज की यह दहेज विहीन विवाह प्रथा रमणीक एक बड़ी प्रेरणा है। जहां एक और शासन प्रशासन के नशा मुक्ति के तमाम दावे असफल हो जाते हैं वहां रामपाल महाराज उसे ज्ञान प्राप्त कर उनका अनुयायी बन तुरंत ही लोग हर तरह के नशे से दूर हो जाते हैं और जब वे नशे से दूर होते हैं तो तमाम अन्य अपराधों से भी दूर हो जाते हैं। रामपाल महाराज सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन की एक अथक गाथा लिख रहे हैं।
