उज्जैन मध्यप्रदेश: सोमवार को उज्जैन में महाकाल की राजसी सवारी कार्यक्रम का आयोजन हुआ। महाकाल की सवारी न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह उज्जैन की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक विरासत का जीवंत प्रमाण है। एक दौर था, जब सिंधिया और होलकर महाराज सवारी में लाव-लश्कर, सेना के साथ सम्मिलित होते थे। सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी श्रद्धा और भव्यता से निभाई जा रही है। वर्षों से सवारी के साथ राजा-महाराजा की पोशाक धारण कर सबके आकर्षण का केंद्र बनने वाले स्वामी मुस्कुराके यानी पं. शैलेन्द्र व्यास ने बताया कि इतिहासकारों और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, ग्यारहवीं शताब्दी की पांडुलिपियों में महाकाल सवारी का उल्लेख मिलता है।
केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया व उनके पुत्र महान आर्यमन सिंधिया सोमवार को उज्जैन पहुँचे। वहां से पिता पुत्र महाकाल की राजसी सवारी में शामिल हुए। उन्होंने विधि विधान से महाकाल का पूजन किया। आपको बता दें कि उज्जैन में इस महाकाल राजसी सवारी के परंपरा की शुरुआत सिंधिया रियासत काल में ही हुई थी। अठारहवीं सदी में आज से लगभग तीन सौ साल पहले सिंधिया राजपरिवार के ही राणोजी सिंधिया ने महाकाल मंदिर का जीर्ण उद्धार कराया था। इससे पहले लगभग पांच सौ सालों तक यह मंदिर बंद था यहां पर इस तरह के आयोजन नहीं होते थे। लेकिन महाकाल मंदिर की इस भव्यता का श्रेय सिंधिया परिवार को जाता है। जिन्होंने न केवल इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया बल्कि यहां कई परंपराओं के की शुरुआत की जो आज तक अनवरत चली आ रही हैं।

जब से सिंधिया परिवार ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया यहां महाकाल। की सवारी का आयोजन शुरू हुआ। उसी समय से हर वर्ष इस आयोजन में सिंधिया परिवार के तत्कालीन मुखिया शामिल होते आ रहें हैं। इस परंपरा का निर्वहन लगातार जारी है और इसी परंपरा को निभाते हुए केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया महाकाल। की राजसी सवारी में शामिल होने उज्जैन पहुंचे थे और साथ ही अपने पुत्र महा आर्यमन सिंधिया को भी परम्परा का निर्वहन कराते नजर आए।
