ग्वालियर मध्य प्रदेश: डाग बाइट के लगातार बढ़ रहे मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेने के बाद डाग शेल्टर से लेकर नसबंदी के कार्यों में तेजी लाने के आदेश दिए हैं। हालाँकि यह आदेश दिल्ली के कुत्तों की संख्या को लेकर दिया गया है। लेकिन ग्वालियर में भी डॉग बाइट की स्थिति भयावह है और लगभग 7000 से ज्यादा स्टीव डॉग्स। का खतरा हमेशा आपके बच्चों पर मंडराता रहता है। इसके बावजूद ग्वालियर नगर निगम के पास अभी तक डाग शेल्टर बनाने का कोई प्रविधान ही नहीं है।
डॉग बाइट कंट्रोल की बात करें तो सिर्फ एक एबीसी सेंटर के भरोसे ही श्वानों की जनसंख्या नियंत्रित करने का प्रयास किया जा रहा है। ये सेंटर भी पिछले दो माह से बंद पड़ा हुआ था। एक सप्ताह पहले ही सेंटर खोला गया है। यह सेंटर बिड़ला नगर पुल के नीचे है। गत 4 अगस्त से लेकर 12 अगस्त तक सिर्फ 161 श्वानों की ही नसबंदी हो सकी है। लापरवाही का यह आलम उस स्थिति में है जब शहर में हजारों आवारा स्वान है और प्रतिदिन दर्जनों डॉगबाइड के मामले आ रहे हैं। इसके बावजूद डॉग बाइट से बचाव की कोई वृद्य योजना अब तक नहीं बनाई गई है।
प्राप्त अधिकृत आंकड़ों के अनुसार शहर में एक जुलाई से लेकर 12 अगस्त तक 43 दिन के अंदर डाग बाइट के लगभग 1400 से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं। इसमें जयारोग्य अस्पताल में इस अवधि के दौरान 822 केस और जिला अस्पताल में 611 केस पहुंचे हैं। इसके मुकाबले यदि श्वानों की नसबंदी की बात की जाए, तो गत चार अगस्त से दोबारा एबीसी सेंटर को नया ठेका होने के बाद शुरू कराया गया है। जबलपुर की एनिमल केयर संस्था ने नया ठेका लिया है और आठ दिनों में 161 आपरेशन किए हैं। इसमें 87 नर और 74 मादा श्वान हैं।

इससे पूर्व भी ग्वालियर में डॉग बाइट और स्वानों की संख्या को कंट्रोल करने से संबंधित तमाम कार्रवाइयों को लेकर काफी चर्चाएं रही हैं। श्वानों की नसबंदी को लेकर ग्वालियर नगर निगम का बड़ा भ्रष्टाचार उजागर हुआ था जिसमें करोड़ों रुपए का हेर फेर।कागजों पर कर लिया गया था जबकि स्वानों की नसबंदी हकीकत में नहीं की गई थी यह मुद्दा कुछ समय पहले गर्माया हुआ था लेकिन अब ठंडे बस्ते।में पड़ चुका है लेकिन जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट का साइटेशन आया है उसके बाद यह सवाल उठने लगा है। कि क्या इस बार नगर निगम डॉग्स शेल्टर और डॉग बाइट के मामलों को गंभीरता से लेगा।
ग्वालियर में एक ही एबीसी सेंटर है, लेकिन शेल्टर होम जैसी कोई व्यवस्था नहीं है। श्वानों को पकड़ने के बाद उनकी नसबंदी की जाती है और दो से तीन दिन पोस्ट आपरेटिव में रखने के बाद उसी स्थान पर छोड़ दिया जाता है, जहां से उसे पकड़ा गया था। इसके चलते शहर में ज्यादातर जगहों पर श्वानों के झुंड नजर आते हैं। नसबंदी के दो लाभ होते हैं।एक्सपर्ट्स बताते हैं कि एक तो जनसंख्या वृद्धि में कमी आती है और दूसरा नसबंदी के बाद श्वान की आक्रामकता कम हो जाती है और वह काटना बंद कर देता है, लेकिन कई बार ऐसे भी मामले सामने आए हैं जिसमें ऐसे श्वानों ने भी लोगों को काटा है जिनकी नसबंदी हो चुकी थी। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने अब डाग शेल्टर बनाने का आदेश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब नगर निगम को भी डाग शेल्टर की व्यवस्था करनी होगी। इसमें श्वानों की नसबंदी करने के साथ ही उन्हें रखना भी होगा। हालांकि अभी बिरला नगर पुल के नीचे एक एबीसी सेंटर संचालित होता है और दूसरे सेंटर के लिए लक्ष्मीगंज में जगह चिह्नित की गई थी, लेकिन अब इसे डाग शेल्टर के रूप में भी विकसित करने की तैयारी की जा रही है। लेकिन यह सेंटर कब तक शुरू होगा और इसमें कितने श्वान की व्यवस्था रहेगी।इस बारे में कोई आंकड़ों का खुलासा नहीं किया गया है क्योंकि शहर में स्श्वान की संख्या हजारों में है। हालांकि ये आदेश फिलहाल दिल्ली राज्य के लिए दिया गया है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के ज्यादातर आदेश साइटेशन के रूप में देशभर में लागू होते हैं। ऐसे में ग्वालियर में भी अब श्वानों के लिए नई व्यवस्था बनाने की कवायद शुरू की गई है।
