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जज ने कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग कर पत्नी को तारीखों में उलझाए रखा, अब हाई कोर्ट ने दिया गुजारा भत्ता देने का आदेश

न्याय की नैसरिक प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए अपने स्वयं के लाभ के लिए अपनी पत्नी को बारह साल तक उन्होंने कानूनी प्रक्रिया में उलझाए रखा। हालांकि अंत में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए। यह आदेश जारी कर दिया कि पीड़ित पत्नी को अब यह जज साहब गुजारा भत्ता दें

प्रयागराज उत्तर प्रदेश: कानून का ज्ञान रखने वाले कानून के रक्षक या कानून के ठेकेदार। किस तरह से कानून। का दुरुपयोग करते हैं और कानून से खिलवाड़ करते हैं। इसकी बानगी देखने को मिली। इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय के बाद जिसमें एक जज साहब अपनी पत्नी के साथ ही अन्याय कर रहे थे। कानूनी। प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ कर रहे थे। उन्हें खुद कानून की समझ थी और वे खुद जज थे। इसके बाद भी न्याय की नैसरिक प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए अपने स्वयं के लाभ के लिए अपनी पत्नी को बारह साल तक उन्होंने कानूनी प्रक्रिया में उलझाए रखा। हालांकि अंत में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए। यह आदेश जारी कर दिया कि पीड़ित पत्नी को अब यह जज साहब गुजारा भत्ता दें।

अली राजा विशेष न्यायाधीश डकैत प्रभावित एरिया एटा रूप में जज के रूप में सेवा दे रहे हैं। और उनसे अलग होने के बाद उनकी पत्नी शबाना बानो। ने गुजारा भत्ता की मांग की थी। जिससे पत्नी को वंचित रखा गया। जब शबाना बादों ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई तो न्यायमूर्ति विनोद दिबाकर ने आदेश जारी करते हुए कहा पत्नी अर्जी की तिथि से गुजारा भत्ता पाने। की हकदार है। और उनके पति अली रजा। के वेतन से हर महीने। 20 हजार रुपये पत्नी को दिए जाएं और यह राशि अगस्त 2019 से आगे के समय में तीस हज़ार रुपये दी जाए। 

इसे गंभीर मामले में न्यायमूर्ति ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि एक जज जिन्हें पत्नी के कानूनी अधिकारों की जानकारी है। उन्होंने गुजारा भत्ता देने के बजाय इस मामले को 12 साल तक कानूनी प्रक्रिया में उलझाए रखा। फेमली कोर्ट ने पत्नी के हक में गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था इसके बावजूद गुजारा भत्ते का भुगतान नहीं किया कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग किया। पत्नी के साथ कानूनी लड़ाई जारी रखकर न्याय में देरी की इसलिए उनकी पत्नी कोर्ट से सहानुभूति पाने के हकदार हैं। 

जहां एक और माननीय उच्च न्यायालय के निर्णय ए चलते एक पीड़ित पत्नी। को न्याय मिला है।वहीं इस आदेश के साथ ही यह सवाल भी खड़ा हो गया है कि किस तरीके से कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग करके उत्ताखों में उलझाए रखकर पीड़ितों को परेशान किया जाता है। न्याय का मूल सिद्धान्त जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड ज्ञान होते हुए भी जज और वकील किस तरीके से कुछ समय में निपटने वाले मामलों को सालों तक खींचते हैं। और यह मामला तो एक जज से जुड़ा हुआ है जिन्होंने कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग कर अपनी पत्नी को न्याय से वंचित रखा। 

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