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क्या एक साल में मूर्त रूप ले पाएंगे इन्वेस्टर समिट के प्रस्ताव? आएँगे धरातल पर या होंगे धराशायी?

जो भी अरबों खरबों की बात हुई है वह अभी प्रस्ताव तक सीमित है। और इन प्रस्तावों के नाम पर ही मीडिया में बड़े बड़े विज्ञापन देकर बड़ी बड़ी खबरें देखकर हवा में मध्यप्रदेश को औद्योगिक हब बना दिया गया है। काश ऐसा हवा बाज औद्योगिक हब हवा में ही लोगों को नौकरी देदे और उसी हवा को खाकर प्रदेश के बेरोजगारों का पेट भर जाए!

भोपाल मध्य प्रदेश: जी हां यह विश्लेषण पूरी तरह नकारात्मक है। और जो लोग केवल सकारात्मक सुनना, कहना और और पढ़ना पसंद करते हैं। वो तुरंत कलटी मार लें। क्योंकि यहां आपको वह आंकड़े भी बताए जाएंगे और उनकी हक़ीकत भी बताई जाएगी। और यह पूरा विश्लेषण उन लोगों के लिए तो कतई नहीं है। जिन्हें हिन्दी भाषी होते हुए भी प्रस्ताव शब्द का अर्थ तक नहीं मालूम। बाकी अन्य शिक्षित बुद्धिजीवी चिंतनशील पाठकों का स्वागत है। चलिए हम आगे बढ़ते हैं। 

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में 24-25 फरवरी 2025 को पहली बार “इन्वेस्ट मध्यप्रदेश – ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट” का आयोजन किया गया। ये समिट राज्य में निवेश और उद्योग विकास की अनंत संभावनाओं को साकार करने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार (24 फरवरी) को भोपाल के राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में इस दो दिवसीय समिट का शुभारंभ किया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की उपस्थिति में प्रधानमंत्री मध्यप्रदेश की 18 नई औद्योगिक नीतियों का अनावरण किया। इन नीतियों में औद्योगिक, एक्सपोर्ट, स्टार्टअप, सेमी-कंडक्टर, ड्रोन, फिल्म निर्माण, पर्यटन और एमएसएमई से संबंधित नीतियां शामिल किया गया है। समिट में 50 से ज्यादा देशों के 100 से ज्यादा विदेशी प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं जिनमें एंबेसडर, हाई कमिश्नर और महावाणिज्य दूत भी शामिल हुए। 

भोपाल में दो दिन चली ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट (GIS) में मध्यप्रदेश को 26.61 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव मिले हैं। राज्य सरकार का दावा है कि इन प्रस्तावों से प्रदेश में 17.34 लाख रोजगार की संभावना है। उद्योगपतियों ने मैन्युफैक्चरिंग के अलावा रिन्युएबल एनर्जी सेक्टर में सबसे ज्यादा रुचि दिखाई है। अडाणी ग्रुप, रिलायंस जैसी बड़ी कंपनियों ने भी प्रस्ताव दिए हैं। समिट में पहले दिन 24 फरवरी को 22 लाख 50 हजार 657 करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव और एमओयू हुए थे। दूसरे दिन 25 फरवरी को 4 लाख 11 हजार करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव मिले हैं। दो दिनों में 6 विभागीय समिट हुई हैं, जिनमें 500 से ज्यादा NRI शामिल हुए और अपने निवेश प्रस्ताव रखे।

इससे पहले रीजनल इंडस्ट्री कॉन्क्लेव और इंटरेक्टिव सेशन में भी निवेश प्रस्ताव मिले थे। इन्हें मिलाकर मध्यप्रदेश को 30.77 लाख करोड़ के निवेश के प्रस्ताव मिल चुके हैं। इनसे 21.40 लाख रोजगार की संभावना है। एविएशन कंपनी फ्लाई भारती के साथ उज्जैन में एयरपोर्ट डेवलपमेंट के लिए एमओयू हुआ। इसमें 750 करोड़ रुपए का निवेश होगा। वहीं, एअर इंडिया एक्सप्रेस और मध्यप्रदेश नागरिक विमानन विभाग के बीच 5 नई फ्लाइट के लिए MoU साइन हुआ है। समिट के दूसरे और आखिरी दिन समापन समारोह में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह शामिल हुए। मंगलवार को सबसे पहले प्रवासी मध्यप्रदेश समिट हुई। इसके बाद चार सेक्टर अर्बन, टूरिज्म, एमएसएमई और माइनिंग की समिट हुई। इस दौरान उद्योगपतियों ने एमओयू साइन किए। सोमवार (24 जनवरी) को पीएम नरेंद्र मोदी ने समिट का उद्घाटन किया था। इस दौरान अडाणी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अडाणी, पतंजलि आयुर्वेद के एमडी आचार्य बालकृष्ण समेत देश के जाने-माने उद्योगपति और निवेशक भी शामिल हुए थे।

लेकिन यह सब जानकारी जो मैंने ऊपर दी यह तो आप देश के नामचीन अखबारों और न्यूज चैनल में पिछले कुछ दिनों में देख ही चुके हैं। और ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट की भर पेज खबरें और घंटों घंटों के कार्यक्रम मैं आपको इन सब आंकड़ों की जानकारी तो मिल ही गई होगी। फिर भी आपको यह सब बताना मुनासिब समझा इसलिए यहाँ पर रिफरेंस के लिए यह सारी जानकारी पहले आपको बताई गई है। जिससे कि अब आप समझ सके कि इन सब जानकारी में अब झोल क्या है? यहां सबसे बड़ी बात है कि यह सब करोडों खर्च करके किया गया आयोजन प्रदेश। को केवल और केवल अभी तक प्रस्ताव दिलाने में कामयाब हुआ है। क्या ऐसी कोई व्यवस्था नहीं बनाई जा सकती जिसमें ग्रैंड शो यह आडम्बर कम हो और जमीनी स्तर पर काम अधिक हो। जी हां जमीनी स्तर पर काम की बात मैं इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि यह सारे प्रस्ताव धरातल पर आएँगे। इस बात का संशय मुझे ही नहीं। अपितु शायद सरकार को भी है।

आज देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्र में एमपी आईडीसी द्वारा आयोजित इस ग्लोबल इनवेस्टर्स समिट से संबंधित एक खबर प्रकाशित हुई है जिसका शीर्षक है एक साल में मूर्त रूप लेंगे प्रस्ताव। एमपीआरडीसी निवेश प्रस्तावों को। धरातल पर लाने के लिए। हर 100  करोड़ से बड़े अमाउंट के प्रस्ताव के लिए एक सम्पर्क अधिकारी नियुक्त करेगा। अन्य जितने भी छोटे प्रस्ताव हैं उन्हें एमपीआरडीसी के रीजनल। कार्यालयों में  फॉलो के लिए भेज दिया जाएगा। हर जिला कलक्ट्रेट कार्यालय में भी निवेश संवर्धन केन्द्र बनाए गए हैं जो इन निवेशकों से समन्वय करके इन प्रस्तावों को धरातल पर लाने का प्रयास करेंगे। मतलब अभी इन्वेस्टर्स सम्मिट में जो मिला है। वह केवल प्रस्ताव है, हां, आंकड़े बड़े लुभावने हैं, आँकड़े करोड़ों अरबों और खरबों के हैं। लेकिन हकीकत यह है कि इनको धरातल पर लाने के लिए अभी तक कोई स्ट्रेटजिक प्लैनिंग एमपीआइडीसी के पास नहीं है। 

जो भी अरबों खरबों की बात हुई है वह अभी प्रस्ताव तक सीमित है। और इन प्रस्तावों के नाम पर ही मीडिया में बड़े बड़े विज्ञापन देकर बड़ी बड़ी खबरें देखकर हवा में मध्यप्रदेश को औद्योगिक हब बना दिया गया है। काश ऐसा हवा बाज औद्योगिक हब हवा में ही लोगों को नौकरी देदे और उसी हवा को खाकर प्रदेश के बेरोजगारों का पेट भर जाए! लेकिन प्रस्तावों से गरीब मजदूर मजदूर मजदूर बेरोजगारों का पेट भरने वाला नहीं हैं। यह हकीकत है। और यदि यह हकीकत। आपको नकारात्मक लगती है तो आप अपनी आँखें मूँद कर। ऐसे ही तालियां पीटते रहें। 

लोग यह भी समझ सकते हैं कि नकारात्मकता ढूंढना सरल है उंगली उठाना आसान है लेकिन। काम करना मुश्किल है जी।हां काम करना मुश्किल है और इसीलिए तो काम की जगह आडंबर ज्यादा किए जाने लगे हैं। काम ही करना होता तो सबसे पहले ज़मीनी स्तर पर यह प्रोजेक्ट तैयार किए जाते के प्रदेश में आवश्यकता किस तरह के उद्योगों की है उस उद्योग को बनाने के लिए पूरी रूपरेखा तैयार की जाती। और सब कुछ जमीन पर उतारने के लिए अंत में बड़े इनवेस्टर्स को बोला जाता अब आप सीधे निवेश कीजिए के प्रस्ताव के खेल मध्य प्रदेश में नहीं चलेंगे! लेकिन शायद यह सिस्टम ऑटो वाले की तरह समझदार है। जो सीधे रास्ते ले जा कर 20 रूपये में काम न चलाकर, इधर-उधर से घुमा फिराकर मंजिल पर पहुंचाने का प्रयास करता है जिसमें ₹20 की जगह 200 रुपये का निवेश दिखाई देता है। और जब आंकड़े बडे होते हैं, तो एक फील गुड फैक्टर और अमृतकाल का अनुभव होता है। 

बाकी का विश्लेषण अब एक साल बाद करेंगे और देखेंगे मध्यप्रदेश को मिले 30.77 लाख करोड़ के निवेश के प्रस्ताव में से कितने धरातल पर आए हैं और समन्वय व उचित स्ट्रेटजी के अभाव में कितने धराशायी हो गए हैं?

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