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कद्दावर भाजपा नेता संजय पाठक को सुप्रीम कोर्ट से झटका, आपराधिक अवमानना में अब यह फैसला

संजय पाठक के परिवार के नाम से संचालित माइनिंग।कंपनी ने अवैध उत्खनन किया है जिसके चलते 3 कंपनी पर 443 करोड का जुर्माना लगाया गया था। इस जुर्माने से बचने के लिए संजय पाठक ने हाईकोर्ट की शरण ली थी, लेकिन हाईकोर्ट से भी राहत मिलती न देख। उन्होंने इस मामले के न्यायाधीश विशाल मिश्रा से फ़ोन पर संपर्क किया था

भोपाल मध्यप्रदेश: विजय राघवगढ़ से भाजपा विधायक और पूर्व मंत्री संजय पाठक को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है।आपराधिक अवमानना के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला दिया है। आपको बता दें कि संजय पाठक के परिवार से संबंधित माइनिंग कंपनीज के द्वारा अवैध उत्खनन किए जाने का मामला न्यायालय में विचाराधीन है और इस मामले में संजय पाठक ने हाईकोर्ट के माननीय न्यायाधीश विशाल मिश्रा को फोन पर संपर्क किया था, जिसके चलते अब संजय पाठक पर आपराधिक अवमानना का मामला हाईकोर्ट में दर्ज किया है और इसी से राहत पाने के लिए संजय पाठक सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने संजय पाठक को कोई राहत नहीं दी है।
हाईकोर्ट द्वारा आपराधिक अवमानना लगाए जाने के बाद राहत के लिए भाजपा विधायक संजय पाठक सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। सुप्रीम कोर्ट ने संजय पाठक को हाईकोर्ट जाने के लिए स्वतंत्र कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत व न्यायमूर्ति जय माल्या बागची की युगलपीठ ने अहम निर्णय दिया है कि विधायक के विरुद्ध हाईकोर्ट द्वारा दर्ज किए गए आपराधिक अवमानना के प्रकरण में हाईकोर्ट ही विचार कर सकता है। अब हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की याचिकाकर्ता आशुतोष दीक्षित की विशेष अनुमति याचिका वापस लेने की अनुमति भी दे दी है। आपको बता दें कि संजय पाठक की कंपनी द्वारा अवैध उत्खनन किए जाने का यह मामला कटनी के याचिकाकर्ता आशुतोष दीक्षित ने ही उठाया है।

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संजय पाठक के परिवार के नाम से संचालित माइनिंग।कंपनी ने अवैध उत्खनन किया है जिसके चलते 3 कंपनी पर 443 करोड का जुर्माना लगाया गया था। इस जुर्माने से बचने के लिए संजय पाठक ने हाईकोर्ट की शरण ली थी, लेकिन हाईकोर्ट से भी राहत मिलती न देख। उन्होंने इस मामले के न्यायाधीश विशाल मिश्रा से फ़ोन पर संपर्क किया था। इस बात का खुलासा तब हुआ जब विशाल मिश्रा ने स्वयं को इस मामले से अलग कर लिया औरन्यायालय प्रक्रिया में यह बात लिखित में उल्लेखित की कि उनसे संजय पाठक ने संपर्क किया है, इसलिए वे इस केस से अलग हो रहे हैं। उन्होंने इस पूरे प्रकरण को प्रशासनिक स्तर पर मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजने का भी निर्देश दिया था। विधायक का यह कृत्य न्यायपालिका की छवि को धूमिल करने व गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला माना गया। न्यायिक कार्य में हस्तक्षेप करना आपराधिक अवमानना की श्रेणी में आता है।हाईकोर्ट ने दो अप्रैल को याचिका का निराकरण करते हुए मामले पर संज्ञान लिया और भाजपा विधायक के विरुद्ध आपराधिक अवमानना का प्रकरण दर्ज करने का निर्देश दिया।
इस मामले में संजय पाठक जितना हाथ पैर मार रहे हैं, उतना ही वे दलदल में फंसते जा रहे हैं, पूरे मामले को पहले संजय पाठक ने प्रशासन और शासन स्तर पर खुर्दबुर्द करने की कोशिश की, लेकिन शिकायतकर्ता आशुतोष दीक्षित लगातार इस मामले में शिकायत करते रहे और जब उन्हें शासन प्रशासन से भी कार्रवाई की उम्मीद नहीं दिखी तो उन्होंने याचिका के माध्यम से न्यायालय की शरण ली। और धीरे-धीरे इस पूरे मामले के तार खुलते चले गए, औरसंजय पाठक के परिवार द्वारा संचालित तीन कंपनी पर जुर्माना लगाया गया। अब देखना होगा कि संजय पाठक ने प्रदेश सरकार को जो राजस्व का नुकसान पहुंचाया है, उसकी भरपाई के लिए राज्य सरकार कब तक सक्रिय होती है और देश की भाजपा सरकार अपने ही विधायक संजय पाठक के इस कारनामे पर कैसी अनुशासनात्मक कार्रवाई करती है?

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Gajendra Ingle
Gajendra Inglehttp://theinglespost.com
The author is founder Editor of this news portal. He has long experience of journalism. He has deep expertise on political and social issues.
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