एकात्म मानव दर्शन समारोह में पहुँचे कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पूर्व राज्यपाल प्रोफेसर कप्तान सिंह सोलंकी ने मंच से जो कुछ कहा वह हमें सोचने पर मजबूर करता है कि जाम कि हालात कितने बदतर हैं और किस कदर बदइतजामी की जाती है। समारोह प्रारंभ हो चुका था सभी अतिथि मंचाशीन थे। लेकिन कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे कप्तान सिंह सोलंकी की कुर्सी खाली थी। में वहाँ यही सोच रहा था कि पूर्व राज्यपाल महोदय शायद कहीं फंस चुके हैं। और जब वह कार्यक्रम में पहुंचे मंच से उन्हें बोलने का मौका मिला तो उन्होंने अपना दर्द बयां कर दिया कि किस तरह एक पूर्व राज्यपाल होते हुए भी उनको ट्रैफिक जाम में फंसना पड़ा। उन्होंने यह तक कहा कि मुख्यमंत्री की कृपा से ही! शायद उनकी इस पंक्ति के दो अर्थ हो सकते हैं। एक तो मुख्यमंत्री की वजह से ही जो जाम के हालात बने वह उसकी ओर इशारा कर रहे थे यह संभव है कि पुलिसकर्मियों ने उनके वाहन को न निकलने दिया गया हो उनके आगे बैरिकेट्स लगा। दिए हों और उस समय उन्होंने मुख्यमंत्री को फ़ोन पर मदद के लिए कहा हो तब जाकर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के निर्देश पर पूर्व राज्यपाल प्रोफेसर कप्तान सिंह सोलंकी को कार्यक्रम स्थल तक पहुँचने के लिए मार्ग दिया गया हो।
पूर्व राज्यपाल प्रोफेसर कप्तान सिंह सोलंकी ने जो कुछ कहा वह एक अध्ययन का विषय है वह एक चिंतन का विषय है। मंच से बोली गई उनकी वह एक पंक्ति हमारे पुलिस और प्रशासन के लिए एक विश्लेषण का विषय है। जिस तरह से बैरिकेटिंग की जाती है अयोग्य डंडेधारियों को लगाया जाता है जिनको वास्तविक प्रोटोकॉल मालूम नहीं होता है। जो न तो आम देख रहे हैं न खास देख रहे हैं। हद तो यह है कि वह इमरजेंसी को भी समझने का विवेक नहीं रखते हैं जिसके चलते एंबुलेंस तक जाम। में फंस रही है और मरीज की जान पर बन रही है। यह पुलिसकर्मी लकीर के फकीर होते हैं। प्वाइंट पर इनको जितना कहा जाता है यह उतना ही करते हैं। यदि वीआईपी मूवमेंट मुख्यमंत्री का है तो इनका पूरा फोकस केवल मुख्यमंत्री के कार्केड तक समर्पित रहता है। इसके अलावा कोई अन्य चाहे पूर्व राज्यपाल हो चाहे मंत्री हो चाहे राष्ट्रीय पुरस्कार से पुरस्कृत हो वह सब इनके सामने शून्य होते हैं। इनकी कार्यशैली शाह बताती है कि इनको वीआइपी मूवमेंट का प्रोटोकॉल नहीं समझाया जाता और ना ही इनको ट्रैफिक मैनेजमेंट की सही ट्रेनिंग दी जाती है।
मध्य प्रदेश के नगरीय प्रशासन मंत्री कैलेश विजय वर्गीय की आप बीती भी सुन लीजिए। उनको तो वीआईपी मूवमेंट के चलते लकीर के फकीर डंडा धारियों द्वारा लगाए गए बेरिकेट का ऐसा खामियाजा भुगतना पड़ा कि वह एयरपोर्ट पहुँच कर फ्लाइट तक नहीं पकड़ पाए। मजबूरन उन्हें रात में ट्रेन से अपने गृह नगर इंदौर जाना पड़ा। ट्रैफिक में फंसे हुए कैलाश विजयवर्गीय ने मोबाइल पर सीएम को सूचना दी कि वह ट्रैफिक में फंस गए हैं और एयरपोर्ट नहीं पहुंच पाएंगे। इस घटना के बाद में कैलाश विजयवर्गीय ने जो कुछ कहा है वह भी एक अन्वेषण का विषय है और उस पर भी चिंतन करके उसका क्रियान्वयन किए जाने की आवश्यकता है। विजयवर्गीय का कहना है कि ऐसे कार्यक्रमों में ट्रैफिक प्लानिंग इस तरह होना चाहिए कि आयोजन भी चले और आम लोगों का आवागमन भी प्रभावित न हो। लापरवाही के कारण सीएम और मंत्रियों को लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ता है। सोमवार को ग्वालियर में आयोजन एक निर्धारित क्षेत्र में था। लेकिन ट्रैफिक जाम के हालात शहर की हर सड़क पर दिखाई दिए जो पुलिस ढील का उदाहरण है।
मुख्यमंत्री मोहन यादव के वीआईपी मूवमेंट के दौरान जिस तरह के ट्रैफिक डायवर्जन बैरिकेटिंग की व्यवस्था की गई उसने अयोग्यता की सारी हदें पार कर दी। सरकार के मंत्री कैलाश विजय वर्गीय को ही इस अव्यवस्था का खामियाजा भुगतना पड़ा। उपराज्यपाल प्रोफेसर कप्तान सिंह सोलंकी तक को लकीर के फकीर दंडाधारियों ने निकलने नहीं दिया। जब जब वीआईपी की यह हालत थी आम लोगों के बारे में सोचिए कि उनका कष्ट कितना होगा किस तरह उनको धकियाया गया होगा लतियाया गया होगा और घंटों खड़े रखा गया होगा। अब सवाल यह उठता है कि यह डंडाधारी लकीर?के फकीर क्यों होते हैं। उसकी वजह यही है हर व्यक्ति को अपनी नौकरी बचाने की चिंता होती है। और शायद इसी तरह के निर्देश ऊपर से रहते हैं कि कैसे भी मुख्य वीआईपी का कारकेड प्रभावित नहीं होना चाहिए। हम सबको उन्हीं की नौकरी बजानी है वहां चूक का मतलब है, फजीती मोल लेना। संभवतः यही वजह है कि वीआईपी मूवमेंट में प्रोटोकॉल का पालन इसी एक लकीर पर किया जाता है।
सबसे पहले तो हर पाठक यह समझ ले कि यह लेख किसी को तंज नहीं है किसी पर व्यंग्य नहीं है बल्कि यह लेख सुधार के प्रयास के लिए समर्पित है। अमूमन शहर में जाम लगता है लेकिन वीआईपी मूवमेंट के दौरान जाम के हालात बद से बदतर हो जाते हैं। अब जिस तरह से पूर्व राज्यपाल प्रोफेसर कप्तान सिंह सोलंकी और नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने इस विषय को उठाया है उस पर से भी यदि हमारी पुलिस और प्रशासन ट्रैफिक व्यवस्था में सुधार नहीं करती है, तो फिर आखिरी में सिस्टम पर दोष देकर इतिश्री कर लीजिए….
गजेंद्र इंगले, वरिष्ठ पत्रकार, संपादक
